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Date of publication : 6/10/2018 9:0
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चलो कर्बला चलें...

ज़ालिमों ने हर दौर में अपनी हद से आगे जाकर इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत से रोकने की जी तोड़ कोशिश की है लेकिन इमाम हुसैन अ.स. ने जिस अल्लाह के नाम और उसके दीन को उसके असली हालत पर बाक़ी रखने के लिए अज़ीम क़ुर्बानी दी उसने अपने वादे को पूरा किया और लाख पाबंदियों और लाख ज़ुल्म के बावजूद इमाम हुसैन अ.स. के चाहने वालों के दिल में उस गर्मी को बाक़ी रखा जो उन्हें ख़ींच कर कर्बला ले जाती रही, और अब जब सद्दाम और दाएश जैसे ज़ालिम अपने अंजाम तक पहुंच चुके हैं तो अब हाल कुछ ऐसा है कि उसी मज़लूम इमाम अ.स. की ज़ियारत करने वालों की सही तादाद का आंकड़ा लगाना मुश्किल होता जा रहा है।

विलायत पोर्टल : जैसे जैसे अरबईन के दिन क़रीब आ रहे हैं हर तरफ़ इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत की तैयारियां दिखाई दे रही हैं, उस इमाम अ.स. का चेहेल्लुम और अरबईन जिसकी लाश को ज़ालिम बिना कफ़न और दफ़न के तपते हुए सहरा में छोड़ कर चले गए थे।

कुछ दौर तो ऐसे भी आएं हैं जब इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत पर ऐसी पाबंदियां थीं कि बिना अपना क़ीमती माल क़ुर्बान किए कोई ज़ियारत के लिए जा ही नहीं सकता, कुछ बुज़ुर्ग उलमा की अगर मानें तो अपने गोद के पालों की गर्दनें कटवा कर भी लोगों ने इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत की है, यहां तक कि अभी कुछ साल पहले तक साम्राज्वादी ताक़तों के नौकर सद्दाम जैसे ज़ालिमों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी, जैसाकि हमारे कुछ बुज़ुर्ग दोस्तों और साथियों ने बयान किया है कि जिस समय वह सद्दाम की तानाशाही के दौर में ज़ियारत को गए तो सद्दाम के फ़ौजी राइफ़लों और दूसरे असलहों के साथ इमाम अ.स. के रौज़े के अंदर खड़े रहते थे ताकि कोई इमाम अ.स. की मज़लूमियत को याद कर के रो न सके और अगर किसी के सब्र का बांध टूटा तो उसे इमाम अ.स. के रौज़े के अंदर ही मारते थे और फिर पकड़ कर गाड़ी में बिठा कर ना मालूम जगह पर लेकर चले जाते थे।

ज़ालिमों ने हर दौर में अपनी हद से आगे जाकर इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत से रोकने की जी तोड़ कोशिश की है लेकिन इमाम हुसैन अ.स. ने जिस अल्लाह के नाम और उसके दीन को उसके असली हालत पर बाक़ी रखने के लिए अज़ीम क़ुर्बानी दी उसने अपने वादे को पूरा किया और लाख पाबंदियों और लाख ज़ुल्म के बावजूद इमाम हुसैन अ.स. के चाहने वालों के दिल में उस गर्मी को बाक़ी रखा जो उन्हें ख़ींच कर कर्बला ले जाती रही, और अब जब सद्दाम और दाएश जैसे ज़ालिम अपने अंजाम तक पहुंच चुके हैं तो अब हाल कुछ ऐसा है कि उसी मज़लूम इमाम अ.स. की ज़ियारत करने वालों की सही तादाद का आंकड़ा लगाना मुश्किल होता जा रहा है।

और पैदल ज़ियारत को आने वालों का मंज़र तो बयान से बाहर है, मैं ख़ुद आज से दस साल पहले जब पहली बार इस क़ाफ़िल-ए-इश्क़ का हिस्सा बना तो कई लोग इस पैदल चलने वाले ज़ायरीन के बीच ऐसे मिले जो 500 किलोमीटर या उससे भी ज़्यादा से पैदल चल कर मज़लूम इमाम अ.स. की ज़ियारत को पहुंच रहे थे, और यह पैदल ज़ियारत कोई नई रस्म या नई रिवायत नहीं है बल्कि इस बारे में हदीसें मौजूद हैं, जैसाकि नूरुल ऐन फ़ी मशयि इला ज़ियारति क़ब्रिल हुसैन (अ.स.) नामी किताब में 21 हदीसें पैदल ज़ियारत की फ़ज़ीलत के बारे में मौजूद हैं (वसाएलुश-शिया, जिल्द 14, पेज 11-17

