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Date of publication : 8/7/2018 10:3
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शायद आप भी यही चाहते हों!

इस तरह शरीयत ने हमारा काम आसान कर दिया, अब यहां एक चीज़ पर ध्यान देना ज़रूरी है वह यह कि अगर आप गोश्त ख़रीद रहे हैं और आप को यह नहीं मालूम कि यह इस्लामी तरीक़े से ज़िबह हुआ है या नहीं (यानी अल्लाह का नाम लेकर और क़िबले के रुख़ पर ज़िबह हुआ है या नहीं) तो आप उसे नहीं खा सकते क्योंकि उसके हलाल होने में शरई तरीक़े से ज़िबह करना शर्त है, इसे ध्यान में रखिए।
विलायत पोर्टल :  आज के समय में तो इंसानों के खूंन की होली, आपस में नफ़रत और दुश्मनी और समाज में बेशर्मी बे वफ़ाई बढ़ चढ़ कर दिखाई देती है, और अगर आप इन सब के कारणों को जानना चाहें तो कई सारे निकलेंगे लेकिन जो बिल्कुल सामने की बात है जिसे कुछ जानकार लोगों द्वारा बताया गया है वह इस प्रकार है कि खान पान में बदलाव और बाज़ार पर अल्लाह से दूरी रखने वालों का क़ब्ज़ा अहम कारण हैं! बताते हैं कि खाने पीनी की चीज़ों में हराम की मिलावट अलग अलग तरीक़ों से की जा रही है जैसे दवाइयों में इस्तेमाल होने वाले कैप्सूल में सुवर की चर्बी की मिलावट करते हैं, इसी तरह हलाल गोश्त और शरई ज़िबह करने का तरीक़ा बदल कर नए नए तरीक़े निकाले जा रहे हैं, बच्चों की पसंदीदा चॉकलेट शराब में डूबी हुई रहती हैं; चूंकि बड़े स्तर मंडी ऐसे लोगों के हाथों में है जो दौलत और डॉलर जमा करने की हवस रखते हैं जिसके लिए वह किसी भी ग़लत रास्ते पर जाने से परहेज़ नहीं करते जिसका नतीजा यह होता है कि बेशर्मी और आपसी दूरियां समाज में फैलती जा रही है! सवाल: तो इससे बचने का रास्ता क्या है? जवाब: इस्लाम ने तो हलाल और हराम बता कर हमारी रहनुमाई कर दी है और साथ ही हमारे लिए बहुत आसान क़ानून बना कर हमारी ज़िन्दगी आसान बना दी है और वह यह कि.....
1- मुसलमानों के बाज़ार से सामान ख़रीदने में कोई मुश्किल नहीं है।
2- पैक मिलने वाली चीज़ें हम इस्तेमाल कर सकते हैं, यहां तक कि हम बाज़ार से खाने पीने की चीज़ें ख़रीदें तो अगर उसकी नजासत का यक़ीन न हो तो वह भी पाक है।
इस तरह शरीयत ने हमारा काम आसान कर दिया, अब यहां एक चीज़ पर ध्यान देना ज़रूरी है वह यह कि अगर आप गोश्त ख़रीद रहे हैं और आप को यह नहीं मालूम कि यह इस्लामी तरीक़े से ज़िबह हुआ है या नहीं (यानी अल्लाह का नाम लेकर और क़िबले के रुख़ पर ज़िबह हुआ है या नहीं) तो आप उसे नहीं खा सकते क्योंकि उसके हलाल होने में शरई तरीक़े से ज़िबह करना शर्त है, इसे ध्यान में रखिए।
दिलचस्प बात यह है कि एक गै़र मुस्लिम जोड़ा इस्लाम क़ुबूल करने के बाद 30 साल तक इस मसले पर अमल करते हुए गोश्त खाने परहेज़ करता रहाl सख़्ती के साथ आसानी अल्लाह का वादा है और इस वादे को हम कभी भूल नहीं सकते,और दुनिया तो मुश्किलों का दूसरा नाम है ही, रही बात यह कि रूह पर इसका असर जो पड़ता है उससे कैसे बचा जाए? तो आप भी इस बारे में अपने सुझाव दे सकते हैं, कुछ मशविरे और सुझाव इस प्रकार हैं....
1- बाज़ार पर मुसलमान कंट्रोल कर सकते हैं, मुस्लिम देश (जो लगभग 56 के आसपास हैं) एक जगह पूरे नेक इरादे के साथ जमा हो कर एक इस्लामी अहकाम की जानकारी रखने वाली कमेटी बनाएं; अच्छी चलेगी;
2- इस्लामी देश हराम और नापाक चीज़ें अपने देशों में वैसे ही न आने दें जिस तरह अपने घरों और अपने मोहल्लों में ज़हरीले खाने नहीं आने देते 3- इस्लाम दुश्मन ताक़तों की यह दिली तमन्ना है कि आज की जवान नस्ल बे दीन रहे जिसके लिए वह अपनी संस्कृति और अपना कल्चर अपनी पॉलिसी मुसलमानों के बीच दाख़िल कर रही हैं और अफ़सोस इस्लाम के ठेकेदारों पर जो जो घिसे पिटे और ग़ैर ज़रूरी कामों में लगे हुए हैं या उन्हीं में से कुछ अपने मुस्लिम भाइयों को क़त्ल में आनंद महसूस करते हैं!!!
तो अब हम आसमान में उड़ती चिड़िया पकड़ने जैसे उन मशविरे के पूरे होने की उम्मीद लगा कर बैठने से पहले हम इतना ज़रूर कर सकते हैं मार्केट से शक वाली चीज़ें न लें, कभी कभी देसी चीज़ों से काम चलाएं, बच्चों के लिए घर ही में दिलचस्प खाने पीने की चीज़ों का इंतज़ाम करेंl भाई जान मुश्किल ज़रूर है लेकिन ना मुमकिन नहीं है, हालांकि यह लेख आपको मुश्किल में डालने के लिए नहीं बल्कि आपको आगाह करने के लिए है।
हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद मुशाहिद आलम रिज़वी (तंज़ानिया)
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