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Date of publication : 18/9/2014 22:42
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आज के मुस्लिम नौजवानों की ज़िम्मेदारिया

इस्लामी इतिहास में मुस्लिम नौजवानों ने ज़िन्दगी के हर मैदान में बहुमूल्य क़ुर्बानियां देते हुए और संघर्ष करते हुए बेमिसाल कामयाबियाँ हासिल की हैं। आज के दौर में ईमान से दूरी की बेसिक वजह नौजवान पीढ़ी का ईमान के मअना व मफ़हूम से परिचित न होना है।



विलायत पोर्टलः इस्लामी इतिहास में मुस्लिम नौजवानों ने ज़िन्दगी के हर मैदान में बहुमूल्य क़ुर्बानियां देते हुए और संघर्ष करते हुए बेमिसाल कामयाबियाँ हासिल की हैं। आज के दौर में ईमान से दूरी की बेसिक वजह नौजवान पीढ़ी का ईमान के मअना व मफ़हूम से परिचित न होना है। इसके अलावा इस्लाम दुश्मन ताक़तों की नज़रयाती, कलचरल और जज़बाती (भावनात्मक) यलग़ार भी मुसलमानो और विशेष रूप से नौजवान पीढ़ी की ईमान से महरूमी का कारण बन रही है। क्योंकि नज़रिया किसी भी क़ौम, मज़हब, तहरीक या संगठन के लिए बुनियादी दर्जा रखता है। और यह हक़ीक़त है कि राष्ट्र नज़रियों के आधार पर बनते और क़ायम रहते हैं। और जैसे ही आईडियालोजिकल बेस कमजोर हुई, ज़वाल (पतन) और अराजकता क़ौमों का मुक़द्दर बन जाती है। उसकी एक सादी और सामान्य मिसाल यह है कि एक पेड़ की हरियाली और उसका बढ़ना उसकी जड़ पर निर्भर करता है और जड़ ही पेड़ की ज़िन्दगी और तर व ताजगी का ज़रिया है अगर जड़ में कमी या ख़राबी हो तो पेड़ मुरझाना शुरू हो जाएगा और फिर धीरे धीरे उसके पत्ते, टहनियाँ, फल, फूल जिस स्थिति में होंगे सूख सूख कर ज़मीन पर गिरने लगेंगे। अगर जड़ मजबूत हो तो पौधा मज़बूत और फलदार होगा, उससे ख़ुराक हासिल करना दूसरों के लिए जीवन पाने का कारण बनेगा। बात सारी तासीर (प्रभाव) की है, जिस तरह पेड़ में सारी तासीर जड़ और तने की होती है, तासीर अच्छी होगी तो पेड़ फल फूल भी अच्छे देगा और अगर तासीर में नक़्स या कमी होगी तो पेड़ सूख जाएगा यहाँ तक कि लोग उसको काट कर फेक देंगे। इसी तरह नज़रिया भी कौमों के कलचरल, मज़हबी और सामाजिक बक़ा और सलामती की अलामत होता है। इसलिए अगर वर्तमान समय में मुसलमानों को ईमान सुरक्षित रखना है और कुल मिलाकर विकास करना है तो उसे अपनी बेसिक विचारधाराओं को अपनाकर अपने जीवन को इस्लामी शिक्षाओं के सांचे में ढालना होगा वरना गुमराही व पस्ती और अपमान व गुलामी उसका मुकद्दर बन जाएगा। जैसा कि क़ुरआने हकीम में है: إِنَّ اللّهَ لاَ يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّى يُغَيِّرُواْ مَا بِأَنْفُسِهِمْ. الرعد، 13 : 11 '' बेशक अल्लाह किसी क़ौम की हालत को नहीं बदलता यहां तक कि वह लोग खुद अपने आप में बदलाव कर डालें।''


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