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Date of publication : 7/10/2018 18:24
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इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी अहले सुन्नत की निगाह में

इमाम हुसैन अ.स. और आपके वफ़ादार असहाब पर अज़ादारी करना केवल शियों से मख़सूस नहीं है बल्कि अहले सुन्नत भी आपकी शहादत पर ग़म मनाते हैं, हालांकि उनके ग़म के ज़ाहिर करने का तरीक़ा अलग होता है, लेकिन इमाम हुसैन अ.स. के क़ातिलों से दूरी का ऐलान हर किसी ने किया है।

विलायत पोर्टल : पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया हुसैन अ.स. मुझसे है और मैं हुसैन अ.स. से हूं, ख़ुदाया तू उससे मोहब्बत कर जो हुसैन अ.स. से मोहब्बत करे, हुसैन अ.स. मेरे बेटों में से एक बेटा है। (सुनन इब्ने माजा, जिल्द 1, पेज 54, मुसनद इब्ने हंबल, जिल्द 4, पेज 172, मुस्तदरके हाकिम, जिल्द 3, पेज 177)
इमाम हुसैन अ.स. 3 शाबान सन् 4 हिजरी को मदीने में पैदा हुए (तबक़ातुल कुबरा, इब्ने साद, पेज 13) और आशूरा के दिन (10 मोहर्रम, सन् 61 हिजरी) को कर्बला में शहीद हो गए। (अख़बारूत-तेवाल, अहमद इब्ने दाऊद, पेज 253)
इमाम हुसैन अ.स. पर रोना और अज़ादारी
इमाम हुसैन अ.स. और आपके वफ़ादार असहाब पर अज़ादारी करना केवल शियों से मख़सूस नहीं है बल्कि अहले सुन्नत भी आपकी शहादत पर ग़म मनाते हैं, हालांकि उनके ग़म के ज़ाहिर करने का तरीक़ा अलग होता है, लेकिन इमाम हुसैन अ.स. के क़ातिलों से दूरी का ऐलान हर किसी ने किया है।
पैग़म्बर स.अ. के दौर में इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी
पैग़म्बर स.अ. की सीरत सारे मुसलमानों के लिए नमूना है, अहले सुन्नत आपकी सीरत को हुज्जत और उस पर अमल करने को वाजिब समझते हैं, वह भी इस बात को मानते हैं कि इमाम हुसैन अ.स. की अज़ादारी का इतिहास पैग़म्बर स.अ. की ज़िंदगी से है, और आप इमाम हुसैन अ.स. की विलादत के बाद उनकी शहादत की ख़बर देकर बहुत रोए थे। अहले सुन्नत की मोतबर किताबों में इस बात का ज़िक्र है कि उम्मे सलमा ने नक़्ल किया है कि एक बार जिब्रईल पैग़म्बर स.अ. के पास मौजूद थे और इमाम हुसैन अ.स. मेरी गोद में थे अचानक वह रोने लगे तो पैग़म्बर स.अ. ने कहा: मेरे बेटे को गोद से ज़मीन पर उतार दो, मैंने ज़मीन पर उतार दिया, पैग़म्बर स.अ. ने आपको गोद में उठा लिया, इस मंज़र को देख कर जिब्रईल ने पूछा: क्या आप हुसैन (अ.स.) से बहुत मोहब्बत करते हैं? पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया हां, जिब्रईल ने कहा: एक दिन आपकी उम्मत इन्हें क़त्ल कर देगी, क्या आप हुसैन (अ.स.) को क़त्ल किए जाने वाली जगह की मिट्टी देखना चाहते हैं? पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: हां देखना चाहता हूं, तभी जिब्रईल ने अपने परों को खोल कर कर्बला को दिखाया, और जब पैग़म्बर स.अ. उस हालत से बाहर आए तो आपके हाथ में लाल मिट्टी थी। (तज़्केरतुल ख़वास, सिब्ते इब्ने जौज़ी, तहक़ीक़: बहरुल उलूम, पेज 250, ज़ख़ाएरुल ओक़बा, अहमद इब्ने अब्दुल्लाह शाफ़ेई, पेज 146, 164)
