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Code : 194900
Date of publication : 11/8/2018 6:44
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इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. की ज़िंदगी पर एक निगाह

इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. की विलादत के समय अमीन की हुकूमत थी, सन् 198 हिजरी में मामून हाकिम बना और 218 हिजरी मोतसिम सत्ता में आया और 220 हिजरी में उसी ने ज़हर दे कर शहीद कर दियाl आपकी शहादत 29 ज़ीक़ादा 220 हिजरी को 25 साल की उम्र में हुई और आपकी क़ब्र आपके जद इमाम काज़िम अ.स. के पहलू में काज़मैन में हैl

विलायत पोर्टल :आपकी विलादत 10 रजब सन 195 हिजरी को जुमे के दिन मदीने में हुई, आपके वालिद इमाम रज़ा अ.स. और वालेदा ख़ैज़रान ख़ातून थीं जो मारिया क़िबतिया के घराने से था जिनकी अज़मत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इमाम मूसा काज़िम अ.स. ने उमरा के सफ़र पर अपने सहाबी यज़ीद इब्ने सलीत से कहा था कि बहुत जल्द तुम्हारी मुलाक़ात मेरे बेटे अली रज़ा अ.स. से होगी और उसे अल्लाह मारिया क़िबतिया के ख़ानदान की बेटी से एक बेटा अता करेगा, तुम मेरे बेटे को उस बेटे की बशारत दे देना और अगर हो सके तो उस ख़ातून तक मेरा सलाम पहुंचा देना जो मेरे बेटे के वारिस को जन्म देगीl

इमाम रज़ा अ.स. की बहन जनाब हकीमा नक़्ल करती हैं कि इमाम मोहम्मत तक़ी अ.स. की विलादत की शब इमाम रज़ा अ.स. ने मुझे अपने घर रोक लिया मैंने अचानक देखा कि चिराग़ की रौशनी मध्यम पड़ गई और कुछ ही देर में इलाही नूर ने पूरी ज़मीन को रौशन कर दिया, इमाम रज़ा अ.स. घर में आए मैंने बच्चे को उनकी गोद में दिया उन्होंने उसे प्यार किया और मुझे उसकी हिफ़ाज़त की ताकीद कर के चले गए, तीसरे दिन मैंने देखा बच्चे ने आसमान की तरफ़ देखते हुए तौहीद और रिसालत की गवाही दी, मैं हैरत में पड़ गई और मैंने इमाम रज़ा अ.स. से बयान किया तो उन्होंने फ़रमाया कि अभी ऐसी बहुत सी करामात सामने आने वाली हैंl

आपकी विलादत के समय अमीन की हुकूमत थी, सन् 198 हिजरी में मामून हाकिम बना और 218 हिजरी मोतसिम सत्ता में आया और 220 हिजरी में उसी ने ज़हर दे कर शहीद कर दियाl

आपकी शहादत 29 ज़ीक़ादा 220 हिजरी को 25 साल की उम्र में हुई और आपकी क़ब्र आपके जद इमाम काज़िम अ.स. के पहलू में काज़मैन में हैl
इमाम रज़ा अ.स. ने जिस समय मामून के ज़बर्दस्ती करने पर ख़ुरासान का सफ़र किया तो उस समय आपकी उम्र केवल 5 साल की थी और फिर उसके बाद कोई मुलाक़ात आपकी नहीं हो पाई जो इस बात की दलील है कि इमाम के सारे कमालात और करामात अल्लाह की ओर से होते हैं उन्हें किसी से तालीम हासिल करने की ज़रूरत नहीं होती हैl

इमाम रज़ा अ.स. की शहादत के बाद आपको भी अपने वालिद की तरह ज़बर्दस्ती बग़दाद बुला लिया गया ताकि आप अपनी मज़लूमियत का ऐलान न कर सकें और फिर लोगों के समर्थन को हासिल करने के लिए आपसे अपनी बेटी की शादी का ऐलान कर दिया, दरबारियों ने दबे शब्दों में आपत्ति ज़ाहिर की कि वह अभी छोटे हैं और यह काम तालीम और तरबियत के बाद होना चाहिए, मामून ने जवाब दिया कि यह अल्लाह की बारगाह से तालीम हासिल किए हुए होते हैं उन्हें तालीम की ज़रूरत नहीं है, शक हो तो आज़मा के देख लिया जाए, फिर यहया इब्ने अक्सम को बुलाया गया और सवाल किया गया कि अगर कोई एहराम की हालत में शिकार कर ले तो उसका क्या कफ़्फ़ारा है?

