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Date of publication : 13/10/2018 17:22
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घाटे का सौदा

उसके पास अब कोई और रास्ता नहीं था बस एक ही रास्ता था जो जहन्नम की तरफ़ जा रहा था और उसी रास्ते पर उसे इसी दुनिया में मुख़्तार का भी सामना करना था और इसी दुनिया में एक मुख़्तार के जहन्नम से हो कर उसे हमेशा हमेशा रहने वाले जहन्नम का सफ़र तय करना था, उमर इब्ने साद के जहन्नम की तरफ़ बढ़ते क़दम उन सभी लोगों के लिए सबक़ हैं जो अपने दौर के हाकिमों और बादशाहों को ख़ुश करने के लिए अपने ज़मीर को थपक कर सुला देते हैं और जब ज़मीर बेदार होता है तब बहुत देर हो चुकी होती है, सामने उस दौर के मुख़्तार की तलवार होती है और उसके आगे जहन्नम के भड़कते हुए शोले होते हैं। सच में कितने घाटे का सौदा है

विलायत पोर्टल : इब्ने ज़ेयाद द्वारा शहर में फैलाए गए ख़बरी उसे ख़बर देते हैं कि अली अ.स. के बेटी के ख़ुत्बे की वजह से कूफ़े के लोग सच्चाई और हक़ीक़त तक पहुंच रहे हैं, हुकूमत के ख़िलाफ़ कभी भी बग़ावत हो सकती है, लोग अपके किए पर पछता रहे हैं और सुलैमान इब्ने सोरद ख़ोज़ाई जैसे लोग अपनी तौबा को अमली करते हुए इमाम हुसैन अ.स. के क़ातिलों से इंतेक़ाम का प्लान बना रहे हैं,
इब्ने ज़ेयाद अपने दौर का शातिर रह चुके ज़ेयाद इब्ने अबीह की औलाद है, तेज़ तर्रार है, जवान है और आने वाले ख़तरे को भांपना उसकी वह क्वालिटी है जिसको हर किसी ने माना है, वह समझ रहा था कि अभी हो या कुछ समय बाद लेकिन कर्बला की ज़मीन पर गिरने वाला लहू ज़ंजीर बन कर उसे जकड़ लेगा और भागने का कोई रास्ता भी नहीं होगा,
इसलिए वह अपने ख़ास सलाहकारों के साथ बड़ी परेशानी की हालत में बैठा है, घबराया हुआ है, हुकूमत तो हाथ से फिसलती साफ़ साफ़ दिख ही रही है साथ ही यह भी नज़र आ रहा है कि किस तरह कर्बला वालों के लहू के इंतेक़ाम के शोले उसे जला कर राख कर देंगे इसलिए कोई रास्ता निकालना ज़रूरी है।
अचानक देखता है कि दरबार में उमर इब्ने साद मौजूद है, समझ गया कि रय की हुकूमत के लिए आया है, इब्ने ज़ेयाद का मक्कारियों से संबंध ही था जिसने उमर इब्ने साद का चेहरा देखते ही भांप लिया था कि उसके दिमाग़ में क्या चल रहा है, फिर उसने मन ही मन में कहा कि बहुत सही, कुछ ऐसा करता हूं कि यह उमर इब्ने साद मुजरिम समझा जाए और इमाम हुसैन अ.स. के क़त्ल का धब्बा मेरे दामन पर न आने पाए और है भी ऐसा ही, मैं तो कूफ़ा में था इमाम हुसैन अ.स. के मुक़ाबले लड़ने वाले लश्कर का सरदार तो उमर इब्ने साद ही था और उसी ने जंग का फ़रमान जारी किया था उसी की फ़ौज ने इमाम हुसैन अ.स. के 72 साथियों को कुछ ही घंटों में क़त्ल कर दिया, और यह कूफ़ी लोग तो बहुत भोले भाले हैं जिसकी हुकूमत होती है उसी की तरफ़ होते हैं उसी की बात मानते हैं और उसी से डरते हैं, इसलिए इससे पहले कि उमर इब्ने साद अपने पैर और मज़बूत करे ज़रूरी यही है कि इसे ही अपनी ढ़ाल बना लिया जाए, मैं ऐसा करता हूं कि लोगों के बीच यह ख़बर फैला देता हूं कि उमर इब्ने साद ने रय की हुकूमत का लालच में मेरे हुक्म के ख़िलाफ़ अमल करते हुए मेरे मना करने के बावजूद इमाम हुसैन अ.स. और उनके असहाब को कर्बला में शहीद किया जबकि मैं तो आख़िरी समय तक सुलह चाहता था लेकिन.......,
यह तो तब होगा जब मेरे ख़िलाफ़ कोई ऐसा सबूत न हो जिस से साबित होता हो कि इमाम हुसैन अ.स. के क़त्ल का हुक्म मैंने नहीं दिया था, माथे पर पसीने की बूंदें हैं बदन कांप रहा है कि अब क्या करें.....
