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Date of publication : 8/10/2018 17:48
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हम सभी कूफ़ा वाले हैं....

कूफ़ा अपनी सारी अच्छाईयों के बावजूद अपने बहादुरों की वजह से नहीं बल्कि अपने डरपोक और बुज़दिल लोगों के नाम से जाना जाता है। यह एक इशारा बन गया है बेहिसी और बे अमली का, यह किसी ज़ालिम गिरोह या टोले का नाम नहीं है बल्कि उस ज़ुल्म पर चुप रहने वाले मजमे का नाम है, यह एक ऐसे समाज की शक्ल है जहां किसी एक मज़लूम गिरोह को एक ज़ालिम गिरोह लगातार ज़ुल्म का निशाना बनाता है लेकिन उस ज़ुल्म से नफ़रत के बावजूद लोग तमाशाई बने अपने अपने ठिकानों में दुबक कर बैठे रहते हैं।

विलायत पोर्टल : कर्बला की दास्तान में कूफ़ा शहर एक मरकज़ी हैसियत रखता है, यह वह शहर है जिसमें बसने वालों ने ख़त लिख कर इमाम हुसैन अ.स. को कर्बला बुलाया और उसी शहर की तलवारों ने उनको और उनके घराने को क़त्ल करने में अहम रोल निभाया।
आमिर हुसैनी नाम के एक शख़्स ने कूफ़ा की डेमोग्राफ़ी पर बहुत तहक़ीक़ की है उनके मुताबिक़ इमाम हुसैन अ.स. के इंक़ेलाब लाने के समय कूफ़े में कई तरह के लोग बसे हुए थे, जिनमें से एक तो यज़ीद के वह क़रीबी और ख़ास लोग थे जिनका इंचार्ज उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद था। इब्ने ज़्याद ने अपने कारिंदों द्वारा कूफ़ा में कर्फ़्यू लगा दिया था यहां तक कि कर्बला आने जाने वाली सवारियों पर भी पाबंदी लगा दी थी, यह गिरोह इमाम हुसैन अ.स. के ख़िलाफ़ खुल कर लड़ा और हर तरह से उनके इंक़ेलाब को कुचलने की कोशिश की, जबकि इमाम हुसैन अ.स. का इंक़ेलाब अदालत और इंसाफ़ के एक मज़बूत सिस्टम को लागू करने के लिए था, इस गिरोह में हुर्मला जैसे लोग शामिल थे।
दूसरा गिरोह क़बीले के सरदारों का था जिन्होंने अपने राजनीतिक और आर्थिक फ़ायदे के लिए यज़ीद का साथ दिया, उन्होंने कूफ़ा और कर्बला दोनों जगह पैसे, हथियार और लोगों को तैयार कर के मदद की, इस गिरोह में उमर इब्ने साद और शिम्र जैसे लोग शामिल थे।
तीसरा गिरोह उन लोगों का था जिन्होंने बनी उम्य्या के ख़िलाफ़ अंडर ग्राउंड काफ़ी मेहनत की थी और उनकी वह मेहनत अलग अलग जगहों पर ज़ाहिर भी हुई, इस गिरोह में मुख़्तार सक़फ़ी, सुलैमान इब्ने सोरद ख़ोज़ाई, हानी इब्ने उरवह, रोफ़ाआ इब्ने शद्दाद और मुस्लिम इब्ने औसजा जैसे बहादुर और मोमिन लोग शामिल थे।
इस गिरोह में से कुछ लोग वह थे जिन्हें इब्ने ज़्याद ने कर्बला पेश आने से पहले ही गिरफ़्तार कर लिया था, कुछ मुस्लिम इब्ने अक़ील की मदद के जुर्म में मारे गए और कुछ हर तरह की पाबंदियों और पहरे के बाद भी किसी तरह से कर्बला पहुंचने में कामयाब हुए और इमाम हुसैन अ.स. और हक़ की मदद करते हुए शहीद हो गए और हमेशा के लिए निजात पा गए।
