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Date of publication : 2/7/2018 17:16
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आले सऊद, तकफ़ीरियत और साम्राज्य के गठजोड़ की कहानी (2)

तारीख़े नज्द नामी किताब में अब्दुल्लाह फ़ील्बी लिखता है कि इब्ने अब्दुल वहाब ने अपने शागिर्दों के दिमाग़ में जेहाद के वाजिब फ़लसफ़े को पूरी तरह बिठा दिया था उनमें से अधिकतर जेहाद को अपने लिए मुक़द्दस फ़र्ज़ समझते थे, इब्ने अब्दुल वहाब ने लूटे हुए माल का पांचवां हिस्सा केंद्रीय ख़ज़ाने से विशेष कर रखा था जिसे इब्ने सऊद और इब्ने अब्दुल वहाब अपनी ज़रूरत और अपनी मर्ज़ी के हिसाब से ख़र्च करते थे, इन्हीं सब के चलते इब्ने अब्दुल वहाब को एक या दो साल में ही हुकूमती मामलात में काफ़ी पकड़ हासिल हो गई थी।
विलायत पोर्टल : वहाबियत अपने बातिल अक़ीदों को फैलाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, अपने मक़सद को हासिल करने के लिए ही मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब ने दरईया में इब्ने सऊद के साथ समझौता किया, वह अपने मक़सद को हासिल करने के लिए हर बड़ी ताक़त के साथ समझौते के लिए तैयार था, तारीख़े नज्द नामी किताब में अब्दुल्लाह फ़ील्बी लिखता है कि इब्ने अब्दुल वहाब ने अपने शागिर्दों के दिमाग़ में जेहाद के वाजिब फ़लसफ़े को पूरी तरह बिठा दिया था उनमें से अधिकतर जेहाद को अपने लिए मुक़द्दस फ़र्ज़ समझते थे, इब्ने अब्दुल वहाब ने लूटे हुए माल का पांचवां हिस्सा केंद्रीय ख़ज़ाने से विशेष कर रखा था जिसे इब्ने सऊद और इब्ने अब्दुल वहाब अपनी ज़रूरत और अपनी मर्ज़ी के हिसाब से ख़र्च करते थे, इन्हीं सब के चलते इब्ने अब्दुल वहाब को एक या दो साल में ही हुकूमती मामलात में काफ़ी पकड़ हासिल हो गई थी।

आपको यह पढ़ कर आश्चर्य होगा कि वहाबियत ने तलवार और जंग को अपना नारा बना रखा था जिस पर सऊदी हुकूमत शुरू से आज तक बाक़ी है, नज्द वासियों ने जब इब्ने अब्दुल वहाब से समझौता किया था तब वो बहुत फ़क़ीरी की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे यहां तक इब्ने सऊद, इब्ने अब्दुल वहाब के शागिर्दों के खाने का इंतेज़ाम करने के लिए भी मोहताज था, पड़ोस के मुसलमान शहरों पर हमला कर लूटे गए माल को अलग अलग हिस्सों में बांटता था जिसमें से पांचवा हिस्सा इब्ने सऊद के लिए और बाक़ी फ़ौज के लिए था, और इनमें से भी पैदल वालों का अलग और सवार फ़ौजियों का अलग हिस्सा होता था और जो किसी पद पर लोग थे उनके लिए विशेष हिस्सा होता था, इब्ने अब्दुल वहाब के अक़ीदे के हिसाब से मुशरिकों पर हमला कर के उनको लूटा जाता और उनके माल को आपस में बांट लिया जाता था।
इब्ने अब्दुल वहाब ने अमीर ग़ईना उस्मान को अपने आतंकियों द्वारा मस्जिद की मेहराब में मार डाला, वहाबियों द्वारा छापी गई किताब तारीख़े नज्द में इब्ने अब्दुल वहाब के ख़त मौजूद हैं जिसमें ज़िक्र हुआ है कि उस्मान इब्ने मोअम्मर काफ़िर और मुशरिक था जब मुसलमानों को उसके कुफ़्र का यक़ीन हो गया तो उन्होंने जुमे की नमाज़ के बाद उसकी हत्या की ठान ली, इससे पता चलता है कि मस्जिद में हत्याओं का सिलसिला भी इन्हीं वहाबियों की फ़ितरत में शामिल है, ऐनिया की अवाम ने हुकूमत और इब्ने अब्दुल वहाब के अत्याचारों के विरुध्द विद्रोह किया लेकिन उन लोगों को उन हाकिमों के ज़ुल्म का सामना करना पड़ा जिनको इब्ने अब्दुल वहबा के फ़तवों और उसकी बिदअतों का समर्थन हासिल था, उन हाकिमों ने उन लोगों पर हमला कर के पूरे शहर को बर्बाद कर दिया घरों और बिल्डिंगों को गिरा दिया, कुवों को मिट्टी डाल कर बंद कर दिया, पेड़ों को जला दिया, औरतों की इस्मत तार तार कर डाली, जिन औरतों के पेट में बच्चे थे उनके पेट का चीर दिया, बच्चों के हाथों को काट कर जला दिया, घरों से जानवरों समेत सभी चीज़ों को लूट लिया, 1163 हिजरी से ले कर आज तक ऐनिया शहर खंडहर बन कर रह गया है।

मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब इस बिदअत को फैलाने, हत्याएं और लूटपाट करने और हज़ारों बे गुनाह मासूमों के ख़ून को ज़िम्मेदार है, इस बारे में इसके भाई शैख़ सुलैमान का बयान काफ़ी है जिसने कहा कि तुम मामूली बातों पर यहां तक कि शक की बिना पर कुफ़्र के फ़तवे सादिर करते हो, इस्लाम की साफ़ लफ़्ज़ों में मौजूद तालीमात का इंकार करते हो बल्कि वह लोग जो तुम्हारे तकफ़ीरी फ़तवों को नहीं मानते तुम उन्हें भी काफ़िर क़रार देते हो, मोहम्म्द इब्ने अब्दुल वहाब का भाई शैख़ सुलैमान इब्ने अब्दुल वहाब अपनी किताब अल-सवाएक़ुल इलाहिय्या में लिखता है कि आज लोग ऐसे शख़्स (मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब) के जाल में फ़ंस चुके हैं कि जो क़ुर्आन और सुन्नत का ग़लत इस्तेमाल करते हुए अपने विरोधियों को कोई अहमियत नहीं देता, अगर उससे यह कहा जाए कि अपने विचारों और अक़ीदों को आलिमों के सामने पेश करो तो मना कर देता है बल्कि लोगों पर अपनी पैरवी वाजिब क़रार देता है और जो उसका विरोध करे उसे काफ़िर बताता है, उसके अंदर मुज्तहिद वाली कोई शर्त नहीं पाई जाती, ख़ुदा की क़सम ख़ुदा की क़सम (दो बार क़सम खा कर कहा) मुज्तहिदों के इल्म और किरदार का दसवां हिस्सा भी इसके पास नहीं है, उसके विचार अधिकतर जाहिलों के बीच फैले हुए हैं, सारी उम्मत एक साथ उसका विरोध कर रही है लेकिन वह जाहिल और काफ़िर बताते हुए किसी का कोई जवाब नहीं देता, ख़ुदाया इस गुमराह की हिदायत कर और उसे हक़ की तरफ़ पलटा दे।

इसके बाद वह लिखता है कि मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब जिन वजहों से लोगों को काफ़िर बताता है और उनके क़त्ल का फ़तवा देता है उसका मतलब यह है कि अहमद इब्ने हंबल के ज़माने से उम्मत के सारे उलमा और अवाम काफ़िर हैं...... फिर वह लिखते हैं जो कुछ तुम कहते हो मैं उससे अल्लाह की पनाह चाहता हूं।
आपका ध्यान 6 ज़िलहिज्जा 1407 हिजरी के ऐसे जुमे की ओर दिलाना चाहता हूं जिसे काला जुमा कहा जाता है कि जब शाह फहेद के हुक्म पर हज़ारों हाजियों को हरम में क़त्ल कर दिया गया और उनका केवल यह गुनाह था कि वह मुसलमानों को इत्तेहाद और एकता की ओर दावत देते हुए एक जगह जमा हो कर अल्लाह को पुकार रहे थे और अमन और शांति के शहर मक्का में सबसे बड़े साम्राज्य अमरीका और इस्राईल के ख़िलाफ़ मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे, यह वह भारी क़ीमत थी जो मुसलमानों ने उस दिन सबसे बड़े शैतान अमरीका और इस्राईल जैसे दरिंदे से अपने संबंध न होने का ऐलान करते हुए अमरीका और इस्राईल के ग़ुलाम और उनके तलवे चाटने वाले वबाबियों के हाथों ख़ून में नहा कर चुकाई।



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