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Date of publication : 31/8/2014 16:6
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जवान आयतुल्लाह ख़ामेनई की निगाह में। 1

कुछ लोग सोचते हैं कि गुनाहों से सिर्फ़ बूढ़ों को बचना चाहिये जबकि बूढ़े लोग जिस तरह से शारीरिक रूप से कमज़ोर हैं उसी तरह से रूहानी (आत्मिक) हिसाब से भी कमज़ोर हैं। (जबकि उनके मुक़ाबले में) नौजवान का इरादा और जम के काम करने की ताक़त उनसे कहीं ज़्यादा है। यह एक ख़ास बात है।
1. आप (नौजवान लोग) हम लोगों से बहुत बेहतर हैं। आप हम लोगों से जल्दी और अच्छे तरीक़े से ख़ुदा का संदेश (पैग़ाम) समझ सकते हैं। ख़ुदा आपसे बातचीत करता है, आपकी बातों का जवाब देता है, और आप उस जवाब को अपने दिल की गहराईयों में महसूस (आभास) करते हैं। (यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स से मुलाक़ात के दौरान, 26-7-1999)
2. कुछ लोग यह समझते हैं कि नौजवान केवल गुनाह की तरफ़ भागता है लेकिन मेरा मानना है कि एक नौजवान जिस तरह शारीरिक रूप से मज़बूत है उसी तरह उसकी क़ूवते इरादी (निर्णय लेने की क्षमता) भी मज़बूत है। (ज़िला गीलान में सिपाहे पासदारान की क़ुदुस 16 बटालियन के परेड ग्राउंड में, 6-5-2001)
3. दीन, नौजवानों की फ़ितरत और उनके स्वभाव में शामिल है। इससे पहले कि हम उन्हे ख़ुदा को पहचनवायें, उनका ज़मीर (अंतरात्मा) और उनका दिल ख़ुद ही ख़ुदा को पहचान लेता है। (सिपाहे पासदारान के कमान्डरों से मुलाक़ात के दौरान)
4. कुछ लोग सोचते हैं कि गुनाहों से सिर्फ़ बूढ़ों को बचना चाहिये जबकि बूढ़े लोग जिस तरह से शारीरिक रूप से कमज़ोर हैं उसी तरह से रूहानी (आत्मिक) हिसाब से भी कमज़ोर हैं। (जबकि उनके मुक़ाबले में) नौजवान का इरादा और जम के काम करने की ताक़त उनसे कहीं ज़्यादा है। यह एक ख़ास बात है। (ज़िला अराक़ के नौजवानों की एक बड़ी संख्या को संबोधित करते हुए 16-11-2000)
5. दीन और इंसानियत के रास्ते कहीं भी समाप्त नहीं होते। (ज़िला अर दबील के नौजवानों की एक बड़ी तादाद से भेंट के दौरान, 26-7-2000)
6. नौजवान हक़ और सच्चाई को बहुत आसानी से स्वीकार कर लेता है। नौजवान खुले दिल व दिमाग़ से एतेराज़ करता है और बिना किसी ज़हनी (मानसिक) उलझन के आगे क़दम बढ़ाता है। हक़ को आसानी के साथ स्वीकार कर लेना, खुले दिल से एतेराज़ करना और बिना किसी मानसिक उलझन के आगे क़दम बढ़ाना, अगर आप इन तीनों चीज़ों को मिला कर देखें तो मालूम होगा कि कितनी ख़ूबसूरत सच्चाई आपकी आँखों के सामने है जो मुश्किलों को ख़त्म करने का बड़ा ही कारगर उपाय है। (ज़िला इसफ़हान के नौजवानों को संबोधित करते हुए, 3-11-2001)
7. इस ज़माने का नौजवान चाहता है कि उसके लिये दीनी बातों को खुल के बताया जाए। वह चाहता है कि दीन तक अक़्ल और दलील (तर्क) के माध्यम से पहुँचे। यह एक प्राकृतिक (फ़ितरी) और अच्छी सोच है। यह सोच ख़ुद दीन ने अपने मानने वालों को सिखाई है। (ज़िला अराक के नौजवानों की एक बड़ी तादाद को सम्बोधित करते हुए, 16-11-2000)
8. नौजवान प्राकृतिक रूप से अदालत (न्याय) को पसंद करता है। फ़िलहाल मेरे हिसाब से सियासी दुनिया वाला न्याय नहीं है। नौजवान के न्याय को पसंद करने का मतलब यह है कि वह चाहता है कि समाज और सुसाइटी में न्याय, क़ानूनी आज़ादी और दीनी सोच का बोल बाला हो। इस्लामी तालीमात (शिक्षा) उसके अन्दर एक इन्क़ेलाब पैदा कर देती हैं और वह उन तालीमात की तरफ़ खिंचा चला जाता है। उसके दिमाग़ में अमीरुल मोमिनीन अ. की जो तसवीर है वह उसके अन्दर एक इन्क़ेलाब पैदा करती है। वह मौजूदा हालात की कमियों का परखता है और फिर चाहता है कि उसके समाज में तब्दीली आए। यह एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। (ज़िला इस्फ़ेहान के नौजवानों से भेंट के दौरान, 3/11/2001)
9. इंसान, खास कर नौजवान ख़ूबसूरती की तरफ़ भागता है और चाहता है कि वह ख़ुद भी ख़ूबसूरत हो। इसमें कोई बुराई नहीं है और यह एक नेचुरल चीज़ है जिससे इस्लाम ने भी नहीं रोका है, जिस चीज़ से इस्लाम ने रोका है वह उसका ग़लत इस्तेमाल है। (नौजवान सप्ताह के दौरान नौजवानों की सभा में 27/4/1984)
10. नौजवान अत्याचार (ज़ुल्म) के मुक़ाबले ख़ामोश नहीं बैठ सकता। आप पूरी दुनिया के इतिहास में कहीं पर भी यह नहीं देखेंगे कि किसी देश में नौजवानों का आंदोलन दुश्मनों के तरफ़दारी (पक्ष) में शुरू हुआ हो। हमेशा नौजवानों ने अपने मुल्क में दूसरों की दख़ालत (हस्तक्षेप) के ख़िलाफ़ आवाज़ ही उठाई है। (तेहरान यूनिवर्सिटी की छात्र यूनियन को संबोधित करते हुए, 14/1/1999)



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