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Date of publication : 27/6/2018 15:30
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दुआ के क़ुबूल होने की शर्तें...

अल्लाह से किए गए अहद और पैमान पर अमल करना, ईमान, नेक अमल और अमानतदारी भी दुआ के क़ुबूल होने की शर्तों में से है, क्योंकि जो शख़्स अल्लाह से किए गए अहद और पैमान को नहीं निभा सकता उसे अल्लाह के दुआ की क़ुबूल करने के वादे से उम्मीद लगाना बेकार है।
विलायत पोर्टल : समाज में बहुत से लोग ऐसे दिखाई देते हैं जिनकी मुश्किल यह होती है कि वह अल्लाह से दुआ तो बहुत करते हैं लेकिन उनकी दुआ क़ुबूल नहीं होती, इस्लामी रिवायतों में बहुत सी उन चीज़ों की तरफ़ इशारा किया गया है जिसमें इस मुश्किल के हल को बयान किया गया है।
कभी कभी ऐसा होता है कि हम एक तरफ़ तो अल्लाह की बारगाह में दुआ पर दुआ करते हैं लेकिन दूसरी तरफ़ ऐसे कुछ गुनाह भी होते हैं जो हमारी दुआओं के क़ुबूल होने में रुकावट बनते हैं, इस लेख में हदीसों की रौशनी में दुआ के क़ुबूल होने की उन शर्तों को बयान किया जाएगा जिसका ज़िक्र हदीसों में किया गया है।
** दुआ के क़ुबूल होने के लिए हर चीज़ से पहले दिल का गुनाहों से पाक होना ज़रूरी है, यानी पहले गुनाहों से तौबा करे गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ करे फिर दूसरी चीज़ों के लिए।
इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. से हदीस नक़्ल हुई है कि ख़बरदार तुममें से कोई अल्लाह से उसकी हम्द करने और पैग़म्बर स.अ. और उनकी आल अ.स. पर सलवात पढ़ने और अपने गुनाहों की तौबा करने से पहले किसी चीज़ का सवाल न करे। (बिहारुल अनवार, जिल्द 1, पेज 448-449)
** किसी का माल न छीने, किसी पर ज़ुल्म न करे और हराम निवाले से पेट न भरे, जैसाकि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया जो शख़्स अपनी दुआ को क़ुबूल होते हुए देखना चाहता है उसे अपने निवाले अपने खाने को हराम से दूर रखना होगा। (सफ़ीनतुल बिहार, जिल्द 1, पेज 448-449)
** फ़साद का मुक़ाबला करने और हक़ की तरफ़ दावत देने से पीछे न हटे, क्योंकि जिस किसी ने अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुन्कर से मुंह मोड़ा उसकी दुआ क़ुबूल नहीं होती, पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुन्कर करना ज़रूरी है वरना अल्लाह बुरे लोगों को अच्छे लोगों पर हाकिम बना देगा और फिर वह जितनी भी दुआ कर ले क़ुबूल नहीं होगी। (सफ़ीनतुल बिहार, जिल्द 1, पेज 448-449)
** अल्लाह से किए गए अहद और पैमान पर अमल करना, ईमान, नेक अमल और अमानतदारी भी दुआ के क़ुबूल होने की शर्तों में से है, क्योंकि जो शख़्स अल्लाह से किए गए अहद और पैमान को नहीं निभा सकता उसे अल्लाह के दुआ की क़ुबूल करने के वादे से उम्मीद लगाना बेकार है।
एक शख्स इमाम अली अ.स. के पास आया और अपनी दुआ के क़ुबूल न होने की शिकायत की और कहा कि अल्लाह ने तो दुआ के क़ुबूल करने का वादा किया है फिर हमारी दुआएं क्यों क़ुबूल नहीं होतीं? इमाम अ.स. ने उसके जवाब में फ़रमाया तुम्हारे दिल और तुम्हरी फ़िक्र ने आठ चीज़ों में ख़ियानत की है (इसलिए तुम्हारी दुआएं क़ुबूल नहीं होतीं)
