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Code : 194421
Date of publication : 5/7/2018 16:5
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आले सऊद, तकफ़ीरियत और साम्राज्यवाद के गठजोड़ की कहानी (3)

आश्चर्य की बात है कि यह हक़ीक़त अब्दुल अज़ीज़ को नहीं पता और वह यह कहे जो लोगों (ब्रिटिश साम्राज्य) का शुक्रिया नहीं अदा करता वह ख़ुदा का शुक्रिया नहीं अदा कर सकता जबकि इन वहाबियों का अक़ीदा यह है कि पैग़म्बर स.अ. और दूसरे किसी भी अल्लाह के वली की क़ब्र के सामने नमाज़ पढ़ना हराम है और उनके अक़ीदे के हिसाब से अल्लाह की इबादत में अल्लाह का वली शामिल हो जाएगा और यह शिर्क है तो अब्दुल अज़ीज़ कैसे ब्रिटेन के शुक्रिये को अल्लाह का शुक्रिया बता रहा है... कि अगर इन साम्राज्यवादी ताक़तों का शुक्रिया अदा नहीं किया तो समझो अल्लाह का शुक्रिया अदा नहीं किया।
विलायत पोर्टल :  आले सऊद का ब्रिटिश साम्राज्य से समझौता आले सऊद ने अपनी हुकूमत को बाक़ी रखने के लिए बूढ़े साम्राज्य के साथ एक समझौता किया, 1328 हिजरी में अब्दुल अज़ीज़ इब्ने सऊद ने कुवैत में ब्रिटेन के दूत विलियम से मुलाक़ात शुरू की, तीसरी मुलाक़ात के बाद इब्ने सऊद ने इस्लामी उम्मत की पीठ पर वार करते हुए ब्रिटेन के सामने पेशकश रखी कि नज्द और एहसा शहर को उस्मानी हुकूमत से छीनने का बेहतरीन मौक़ा यही है, इस तरह एक घटिया समझौता हुआ कि ब्रिटेन नज्द और एहसा में रियाज़ के हाकिम को समर्थन करेगा और उस्मानी हुकूमत की ओर से ज़मीनी और समुद्री हमलों की सूरत में अब्दुल अज़ीज़ की हुकूमत की मदद करेगा और इलाक़े में आले सऊद की हुकूमत के बाक़ी रहने के लिए कोशिश करता रहेगा, अब्दुल अज़ीज़ ने भी ख़ुद के बिके होने का सबूत देते हुए वादा किया कि ब्रिटेन हुकूमत के उच्चाधिकारियों से मशविरे के बिना किसी दूसरी सरकार से बातचीत नहीं करेगा।
यह समझौता नज्द और उसके आस पास के इलाक़ों पर लागू हुआ और इसी तरह धीरे धीरे ब्रिटिश साम्राज्य का प्रभाव बढ़ता गया, ब्रिटिश साम्राज्य की आरज़ू थी कि पहले विश्व युध्द के बाद यह समझौता मध्य पूर्व के बड़े हिस्से पर बल्कि पूरे अरब पर लागू हो, 1362 हिजरी में अब्दुल अज़ीज़ ने जुमे के ख़ुत्बे में कहा कि यहां पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिसने मख़लूक़ का शुक्रिया नहीं अदा किया उसने अल्लाह का शुक्रिया अदा नहीं किया, इसके बाद ब्रिटेन हुकूमत के गुणगान शुरू कर दिए कि उन्होंने हाजियों के सफ़र को आसान बनाने के लिए पानी के जहाज़ का प्रबंध किया, उन्होंने हमारे देश की माली मदद की और रोज़ाना के इस्तेमाल की चीज़ें हमें दीं जिनकी हमें सख़्त ज़रूरत थी,
अल्लामा शहीद मुग़निया कहते हैं कि हर छोटा बड़ा इस बात को जानता है कि ब्रिटेन और दूसरी सभी साम्राज्यवादी ताक़तों का इंसानियत के लिए किसी भी तरह का काम करना मुमकिन ही नहीं है और अगर किसी देश या किसी क़ौम के हक़ में यह कोई काम करें तो समझ लो कि उस देश या उस क़ौम पर क़ब्ज़ा करना चाहता है क्योंकि साम्रज्यवाद का काम केवल इंसानियत का ख़ून चूसना है यह किसी को फ़ायदा नहीं पहुंचा सकते।
आश्चर्य की बात है कि यह हक़ीक़त अब्दुल अज़ीज़ को नहीं पता और वह यह कहे जो लोगों (ब्रिटिश साम्राज्य) का शुक्रिया नहीं अदा करता वह ख़ुदा का शुक्रिया नहीं अदा कर सकता जबकि इन वहाबियों का अक़ीदा यह है कि पैग़म्बर स.अ. और दूसरे किसी भी अल्लाह के वली की क़ब्र के सामने नमाज़ पढ़ना हराम है और उनके अक़ीदे के हिसाब से अल्लाह की इबादत में अल्लाह का वली शामिल हो जाएगा और यह शिर्क है तो अब्दुल अज़ीज़ कैसे ब्रिटेन के शुक्रिये को अल्लाह का शुक्रिया बता रहा है... कि अगर इन साम्राज्यवादी ताक़तों का शुक्रिया अदा नहीं किया तो समझो अल्लाह का शुक्रिया अदा नहीं किया।
