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Date of publication : 4/8/2018 16:23
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जवानी की अहमियत

जवानी मारेफ़त के कमाल का वह दौर है जिसमें बचपन की कमज़ोरियों और नाकामियों का तजुर्बा भी होता है और बुढ़ापे की कमज़ोरियों का अंदाज़ा भी, ऐसे में अगर इंसान थोड़ा सा भी ग़ाफ़िल हो जाए तो कभी काम करने के क़ाबिल नहीं बचेगा और ऐसे समय में अगर बेदार और जागरूक न हुआ तो क़यामत तक बेदार और जागरूक नहीं हो सकता।

विलायत पोर्टल :  इंसान की ज़िंदगी तीन दौर से गुज़रती है:
बचपन,
जवानी
बुढ़ापा
बचपन में इंसान सोचने और विचार करने की शक्ति नहीं रखता और बुढ़ापे में दोबारा इंसान की सोचने और विचार करने और दूसरी जिस्मानी शक्तियां कमज़ोर हो जाती हैं। जवानी वह दौर है जब इंसान की सोचने और समझने की शक्ति पूरी हो जाती है और यही वजह है कि इंसानी समाज में जितने भी अहम काम होते हैं वह लगभग जवानों के हवाले किए जाते हैं।
ज़मीन के अंदर छिपे हुए ख़ज़ानों को निकालने के लिए जवानों की मदद ली जाती है क्योंकि क़ीमती हीरे जवाहेरात का अच्छा और बुरा इस्तेमाल तो कमज़ोर और बूढ़े लोगों को भी आता है लेकिन उसको ज़मीन की गहराइयों से निकालने का काम जवानों के अलावा कोई और नहीं कर सकता।
देश की सीमा की सुरक्षा का समय जब आता है तो देश के जवानों को ही याद किया जाता है और यह अहम और बुनियादी काम उन्हीं से लिया जाता है और जब हुकूमतों को अपना उल्लू सीधा करना होता है तो "जय जवान" का नारा लगा कर उनकी प्रतिभाओं और उनकी ज़िंदगी को क़ुर्बान कर के अपनी हुकूमत को मज़बूत भी किया जाता है।
समाज से जुड़े कामों में हिस्सा लेने का सिलसिला भी जवानी से शुरू होता है और इंसान सामाजिक ज़िंदगी में जवानी के बाद ही सक्रिय होता है और यही वजह है जेहालत के दौर में धूमधाम से जवानी का जश्न मनाया जाता था ताकि नौजवानों को एहसास दिलाया जा सके कि अब वह सामाजिक कामों का बोझ उठाने के लिए तैयार हैं और अब उनका फ़र्ज़ है कि सामाजिक कामों को अंजाम दें और अपनी प्रतिभा और शक्ति को लोगों के सामने पेश करें।
हक़ीक़त में जवानी पहाड़ की उस चोटी का नाम है जिसके दोनों तरफ़ खाई है और पहाड़ की चोटी पर पहुंचने के लिए उसी खाई से अपने सफ़र को शुरू करता है और जब पहाड़ की चोटी पर पहुंचता है तो दूसरी ओर मौजूद खाई में गिरने का ख़तरा बन जाता है।
पहाड़ की उस चोटी का सबसे बड़ा फ़ायदा यह होता है कि इंसान को दोनों तरफ़ की ख़बर रहती है और वहां पर खड़े रह कर हर दृश्य को देख सकता है, ज़ाहिर है पहाड़ के एक तरफ़ पाई जाने वाली खाई में रहने वाले को न पहाड़ की बुलंदी और ऊंचाई की ख़बर होती है न पहाड़ के उस तरफ़ मौजूद खाई की, लेकिन यही इंसान जब पहाड़ की चोटी पर खड़ा होता है तो उसे इधर के हालात की भी ख़बर होती है और उधर के हालात का अंदाज़ा भी हो जाता है।