अहले सुन्नत के मशहूर इतिहासकार इब्ने सअद ने नक़्ल किया है कि इमाम अली अ.स. सिफ़्फ़ीन के एक सफ़र में कर्बला से गुज़रे, जब नैनवा पहुंचे तो लोगों से पूछा यह कौन सी जगह है? लोगों ने जवाब दिया कर्बला, इमाम अली अ.स. कर्बला का नाम सुनते ही रोने लगे और इतना रोए कि आपके आंसुओं से ज़मीन भीग गई, फ़िर आपने फ़रमाया एक दिन मैं पैग़म्बर स.अ. की ख़िदमत में हाज़िर हुआ उस समय आप रो रहे थे, मैंने पूछा आख़िर कौन सी चीज़ आपको रुला रही है? तो उन्होंने फ़रमाया कुछ देर पहले जिब्रईल मेरे पास आए थे और मुझे ख़बर दी कि फ़ुरात के किनारे कर्बला में मेरा हुसैन अ.स. क़त्ल कर दिया जाएगा, और फ़िर जिब्रईल ने मुझे एक मुठ्ठी वहां की ख़ाक दी जिसकी ख़ुशबू सूंघ कर मैं अपने आंसुओं को रोक नहीं सका। (तहज़ीबुत तहज़ीब, इब्ने हजर अस्क़लानी, जिल्द 2, पेज 300, मजमउज़ जवाएद, जिल्द 9, पेज 187)
आशूर के बाद पहली अज़ादारी
पुरानी और क़दीमी मोतबर किताबों के अनुसार शिया और अहले सुन्नत दोनों के यहां आशूर के बाद ही से अज़ादारी का सिलसिला शुरू हो गया था, तबरी नें अपनी किताब में इस तरह लिखा है कि यज़ीद की फ़ौज जब इमाम हुसैन अ.स. के ख़ानदान को मक़तल से ले जाने लगी तो आपकी बहन ने अपने भाई की बिना सर की लाश को ख़ून में लतपथ देख कर फ़रियाद की, ऐ नाना आप पर आसमान के फ़रिश्तों का दुरूद और सलाम हो, यह आपका हुसैन (अ.स.) है जो इस जंगल में अपने ख़ून में नहा कर पड़ा हुआ है जिसके बदन के टुकड़े टुकड़े किए जा चुके हैं, ऐ नाना आपकी बेटियां क़ैदी बनाई गई हैं और आपके बेटों के गले काटे गए हैं, तबरी लिखते हैं कि जब हज़रत ज़ैनब स.अ. ने यह बैन किए तो सारे दोस्त और दुश्मन रोने लगे थे। (तारीख़ुल उमम वल मुलूक, तबरी, तहक़ीक़ अबुल फ़जिल इब्राहीम, जिल्द 5, पेज 456)
इसी किताब में इमाम हुसैन अ.स. के क़ातिलों में से एक के घर अज़ादारी क़ायम होने के बारे मे इस तरह लिखा है कि जब ख़ूली इब्ने यज़ीद ने इमाम हुसैन अ.स. के मुबारक सर को उमर सअद से यह कह कर लिया कि वह कूफ़े में इब्ने ज़्याद को दिखा कर ईनाम हासिल करेगा और वह सबसे पहले कूफ़ा रवाना हो गया, जब कूफ़ा दारुल एमारा पहुंचा तो दरवाज़ा बंद हो चुका था इसलिए अपने घर जा कर तनूर या संदूक़ में रख दिया, रात को जब उसकी बीवी जो हज़रमिय्यह क़बीले की थी उसको मालूम हुआ कि इमाम अ.स. का सर उसके घर के तनूर या संदूक़ में है तो वह उसी समय चीख़ मार कर इमाम हुसैन अ.स. पर रोने लगी और फिर उसने कर्बला में होने वाले ज़ुल्म और इमाम हुसैन अ.स. की मज़लूमियत को सुनने के बाद अपने शौहर का घर छोड़ दिया।
(तारीख़ुल उमम वल मुलूक, तबरी, तहक़ीक़ अबुल फ़जिल इब्राहीम, जिल्द 5, पेज 456)
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