ब्रिटेन के कमज़ोर होने के बाद उसकी जगह अमेरिका ने ले ली, उस दौरान विश्व स्तर पर कुछ बदलाव शुरू हुए जो आले सऊद के तो पक्ष में थे लेकिन मुसलमानों के लिए बहुत हानिकारक थे चूंकि पहले विश्व युध्द के बाद उस्मानी हुकूमत के ख़त्म होने और जर्मनी के टुकड़े होने के बाद अरब में तुर्की का रोल ख़त्म हो गया और केवल ब्रिटेन साम्राज्य का क़ब्ज़ा बाक़ी बचा और इसी ब्रिटेन के इशारे पर 1343 हिजरी में आले सऊद के बादशाह अब्दुल अज़ीज़ ने हेजाज़ पर हमला कर ताएफ़ को घेर लिया और फिर ज़बरदस्ती शहर में घुस कर 2 हज़ार लोगों का क़त्ल कर डाला जिनमें बहुस सारे उलमा और नेक लोग भी थे, इन लोगों ने अपनी आदत के मुताबिक़ लूटपाट की और ऐसे भयानक जुर्म और अपराध किए जिससे इंसानियत कांप उठे।
ताएफ़ की जंग के बाद अब्दुल अज़ीज़ के लिए हेजाज़ का रास्ता खुल गया और ब्रिटिश साम्राज्य चाह रहा था कि मक्का पर हुकूमत कर रहे शरीफ़ हुसैन और उसके बेटों से छुटकारा पाया जाए और इस मक़सद को हासिल करने का बेहतरीन रास्ता अरब के लोगों को आपस में जंग करवाना था, ब्रिटेन ने शरीफ़ हुसैन और हाशमी ख़ानदान की जगह वहाबियों को हुकूमत दिलाने के लिए हर हथकंडा अपनाया जैसे माली मदद को रोकना, फ़ौजियों की तंख़्वाह काटना वग़ैरह, शरीफ़ हुसैन की हालत इतनी बुरी हो गई कि वहां के बड़े बड़े उलमा और ताजिरों ने इब्ने सऊद को ख़ुश करने के लिए शरीफ़ हुसैन को सत्ता से हटा दिया, इस तरह वहाबी बिना किसी युध्द के मक्का में दाख़िल हो गए, मक्का में दाख़िल होते ही अब्दुल अज़ीज़ का वहां की फ़ौज ने स्वागत किया और उसने जाते ही वहां के उलमा के साथ मीटिंग कर के उन्हें वहाबी विचारधारा अपनाने पर मजबूर कर दिया।
वहाबियत को ख़ुश करने के लिए इब्ने अब्दुल अज़ीज़ ने मक्का, जद्दा और मदीना से इस्लामी धरोहर को मिटाने की ठान ली, मक्के में मौजूद हज़रत अब्दुल मुत्तलिब, हज़रत अबू तालिब, उम्मुल मोमेनीन हज़रत ख़दीजा के अलावा पैग़म्बर स.अ. की विलादत की जगह और हज़रत ज़हरा स.अ. के रौज़े के गुंबदों को गिरा दिया बल्कि सभी ज़ियारत की जगहों और उन पर बने गुंबदों को ढ़हा दिया, जब मदीने को घेरा तो हज़रत हमज़ा नामी मस्जिद और मदीने से बाहर बहुत सारी ज़ियारत वाली जगहों को गिरा दिया, अली वरदी का बयान है कि जन्नतुल बक़ी मदीना में पैग़म्बर स.अ. के दौर और उनके बाद का क़ब्रिसतान था जहां पैग़म्बर स.अ. के चचा हज़रत अब्बास, हज़रत उस्मान, पैग़म्बर स.अ. की बीवियां, बहुत सारे सहाबा और ताबेईन के अलावा चार इमामों (इमाम हसन अ.स., इमाम सज्जाद अ.स., इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स., इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स.) की क़ब्रें थीं और इन चारों इमामों की क़ब्रों पर भी ईरान और इराक़ में बाक़ी इमामों की क़ब्रों की तरह ख़ूबसूरत ज़रीह मौजूद थी जिन्हें वहाबियों ने ढ़हा दिया।
लेकिन हर अक़्लमंद इंसान को यह सोंचना चाहिए कि इसी सऊदी में आज भी ख़ैबर के क़िले के बचे हुए अंश वैसे ही मौजूद हैं और उसकी देख रेख भी होती है और दुनिया भर के यहूदी आ कर उसे देखते हैं जिससे साफ़ ज़ाहिर है कि आले सऊद का यहूदियों जो मुसलमानों के खुले हुए दुश्मन हैं उनसे कितने मधुर संबंध हैं।
कौन नहीं जानता कि पूरी दुनिया में आज मुसलमानों का यही ज़ायोनी यहूदी क़त्लेआम कर रहे हैं उसके बावजूद यह वहाबी उनसे हर तरह के मामलात अंजाम दे रहे हैं, इसलिए उलमा की ज़िम्मेदारी है कि पूरी दुनिया के मुसलमानों का क़त्लेआम करने वाले ज़ायोनियों से आले सऊद की दोस्ती का पर्दा फ़ाश करते हुए उनकी मुनाफ़ेक़त को सबके लिए ज़ाहिर करें। .................


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