हुक्म तो मैंने ही दिया था मैंने ही साद के बेटे को ख़त लिखा था कि अगर उसने यह काम कर दिया तो उसके बदले रय की हुकूमत का मालिक होगा, नहीं तो यज़ीद इब्ने माविया की तरफ़ से रय की हुकूमत का वादा करते हुए लिखा गया ख़त वापस कर दे, तो क्या बेहतर होगा कि साद के बेटे से यही हुक्मनामा वापस ले लिया जाए और उसे इमाम हुसैन अ.स. के क़त्ल का मुजरिम ठहराते हुए ख़ुद को बचा लिया जाए,
इसका मतलब यह है कि अगर यह हुक्मनामा मेरे हाथों में आ जाए तो कूफ़ियों के सीनों में भड़कने वाले इंतेक़ाम के शोले से मैं ख़ुद को बचा सकता हूं। हाथ में शराब का जाम लिए निगाहें उमर इब्ने साद पर पड़ती हैं, दरबार में आवाज़ गूंजती है
शाबाश ईरान के विजेता के बेटे,
इस्लाम की फ़ौज के महान योध्दा साद इब्ने अबी वक़्क़ास के बहादुर बेटे,
आओ मिल कर तुम्हारी कामयाबी का जश्न मनाते हैं आओ ख़ुशी का मौक़ा है हर तरफ़ तुम्हारी बहादुरी के चर्चे हैं मिल कर कुछ जाम पीते हैं। दोनों एक दूसरे के साथ जाम को टकरा कर मुंह से लगाते हैं, इब्ने ज़ेयाद उमर इब्ने साद के क़रीब जाता है, एक दूसरे के कान में गुपचुप बात शुरू होती है कि मैंने तुम्हें जो रय की हुकूमत के वादे के साथ इमाम हुसैन अ.स. के क़त्ल का हुक्मनामा दिया था वह है तुम्हारे पास? ज़रा मुझे दो मुझे उसकी ज़रूरत है?
जैसे ही उमर इब्ने साद ने यह सुना उसके हाथों से जाम गिर जाता है, यह तो बिल्कुल वही बात है जो मैं सोंच रहा था मैंने भी तो यही सोंचा था कि कूफ़े में हमारा विरोध जैसे ही शुरू हुआ और बग़ावत दिखाई पड़ी तो मैं रय की हुकूमत मिलते ही सीधा निकल जाऊंगा, यहां किसी का कुछ पता नहीं कब किसको हुकूमत पर बिठा दें कब किसको नीचे गिरा दें, कब किसकी बैअत कर लें कब किसकी बैअत तोड़ दें, ऐसे में भलाई इसी में है कि यहां से बहुत दूर रय की तरफ़ निकल लिया जाए और जाते जाते मरजाना के बेटे इब्ने ज़ेयाद द्वारा इमाम हुसैन अ.स. के क़त्ल करने के हुक्म के दस्तावेज़ कूफ़े के क़बीले के सरदारों को दिखाया जा सके कि मैं आख़िरी समय में इस काम से पीछे हट रहा था लेकिन इब्ने ज़ेयाद के ज़ोर देने पर मैं इस मुसीबत में फंस गया लेकिन अब उमर इब्ने साद के पैरों तले ज़मीन खिसकने लगती है, जिस हुक्मनामे की बुनियाद पर वह कूफ़े से बच कर बाहर निकल सकता था वही हुक्मनामा इब्ने ज़ेयाद के दिमाग़ में भी चल रहा है, यानी मक्कार ही मक्कार की मक्कारी का शिकार होता है लेकिन वह ख़ुद पर क़ाबू पाते हुए कहता है कि ऐ अमीर वह हुक्मनामा तो जंग के दौरान कहीं खो गया। इब्ने ज़ेयाद की आवाज़ गूंजती है ऐ साद के बेटे मुझे वह हुक्मनामा हर हाल में चाहिए, इब्ने ज़ेयाद की बर्बरता को उमर इब्ने साद अच्छी तरह जानता है, इससे पहले कि उमर इब्ने साद इमाम हुसैन अ.स. के इंतेक़ाम के ख़ूनी तूफ़ान में तबाह हो इब्ने ज़ेयाद की मक्कारी का शिकार हो सकता है, इसलिए पैंतरा बदलने ही में भलाई है, वह कहता है कि अमीर कोशिश करता हूं कि कहीं से ढ़ूंढ़ निकालूं और आपकी ख़िदमत में हाज़िर करूं मैंने शायद किसी महफ़ूज़ जगह पर रख दिया था लेकिन अभी याद नहीं।