जवानी मारेफ़त के कमाल का वह दौर है जिसमें बचपन की कमज़ोरियों और नाकामियों का तजुर्बा भी होता है और बुढ़ापे की कमज़ोरियों का अंदाज़ा भी, ऐसे में अगर इंसान थोड़ा सा भी ग़ाफ़िल हो जाए तो कभी काम करने के क़ाबिल नहीं बचेगा और ऐसे समय में अगर बेदार और जागरूक न हुआ तो क़यामत तक बेदार और जागरूक नहीं हो सकता।
आश्चर्य होता है कि ऐसे सोचने और समझने के कमाल के दौर को जवानी दीवानी का नाम दे दिया जाता है और इस तरह जवानी की इल्मी और अमली प्रतिभाओं का मज़ाक़ उड़ाया जाता है, इस्लाम ने जवानी की इसी अहमियत को सामने रख कर बचपन को अपने अहकाम की ज़िम्मेदारी से आज़ाद रखा है और बुढ़ापे को बहुत सारी ज़िम्मेदारी से आज़ाद कर दिया लेकिन जवानों के कंधों पर ज़िम्मेदारी का हर बोझ रख दिया और उन्हें महसूस करा दिया कि यह काम उन्हीं के बस का है। दुनिया की क़ौमें खान की खुदाई और सरहदों की रक्षा के लिए जवानों का इस्तेमाल करती है, लेकिन जब इल्मी या अमली रहबरी और नेतृत्व की बात आती है तो उम्र के आधार पर जवानी की प्रतिभाओं को अनदेखा कर दिया जाता है और एक से एक बूढ़े इंसान को क़ब्र से निकाल कर रहबर और ख़लीफ़ा का टाइटल दे दिया जाता है।
पैग़म्बर स.अ. ने इस दुनिया के तरीक़े का विरोध करते हुए हमेशा नौजवानों को आगे बढ़ाया और उनकी प्रतिभाओं को इस्तेमाल करने का मौक़ा दिया।
** मुसअब इब्ने उमैर ने छिप कर इस्लाम क़ुबूल किया तो उस्मान इब्ने तलहा ने उन्हें नमाज़ पढ़ता देख उनकी मां से शिकायत कर दी और मां ने गिरफ़्तार करा दिया लेकिन उन्होंने सब्र किया और जब मदीने के कुछ लोगों ने इस्लाम क़ुबूल कर के मदीने के लिए इस्लामी तालीम देने वाले की मांग की तो आपने मुसअब को भेज दिया जबकि वह बिल्कुल जवान थे, मुसअब ने मदीने पहुंच कर असीद इब्ने ख़ुज़ैर और साद इब्ने मआज़ को मुसलमान बना लिया और जुमे की नमाज़ का सिलसिला शुरू कर दिया जिसके बाद लगातार लोग इस्लाम क़ुबूल करने लगे।
** मक्का फ़तेह होने के बाद पैग़म्बर स.अ. हुनैन की तरफ़ चल दिए तो मक्के में एताब इब्ने असीद को अपना वकील बनाया जिनकी उम्र केवल 21 साल थी, लोगों ने आपत्ति जताई कि किसी बड़े को बनाइए, तो आपने फ़रमाया बड़ा अफ़ज़ल नहीं होता बल्कि अफ़ज़ल, बड़ा होता है यानी बुज़ुर्गी का आधार बड़ा होना नहीं अफ़ज़ल होना है।
** पैग़म्बर स.अ. ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लश्कर का सरदार उसामा इब्ने ज़ैद को बनाया था जिनकी उम्र केवल 18 साल थी, कर्बला में आशूर के दिन इमाम हुसैन अ.स. के लश्कर का मोअज़्ज़िन एक 18 साल का जवान ही था।
** इमाम सादिक़ अ.स. का इरशाद है कि अगर मुझे कोई शिया नौजवान दीन से भटका हुआ दिख गया तो मैं उसे सख़्त सज़ा दूँगा।
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