1- तुमने अल्लाह को पहचानने के बाद भी उसका हक़ अदा नहीं किया, इसीलिए तुम्हारी अल्लाह की मारेफ़त ने तुम्हें कोई फ़ायदा नहीं पहुंचाया।
2- तुमने उसके भेजे हुए (रसूलों) पर ईमान लाने के बाद उनकी सुन्नत का विरोध किया, तो तुम्हारे ईमान का क्या फ़ायदा...।
3- उसकी किताब (क़ुर्आन) को पढ़ा तो लेकिन उस पर अमल नहीं किया, ख़ुद ही कहा कि हमने (आयतों) को सुना और इताअत की लेकिन फिर (अमल द्वारा) विरोध भी किया। 4- तुम कहते हो कि अल्लाह के अज़ाब से डरते हो लेकिन हमेशा ऐसे काम करते हो जिससे अज़ाब से क़रीब होते जाओ।
5- तुम कहते हो कि हमेशा अल्लाह के सवाब की आरज़ू रखते हो लेकिन काम ऐसे करते हो जिससे सवाब से दूर होते जाओ।
6- अल्लाह की नेमत का इस्तेमाल करते हो लेकिन उसके शुक्र का हक़ अदा नहीं करते।
7- तुमको हुक्म दिया गया है कि शैतान को अपना दुश्मन समझो और तुम शैतान से दुश्मनी का दावा तो करते हो लेकिन अपने अमल से उसका विरोध नहीं करते। (यानी तुम्हारे अमल से शैतान की दोस्ती दिखाई देती है)
8- तुम्हारी निगाहें लोगों की कमियों पर रहती हैं लेकिन अपनी कमियों को देखते ही नहीं, इन सारी मुश्किलों के बाद कैसे दुआ के क़ुबूल होने की उम्मीद रखते हो जबकि दुआ के क़ुबूल होने के सारे दरवाज़े तुमने ख़ुद बंद किए हैं।
** दुआ के क़ुबूल होने की एक और शर्त यह है कि इंसान अल्लाह के अहकाम पर अमल करते हुए हमेशा उसकी इताअत की राह पर चलने की कोशिश करता रहे। इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि बिना अमल के दुआ करने वाला ऐसा ही है जैसे कोई बिना कमान के तीर चला रहा हो। (नहजुल बलाग़ा, कलेमाते क़ेसार, 337)
नोट- हमारी दुआ के क़ुबूल न होने की वजह हमारी जेहालत या हमारे दिल में छिपा हुआ शिर्क होता है, तफ़सीरे अल-मीज़ान में मिलता है कि अल्लाह ने क़ुर्आन में फ़रमाया मैं ख़ुद उसकी दुआ को क़ुबूल करूंगा जिसने केवल मुझसे दुआ की और पूरे ख़ुलूस के साथ मुझसे अपने लिए ख़ैर का सवाल किया।
इसलिए अगर दुआ क़ुबूल न हुई तो इसका मतलब हमने अल्लाह से ख़ैर नहीं मांगा था बल्कि हक़ीक़त में वह शर था, और अगर ख़ैर था और हमारे हक़ में था तो हमने अल्लाह से पूरे ख़ुलूस और पूरी सच्चाई के साथ नहीं मांगा था बल्कि अल्लाह के अलावा दूसरा भी कोई शामिल था, या फिर हमारी दुआ का क़ुबूल होना हमारे हक़ में नहीं था कि जिसके बारे में हदीसों में है कि अगर ऐसा है तो आपकी दुआ बेकार नहीं जाएगी बल्कि उसके बदले में अल्लाह मुसीबतों और परेशानियों को आपसे दूर रखेगा और आपकी उस दुआ को आपकी आने वाली नस्ल के लिए महफ़ूज़ रखेगा या फिर उस दुआ का बदला आख़ेरत में देगा।
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