बाबो वुजूबि ज़ियारतिल हुसैन वल आइम्मह (अ.स.) अला शीअतिहिम किफ़ायतन)

पैदल ज़ियारत पर जाने वाले के हर क़दम के बदले मिलने वाला सवाब इस तरह है.. नेकियों का दुगना हो जाना, कुछ गुनाहों का माफ़ हो जाना, दरजात का बुलंद होना, एक हज और एक उमरे का सवाब, पैग़म्बर स.अ. या इमाम अ.स. के साथ जेहाद का सवाब और उस शहीद का सवाब जिसका ख़ून अल्लाह की राह में बहा है।

इसके अलावा और भी बहुत सारी हदीसों में पैदल ज़ियारत करने वाले के हर एक क़दम के बदले सवाब की अलग अलग तादाद बयान हुई है, जैसे एक नेकी और एक गुनाह की माफ़ी (कामिलुज़-ज़ियारात, पेज 134) दस नेकियां और दस गुनाहों की माफ़ी (कामिलुज़-ज़ियारात, पेज 187) एक हज़ार नेकियां और एक हज़ार गुनाहों की माफ़ी (कामिलुज़-ज़ियारात, पेज 132) एक लाख नेकियां और एक लाख गुनाहों की माफ़ी (बिहारुल अनवार, जिल्द 101, पेज 202) बयान हुआ है।

ज़ाहिर है यह जो अलग अलग नेकियों का सवाब और गुनाहों की माफ़ी का ज़िक्र है यह कोई हदीसों का टकराव नहीं है बल्कि यह उस ज़ाएर की मारेफ़त और उस पैदल सफ़र के बीच पेश आने वाली तकलीफ़ों के हिसाब से है।

शैख़ मुर्तज़ा अंसारी र.ह. जैसे अज़ीम फ़क़ीह भी इस सुन्नत को ज़िंदा रखने वालों में शामिल थे और वह ख़ुद भी नजफ़ से कर्बला पैदल जाया करते थे, मिर्ज़ा हुसैन नूरी र.ह. हर साल पैदल ज़ियारत को जाया करते थे, अल्लामा मोहम्मद महदी बहरुल उलूम र.ह. भी तुवैरिज से पैदल ज़ियारत को आने वाले लोगों में आगे आगे रहते थे, अल्लामा शैख़ जाफ़र काशेफ़ुल ग़ेता र.ह. भी हर साल पैदल ज़ियारत का जाते थे और इसी तरह आयतुल्लाह मरअशी नजफ़ी र.ह. की ज़िंदगी के हालात में मिलता है कि आपने 20 बार कर्बला की पैदल ज़ियारत की। (फ़रहंगे ज़ियारत, पेज 56)

पिछले कुछ सालों में शबे बरात (14 शाबान, इमाम ज़माना अ.स. की विलादत की शब), और अरबईन पर ज़ायरीन की तादाद को कवरेज करने के लिए पूरी दुनिया से मीडिया वाले आते हैं और दुनिया देख कर हैरत में है कि आख़िर यह कौन है जिसकी क़ब्र पर पूरी दुनिया से बर साल करोड़ों की तादाद में लोग जमा होते हैं और कैसे मुमकिन है कि इतनी बड़ी तादाद का एक छोटे शहर में जमा हो जाना उनके खाने पीने का इंतेज़ाम और दूसरी ज़रूरतें....।

और इन सब के साथ साथ इराक़ के वह मोमेनीन भी शुक्रिये और दुआ के हक़दार हैं जो अपनी मेहनत की कमाई इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारों और ज़ाएरों पर बड़ी विनम्रता से क़ुर्बान कर देते हैं, जो जा चुके हैं उन्होंने देखा है कि किस तरह मिन्नत और इल्तेमास करते हैं कि उनके खाने के स्टॉल से आप कुछ खा लीजिए।

इन सारी बातों के साथ साथ उन आदाब का ख़्याल रखना भी ज़रूरी है जो इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के लिए ख़ास तौर से बयान किए गए हैं, जिनमें से कुछ अहम इस तरह हैं..

** ज़ियारती सफ़र शुरू करने से पहले तीन दिन रोज़ा रखना।

** लज़ीज़ खानों से परहेज़ करना और सादे खाने पर राज़ी रहना।

** दुख और ग़म की हालत में ज़ियारत करना।

** ख़ुशबू के इस्तेमाल से परहेज़ करना।

** जिस हालत में कर्बला पहुंचे हैं उन्हीं कपड़ों और और उसी हालत में ज़ियारत को जाना।

** ज़ियारत से पहले फ़ुरात के पानी से ग़ुस्ल करना।

** पैदल ज़ियारत के लिए जाना। (मफ़ातीहुल जेनान)


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