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Date of publication : 4/10/2018 18:45
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कर्बला और इमाम सज्जाद अ.स.

कूफ़े का बाज़ार हो या कूफ़े में इब्ने ज़ेयाद का दरबार, शाम का बाज़ार हो या यज़ीद का दरबार, हर जगह इमाम सज्जाद अ.स. और अहले हरम के ख़ुत्बे और बयान ऐसे थे जिन्होंने पूरी दुनिया तक इमाम हुसैन अ.स. की शहादत के मक़सद को पहुंचाया और इस तरह से इमाम सज्जाद अ.स. ने उस मिशन को पूरा किया जिसे इमाम हुसैन अ.स. अंजाम दे रहे थे।

विलायत पोर्टल : इमाम सज्जाद अ.स. की उम्र कर्बला के हादसे के समय 22 साल की थी, जब इमाम हुसैन अ.स. ने कर्बला का इरादा किया तो आप भी इमाम हुसैन अ.स. के साथ थे, इतिहास में इस बारे में यक़ीनी तौर से ज़्यादा कुछ नहीं मिलता कि आप रास्ते में बीमार हुए या कर्बला पहुंच कर, लेकिन इतना ज़रूर मिलता है कि 10 मोहर्रम सन् 61 हिजरी को इमाम हुसैन अ.स. की शहादत के समय इतना बीमार थे कि आपका उठना बैठना भी मुश्किल था और सातवीं मोहर्रम से पानी बंद होने के बाद आपके लिए भी पानी की एक बूंद मिलना मुश्किल हो गया था, एक बीमार के लिए प्यास की तकलीफ़ बर्दाश्त से बाहर थी, शायद यही वजह थी कि आप आशूर के अधिकतर हिस्से में बेहोशी की हालत में थे और यही कारण था कि आप कर्बला की जंग में उस तरह शामिल नहीं हो सके जिस तरह आपके दूसरे भाई शामिल हुए।

अल्लाह को इमाम सज्जाद अ.स. का इम्तेहान दूसरी तरह से लेना था, वह इमाम हुसैन अ.स. की शहादत के बाद लुटे हुए क़ैदियों के क़ाफ़िले की सरपरस्ती करना थी, इधर इमाम हुसैन अ.स. शहीद हुए उधर ज़ालिमों ने अहलेबैत अ.स. के ख़ैमों की तरफ़ रुख़ किया और लूटना शुरू कर दिया, उस समय अहले हरम की बेचैनी, ख़ैमों में कोहराम और फिर उन्हीं ख़ैमों में आग के भड़कते हुए शोले...... ऐसे समय में इमाम सज्जाद अ.स. की क्या हालत थी उसको बयान करने के लिए न किसी ज़ुबान में ताक़त है और न ही किसी क़लम में हिम्मत, लेकिन इन सब के बावजूद क्या कहना इमाम सज्जाद अ.स. की इबादत का कि उन्होंने उस बीमारी और मुसीबत के समय में भी इबादत की शान कम नहीं होने दी।

आपने ग्यारहवीं मोहर्रम की शब को नमाज़ के बाद अपने माबूद का सजदा करते हुए जो ख़ाक पर सर रखा तो पूरी रात उसी सजदे में गुज़ार दी, और आप बार बार सजदे में उसकी तौहीद की अलग अलग अंदाज़ से गवाही दे रहे थे।

ग्यारह मोहर्रम की सुबह दुश्मन फ़ौज के सरदार ने अपनी फ़ौज की नजिस लाशों को जमा कर के उन पर नमाज़ पढ़ कर दफ़्न करा दिया लेकिन इमाम हुसैन अ.स. और उनके साथियों के पाक जिस्म बिना कफ़न के तेज़ धूप और जलती हुई ज़मीन में पड़े हुए थे, यह मौक़ा इमाम सज्जाद अ.स. के लिए बहुत सख़्त और तकलीफ़ देने वाला था कि जब आप मक़तल  से गुज़र रहे थे तो हालत यह थी कि नज़दीक था कि आपकी रूह आपके जिस्म से निकल जाए, आपको इस बात का गहरा सदमा था कि आपके वालिद भाईयों और दूसरे अज़ीज़ों की लाशें तेज़ धूप और जलती हुई ज़मीन पर पड़ी हुई हैं और आपको ज़ालिम क़ैद करके कूफ़ा और शाम लिए जा रहे हैं।