इब्ने ज़ेयाद की आवाज़....... जैसे भी हो यह हुक्मनामा मुझे तुरंत चाहिए।
ठीक है अमीर, इजाज़त दीजिए अभी तुरंत जाकर उसे तलाश करूं।
जाओ जहां मिले लेकर आओ। (मुसीरुल अहज़ान, इब्ने नुमा, पेज 88)
उमर इब्ने साद एक हारे हुए जुवारी की तरह महल से बाहर निकलता है उसे रय का गेहूं तो क्या जौ भी नहीं मिल सकी। (जब इमाम हुसैन अ.स. ने उमर इब्ने साद से कर्बला में कहा था कि ऐ इब्ने साद तुझे रय की हुकूमत तो दूर वहां का गेहूं भी नहीं मिल सकता तो उसने पलट कर यही कहा थी कोई बात नहीं मेरे लिए जौ ही काफ़ी है......, अल-फ़ुतूह, जिल्द 5, पेज 92-93, मक़तुलल हुसैन, ख़्वारज़मी, जिल्द 1, पेज 245)
जिस हुकूमत के लिए उसने इतना बड़ा जुर्म किया उसे अच्छी तरह पता चल चुका है कि रय की हुकूमत और उसके बीच बहुत दूरी है और इमाम हुसैन अ.स. का क़त्ल भी उसे रय तक नहीं पहुंचा सकता, वह सोंच रहा था कि कितना जल्दी इमाम हुसैन अ.स. की बद दुआ क़ुबूल हो गई। (अल-इमामह वस सियायह, जिल्द 2, पेज 24) और दुनिया की हक़ीक़त उसके सामने दूध का दूध और पानी का पानी की तरह साफ़ हो गई थी उसे इस सच्चाई का पता चल चुका था कि रय की हुकूमत को भूल जाना ही बेहतर है, यह तो दुनिया और आख़ेरत दोनों ही में घाटे का सौदा हो गया वह भी कितना घाटे का कि इब्ने साद कूफ़ा की तरफ़ निकल पड़ा कि रय की हुकूमत उसकी पहुंच से दूर थी बहुत दूर, और अगर क़रीब भी होती तो इस क़ाबिल नहीं थी कि पैग़म्बर स.अ. के नवासे के क़त्ल का सौदा उससे किया जाता, उधार और नक़द के चक्कर में पड़ वह कितने घाटे का सौदा कर चुका था यह उसके थके हुए उन बोझल क़दमों से समझा जा सकता है जो वह आगे बढ़ाता है, वह जहन्नम की तरफ़ चल पड़ा था ।
उसके पास अब कोई और रास्ता नहीं था बस एक ही रास्ता था जो जहन्नम की तरफ़ जा रहा था और उसी रास्ते पर उसे इसी दुनिया में मुख़्तार का भी सामना करना था और इसी दुनिया में एक मुख़्तार के जहन्नम से हो कर उसे हमेशा हमेशा रहने वाले जहन्नम का सफ़र तय करना था, उमर इब्ने साद के जहन्नम की तरफ़ बढ़ते क़दम उन सभी लोगों के लिए सबक़ हैं जो अपने दौर के हाकिमों और बादशाहों को ख़ुश करने के लिए अपने ज़मीर को थपक कर सुला देते हैं और जब ज़मीर बेदार होता है तब बहुत देर हो चुकी होती है, सामने उस दौर के मुख़्तार की तलवार होती है और उसके आगे जहन्नम के भड़कते हुए शोले होते हैं।
सच में कितने घाटे का सौदा है.....


हुज्जतुल इस्लाम मौलाना नजीबुल हसन ज़ैदी साहब

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