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Date of publication : 30/6/2018 18:8
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आले सऊद, तकफ़ीरियत और साम्राज्य के गठजोड़ की कहानी (1)

आले सऊद ने जहां तकफ़ीरियत और आतंकवाद का जन्म दे कर बढ़ावा दिया वहीं उस दौर के साम्राज्य की ग़ुलामी का हक़ अदा करते हुए मुक़द्दस दीन इस्लाम की पीठ में मुनाफ़ेक़त और फ़िर्क़ा परस्ती का वार भी किया है, और इन सबके पीछे आले सऊद के दो समझौते हैं जिसमें एक वहाबियत की बुनियाद रखने वाले मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के साथ और दूसरा ब्रिटेन के बूढ़े साम्राज्य के साथ जिसको विस्तार से इस लेख में बयान किया जाएगा।

विलायत पोर्टल : सऊदी अरब पर आले सऊद की हुकूमत वहाबियत की सरपरस्ती और साम्राज्य की ग़ुलामी की वजह से है बाक़ी है, जबकि तकफ़ीरियत और आतंकवाद वहाबियत के साथ ही साथ है, यानी अगर तकफ़ीरियत और आतंकवाद को निकाल दिया जाए तो वहाबियत की पहचान ही ख़त्म हो जाती है यही वजह है कि सऊदी हुकूमत ख़ुद को बाक़ी रखने के लिए वहाबियत, तकफ़ीरियत और आतंकवाद को बढ़ावा देती है अगर सऊदी इन सबको बढ़ावा देना छोड़ दे तो उसकी हुकूमत पर ख़तरा मंडलाने लगेगा, और इसी वजह से आले सऊद अपनी हुकूमत को बचाने के लिए हर तरह का ज़ुल्म और अपराध करने को हमेशा तैयार रहते हैं, और साम्राज्य की ग़ुलामी का नतीजा यह है कि वह दीनी और क़ौमी ग़ैरत को अलविदा कह कर दीन और अपने वतन से दुश्मनी जारी रखें हुए हैं, आले सऊद के इतिहास को पढ़ने के बाद यह बात साफ़ हो जाती है कि हमेशा आले सऊद ने जहां तकफ़ीरियत और आतंकवाद का जन्म दे कर बढ़ावा दिया वहीं उस दौर के साम्राज्य की ग़ुलामी का हक़ अदा करते हुए मुक़द्दस दीन इस्लाम की पीठ में मुनाफ़ेक़त और फ़िर्क़ा परस्ती का वार भी किया है, और इन सबके पीछे आले सऊद के दो समझौते हैं जिसमें एक वहाबियत की बुनियाद रखने वाले मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के साथ और दूसरा ब्रिटेन के बूढ़े साम्राज्य के साथ जिसको विस्तार से इस लेख में बयान किया जाएगा।

आले सऊद और मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के बीच समझौता

मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब ने 1160 हिजरी में आले सऊद से संबंध रखने वाले दरईया के हाकिम इब्ने सऊद के साथ एक समझौता किया जिसमें तय पाया कि नज्द और उसके आस पास के गांव के इलाक़े आले सऊद के क़ब्ज़े में रहेंगे और मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब ने उन्हें हुकूमत के टैक्स से ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा देने का वादा किया, जिसके बदले में इब्ने सऊद, इब्ने वहाब को अपनी विचारधारा फैलाने की पूरी आज़ादी देगा, इब्ने सऊद ने अल्लाह के नाम पर जंग करने के लिए मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब की बैअत की और कहा कि तौहीद का विरोध करने वालों के विरुध्द जंग करने और जिन बातों का तूने हुक्म दिया है उन सब के लिए तैयार हूं लेकिन इन दो शर्तों पर...

1- अगर हम तुम्हारा समर्थन करें और तुम्हारा साथ दें और अल्लाह हमें कामयाबी दे तो मुझे इस बात का डर है कि कहीं तुम लोग हमें छोड़ न दो और हमारी जगह किसी और से समझौता न कर लो? मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब ने ऐसा न करने का वादा किया।

2- अगर हम दरईया के लोगों पर टैक्स लागू करें तो मुझे डर है कि कहीं तुम उन्हें मना न कर दो? मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब ने इस शर्त पर भी कहा कि ऐसा नहीं करूंगा।

वहाबियत की हक़ीक़त के बारे और ज़्यादा जानकारी हासिल करने के लिए मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के बारे में जानकारी हासिल करना ज़रूरी है।

मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब 1111 या 1115 हिजरी में पैदा हुआ और 1207 में मरा, 90 साल से ज़्यादा ज़िंदा रहा, ऐनिया के इलाक़े नज्द में पला बढ़ा और जवान हुआ और हंबली फ़िर्क़े के उलमा से तालीम हासिल कर के मदीना चला गया, अहमद अमीन के अनुसार वह चार साल बसरा में रहा इसी तरह पांच साल बग़दाद, एक साल कुर्दिस्तान, दो साल हमदान और उसके बाद इस्फ़हान में रहा और अपनी ईजाद की हुई बिदअतों को लोगों के बीच फ़ैलाता रहा, उसके अपने भाई शैख़ सुलैमान ने उसकी ईजाद की हुई बिदअतों और उसके बातिल अक़ीदों के ख़िलाफ़ किताब लिखी जिसका नाम अस-सवाएक़ुल इलाहिय्या फ़िल-रद्दे अलल वहाबिय्या रखा, मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब नबुव्वत का झूठा दावा करने वाले लोगों जैसे मुसैलेमा कज़्ज़ाब, तलीहा असदी वग़ैरह की तालीमात और उनकी किताबों को बहुत शौक़ से पढ़ता था, जैसाकि उसी के दौर के बड़े आलिम मिर्ज़ा अबू तालिब इस्फ़हानी का इसके बारे में कहना था कि इसने नबुव्वत का दावा करने के साथ साथ यह भी कहा कि मेरे ऊपर वही नाज़िल होती है।

** शाफ़ई मज़हब के फ़क़ीह और बुज़ुर्ग आलिम अहमद ज़ैनी देहलान ने नक़्ल किया है कि एख शख़्स ने मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब से पूछा कि जिन अक़ीदों और विचारों को तू फ़ैला रहा है इनका सिलसिला तेरे उस्तादों से होते हुए किसी से मिलता है या यह सब तेरे ख़ुद के विचार हैं? उसने कहा कि मेरे उस्ताद और उनके उस्ताद 600 साल से सब के सब मुशरिक थे, तो उसने पूछा फिर यह तेरा दीन कहां से आ गया? उसने कहा कि हज़रत ख़िज़्र की तरह वही और इल्हाम द्वारा मैंने यह सब हासिल किया।

** मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब ने लिखा है कि मैं तुम्हें अपनी तरफ़ से ख़बर देता हूं कि अल्लाह की क़सम उसके अलावा कोई माबूद नहीं है, अल्लाह की ओर से आने वाली ख़बर (जो कि अल्लाह का मुझ पर एहसान है) से पहले मैं ला इलाहा इल्लल्लाह का मतलब भी नहीं जानता था और इस्लाम की मुझे कोई जानकारी नहीं थी और इसी तरह मेरे सभी उस्तादों में कोई भी इस्लाम की जानकारी नहीं रखता था।

कुछ विशेषज्ञों का कहना कि अगर मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब द्वारा इब्ने तैमिया के विचार और अक़ीदे फैयाए न जाते तो इब्ने तैमिया और उसके शागिर्द इब्ने क़ैय्यिम की मौत के बाद उसके सारे विचार और अक़ादे ख़त्म हो जाते और ज़मीन पर वहाबियत का वुजूद न होता, इब्ने सऊद ने मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब की बेटी से अपने बेटे अब्दुल अज़ीज़ की शादी की जिससे इन दोनों के बीच संबंध और गहरे हो गए और इसीलिए वह समझौता आज तक इन दोनों के बीच जारी है, जब मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब ने इस समझौते की कारण ख़ुद को मज़बूत समझा तो अपने पैरवी करने वालों को जमा कर के उन्हें जेहाद का शौक़ दिलाना शुरू किया और पड़ोस के शहरों के मुसलमानों को ख़त लिख कर अपने विचारों और अपनी लीडर शिप क़ुबूल करने का दबाव बनाया, वह आसपास के शहरों से नक़्द पैसों और दूसरी चीज़ों का दसवां हिस्सा वसूल करता था और अगर कोई विरोध करता तो उसपर हमला कर के लोगों को क़त्ल कर देता और उनके माल और दौलत को लूट कर उनकी बीवियों और बच्चों को गिरफ़्तार कर लेता था, उसका नारा था कि वहाबियत को क़ुबूल करो वरना क़त्ल कर दिए जाओगे और तुम्हारी औरतें विधवा और बच्चे यतीम हो जाएंगे।



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