और फिर दिल को बेचैन कर देने वाला वह मंज़र आया जब पैग़म्बर स.अ. के ख़ानदान का लुटा हुआ क़ाफ़िला इब्ने ज़ेयाद के दरबार में पहुंचा, इमाम सज्जाद महसूस कर रहे थे कि यह वही कूफ़ा है जहां इमाम अली अ.स. हाकिम थे और हज़रत ज़ैनब स.अ. और हज़रत उम्मे कुलसूम स.अ. यहां की शहज़ादियां थीं,  आज उसी कूफ़ा में ज़ालिम इब्ने ज़ेयाद हाकिम बना बैठा है और पैग़म्बर स.अ. का ख़ानदान क़ैदी बना खड़ा है, इमाम सज्जाद अ.स. सारे सदमे और तकलीफ़ के बावजूद अपनी पूरी अज़मत और अपने पूरे वक़ार के साथ खड़े थे, थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद इब्ने ज़ेयाद ने अपनी नजिस ज़ुबान खोली और इमाम अ.स. की तरफ़ इशारा कर के पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है, इमाम अ.स. ने जवाब दिया अली इब्ने हुसैन अ.स., वह कहने लगा क्या अली इब्ने हुसैन अ.स. को क़त्ल नहीं किया, इमाम अ.स. ने जवाब दिया वह मेरे भाई थे जिनका नाम भी अली था उन्हें लोगों ने क़त्ल कर दिया, इमाम अ.स. के इस जवाब के बाद वह जाहिल कहता है कि नहीं, लोगों ने नहीं बल्कि अल्लाह ने क़त्ल किया है।

इमाम अ.स. ने उस ज़ालिम के जवाब में क़ुर्आन की आयत पढ़ी जिसमें अल्लाह ने फ़रमाया कि अल्लाह ही मौत के समय रूह निकालता है, और अल्लाह का रूह निकालना अलग बात है वह सबके लिए है, इमाम अ.स. के इस जवाब के बाद इब्ने ज़ेयाद बौखला गया और कहा तुम में अब भी मुझको जवाब देने और मेरी बात को झुठलाने की हिम्मत बाक़ी है, उसके बाद उस ज़ालिम ने इमाम अ.स. के क़त्ल का हुक्म दिया, जैसे ही हज़रत ज़ैनब स.अ. ने सुना दौड़ कर अपने भतीजे से लिपट गईं और कहा ऐ इब्ने ज़ेयाद मेरे भी क़त्ल का हुक्म दे।

इसके बाद इमाम सज्जाद अ.स. ने इब्ने ज़ेयाद से कहा, ऐ इब्ने ज़ेयाद तू यह समझ रहा था कि कर्बला में आले मोहम्मद अ.स. के बहते हुए ख़ून को देख कर सज्जाद (अ.स.) के दिल में तेरा ख़ौफ़ बैठ जाएगा और मैं मौत से डर जाऊंगा और तेरे क़त्ल की धमकी से तेरे सामने इलतेमास करूंगा, ऐ इब्ने ज़ेयाद तू मुझे मौत से डराता है, क्या अभी तक तुझे इस बात का पता नहीं चल सका कि क़त्ल होना हमारी आदत है और शहादत हमारी फ़ज़ीलत है, इमाम सज्जाद अ.स. का यह वह बयान था जिसने ज़ालिम के सर को झुका दिया और क़त्ल का हुक्म अपने आप ख़त्म हो गया और यह बात भी साबित हो गई कि इमाम हुसैन अ.स. की शहादत से उनकी औलाद में किसी तरह का ख़ौफ़ और दहशत नहीं पाया जाता, हां इतना ज़रूर है कि इनके सब्र के आगे ख़ुद क़ातिल का सर झुक गया है।