लेकिन सबसे बड़ा गिरोह उस आम जनता का था जो अपनी वफ़ादारी में तो इमाम हुसैन अ.स. के हमदर्द थे लेकिन मस्लेहत या मामले की गहराई का इल्म न होना या बसीरत का न होना या डर की वजह से ख़ामोश रहे।
यह वह अधिकतर ख़ामोश लोग थे जिनमें से कुछ तो कर्बला के बाद तव्वाबीन की शक्ल में और कुछ मुख़्तार सक़फ़ी के साथ हो कर अपनी ग़लतियों को सुधारने के लिए सामने आए, इन सब के बाद भी एक बहुत बड़ी तादाद ऐसे लोगों की फिर भी रह गई जिन्होंने क़यामत के उन दिनों में इबादत और सजदों की आड़ ले ली और किसी भी मुश्किल और कठिन फ़ैसला लेने से पीछे ही रहे। यह वह टोला था जो ईमान की कमी की वजह से नहीं बल्कि अपनी बुज़दिली और डर की वजह से कूफ़ी कहलाया।
नहजुल बलाग़ा में इमाम अली अ.स. जिनसे ख़िताब करते थे वह यही लोग थे, हज़रत ज़ैनब स.अ. ने कूफ़े के बाज़ार में दिए जाने वाले ख़ुत्बे में इन्हीं का नाम लिया था और इमाम सज्जाद अ.स. का अपने ख़ुत्बे में इशारा भी इसी अधिकतर तादाद वाले टोले की मस्लेहत की तरफ़ था।
कूफ़ा अपनी सारी अच्छाईयों के बावजूद अपने बहादुरों की वजह से नहीं बल्कि अपने डरपोक और बुज़दिल लोगों के नाम से जाना जाता है। यह एक इशारा बन गया है बेहिसी और बे अमली का, यह किसी ज़ालिम गिरोह या टोले का नाम नहीं है बल्कि उस ज़ुल्म पर चुप रहने वाले मजमे का नाम है, यह एक ऐसे समाज की शक्ल है जहां किसी एक मज़लूम गिरोह को एक ज़ालिम गिरोह लगातार ज़ुल्म का निशाना बनाता है लेकिन उस ज़ुल्म से नफ़रत के बावजूद लोग तमाशाई बने अपने अपने ठिकानों में दुबक कर बैठे रहते हैं।
आज भी अगर आप निगाह उठा कर देखें तो कई इस्लामी देशों पर ज़ुल्म ढ़हाया जा रहा है, किसी देश पर पाबंदी तो किसी पर हमला, किसी की आर्थिक स्तिथि कमज़ोर करने की साज़िश तो किसी देश में दवाओं के निवेश तक पर रोक, किसी देश से तेल न ख़रीदने की मुहिम तो किसी देश के विरुध्द साम्राज्यवाद के साथ हाथ मिला कर उसे नाबूद करने की कोशिश, जबकि जो भी मुसलमान थोड़ी भी सियासी सूझबूझ रखता है वह देख रहा है कि कौन सा देश हर इस्लामी देश की मदद करने को किसी भी परस्तिथि में तैयार रहता है लेकिन फिर भी जब उसके ख़िलाफ़ साज़िश होती है हम सभी बिल्कुल उन्हीं कूफ़ा वालों की तरह ख़ामोश हो कर मस्लेहत की चादर लपेट लेते हैं जिन्होंने इमाम हुसैन अ.स. के हक़ के लिए और ज़ालिम हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने को सही तो जाना लेकिन जब उनका साथ देने और उनके समर्थन में बाहर निकलने की बारी आई तो वही मस्लेहत का ढ़ोंग करते हुए अपने घरों में दुबक कर बैठे रहे।
या हम अपने आस पास ही निगाह दौड़ा कर देख लें कि न जाने रोज़ कितनी इज़्ज़तें उछलती हैं न जाने कितने इंसानों के हुक़ूक़ पैरों तले रौंद दिए जाते हैं न जाने कितनी भावनाओं से खिलवाड़ होता है लेकिन हम सब जानते और समझते हुए ख़ामोश बैठे रहते हैं..
इसीलिए कहना ग़लत न होगा कि हम सभी कूफ़ा वाले हैं........
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