आपने फ़रमाया पहले इस मसले को पूरी तरह बयान करो कि जिसका शिकार किया है वह परिंदा था या चरने वाला कोई जानवर? छोटा था या बड़ा? शिकार करने वाला बालिग़ था या ना बालिग़? शिकार पहली बार किया या दोबारा? शिकार हरम की सरहद के अंदर हुआ या बाहर? जानबूझ कर शिकार किया या भूल कर? एहराम हज का था या उमरे का? शिकारी आज़ाद था या ग़ुलाम?

यहया इन सवालों को सुन कर घबरा गया और अपने सवालों को पूरी तरह बयान भी न कर सका, फिर इमाम अ.स. सारे सवालों के अलग अलग जवाब बताए कि अगर शिकार हरम की सरहद के बाहर किया और जानवर कोई बड़ा परिंदा है तो एक बकरी कफ़्फ़ारा देगा और अगर छोटा जानवर है तो बकरी का बच्चा देगा, और अगर यह हादसा हरम की सरहद के अंदर हुआ तो कफ़्फ़ारा दुगना हो जाएगाl

अगर चार पैर वाले जानवर का शिकार किया है तो अगर जंगली गधे का शिकार किया तो एक गाय कफ़्फ़ारा देगा, अगर शुतुर मुर्ग़ का शिकार किया तो कफ़्फ़ारा ऊंट होगा और अगर हिरन का शिकार किया तो कफ़्फ़ारा बकरी होगीl

कफ़्फ़ारा देने में आलिम और जाहिल के बीच कोई फ़र्क़ नहीं है हां अगर जानबूझ कर शिकार किया है तो कफ़्फ़ारा के साथ साथ गुनाह भी होगा लेकिन अगर भूल कर शिकार किया तो गुनाह नहीं होगा लेकिन कफ़्फ़ारा वाजिब होगाl

शिकारी अगर बालिग़ है तो कफ़्फ़ारा वाजिब होगा लेकिन अगर ना बालिग़ है तो कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं होगा, इसी तरह अगर आज़ाद इंसान ने शिकार किया तो उसका कफ़्फ़ारा उसके ख़ुद उसके ज़िम्मे है लेकिन अगर ग़ुलाम ने शिकार किया तो उसका कफ़्फ़ारा उसके आक़ा और मालिक के ज़िम्मे होगा, उमरे का कफ़्फ़ारा मक्के में अदा किया जाएगा और हज का मेना में अदा होगाl

उसके बाद इमाम अ.स. ने उस औरत के बारे में सवाल पूछा जो बार बार हलाल और हराम हो जाती है, जब उसका जवाब यहया न दे सका तो फ़रमाया यह एक शख़्स की कनीज़ है जो दूसरे पर हराम है लेकिन ख़रीदने से जाएज़ हो जाती है और फिर किसी दूसरे को बख़्श देने से हराम हो जाती है फिर निकाह कर लेने से जाएज़ हो जाती है फिर ज़ेहार का सीग़ा पढ़ने से हराम हो जाती है और कफ़्फ़ारा देने से जाएज़ हो जाती है और फिर तलाक़ देने से हराम हो जाती हैl
मामून ने इसके बाद भरे दरबार में अपनी बेटी की शादी इमाम अ.स. से कर दी, इमाम अ.स. एक साल के बाद मदीने चले आए और यहां दूसरी शादी की क्योंकि मामून जैसे घराने की औरतों से इमामत की नस्ल नहीं चलती है, उम्मुल फ़ज़्ल ने बाप से शिकायत की लेकिन मामून ने डांट कर चुप रहने को कहा, जब मामून मर गया तो उसने मोतसिम से शिकायत की उसने इमाम अ.स. को बुला कर ज़हर दे कर शहीद कर दियाl



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