कूफ़ा के बाद यह क़ाफ़िला शाम ले जाया गया और जिस दिन इस क़ाफ़िला को वहां पहुंचना था उस दिन के लिए बाज़ार सजाए गए थे, पूरे शहर में ईद का माहौल बनाया गया था, लोग एक दूसरे को मुबारकबाद दे रहे थे, ज़ाहिर है ऐसे माहौल में अहलेबैत अ.स. पर जो तकलीफ़ बीत रही होगी उसका अंदाज़ा और उसका एहसास कौन कर सकता है, ऐसे समय में तो इंसान को होश ठिकाने नहीं रहते लेकिन इमाम सज्जाद अ.स. की वह ज़ात थी जो हर क़दम और हर मौक़े पर लोगों की हिदायत और उन्हें सीधे रास्ते पर लगाने और हुसैनी मिशन को जारी रखने की कोशिशें करते रहे।

जब यह क़ाफ़िला शाम के बाज़ार से गुज़रा तो बनी उमय्या के किसी चापलूस ने इमाम सज्जाद अ.स. को तकलीफ़ पहुंचाने के लिए कहा कि ऐ हुसैन के बेटे यह बताओ जीत किसी हुई? आपने फ़रमाया अगर तुझे मालूम करना है कि जीत किसकी हुई तो जब नमाज़ का समय आए और अज़ान और अक़ामत कही जाए उस समय तुझे ख़ुद ही पता चल जाएगा कि जीत किसकी हुई, इसी तरह जब यह क़ाफ़िला शाम की मस्जिद के दरवाज़े पर पहुंचा तो एक बूढ़ा सामने आया और उसने क़ैदियों को देख कर कहा कि अल्लाह का शुक्र है कि जिसने तुमको बर्बाद कर दिया और तुम्हारे मुल्क को तुम्हारे मर्दों से ख़ाली कर के शांतिपूर्वक माहौल बनाया और ख़लीफ़ा को तुम पर जीत दी, इमाम सज्जाद अ.स. समझ गए कि इसे हमारी मारेफ़त नहीं है।

इमाम अ.स. ने आयए मवद्दत की तिलावत करते हुए फ़रमाया ऐ शैख़ क्या तुमने इस आयत को पढ़ा है? उस बूढ़े शख़्स ने कहा हां पढ़ी है, इमाम अ.स. ने फ़रमाया वह रसूल के अहलेबैत अ.स. हम ही हैं जिनसे मोहब्बत को वाजिब क़रार दिया गया है, फिर आपने कहा ऐ शैख़ ख़ुम्स वाली आयत में ज़विल क़ुरबा और आयए ततहीर में जिन अहलेबैत का ज़िक्र है वह हम ही लोग हैं, यह सुन कर वह बूढ़ा इंसान सर झुका कर थोड़ी देर के लिए चुप रहा फिल बोला तुमको अल्लाह की क़सम सच बताओ क्या तुम लोग रसूल स.अ. के अहलेबैत अ.स. हो? इमाम अ.अ. ने फ़रमाया अल्लाह की क़सम हम ही अहलेबैत अ.स. हैं, यह सुनते ही वह रोने लगा और अपने सर से अम्मामे को फेक कर आसमान की तरफ़ हाथ उठा कर बोला ऐ अल्लाह गवाह रहना मैं आले मोहम्मद अ.स. के दुश्मन से बेज़ार हूं, फिर इमाम अ.स. से कहता है कि क्या मेरी तौबा क़ुबूल हो सकती है? इमाम अ.स. ने फ़रमाया अगर दिल से तौबा करोगे तो अल्लाह बिल्कुल क़ुबूल करेगा, फिर उसने कहा मौला, मुझसे यह जुर्म अंजाने में और मेरी जेहालत की वजह से हुआ है, हम आप लोगों को नहीं पहचान सके इसीलिए यह गुस्ताख़ी कर बैठे।

कूफ़े का बाज़ार हो या कूफ़े में इब्ने ज़ेयाद का दरबार, शाम का बाज़ार हो या यज़ीद का दरबार, हर जगह इमाम सज्जाद अ.स. और अहले हरम के ख़ुत्बे और बयान ऐसे थे जिन्होंने पूरी दुनिया तक इमाम हुसैन अ.स. की शहादत के मक़सद को पहुंचाया और इस तरह से इमाम सज्जाद अ.स. ने उस मिशन को पूरा किया जिसे इमाम हुसैन अ.स. अंजाम दे रहे थे।


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