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Date of publication : 24/7/2016 12:5
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हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई अपनों और ग़ैरों की निगाह में।

28 जमादिउल अव्वल को, सय्यद जवाद ख़ामेनाई के घर में एक बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम उसके बाप ने सय्यद अली रखा। ख़ुद सय्यद जवाद एक बड़ी सादी ज़िन्दगी बिताने वाले एक आलिम थे। आयतुल्लाह ख़ामेनई अपनी फ़ैमली की ज़िन्दगी के बारे में यूँ बताते हैं: मेरे वालिद एक मशहूर मौलाना थे, लेकिन एक बहुत परहेज़गार (सदाचारी) और सादे आदमी थे। हम लोग बहुत मुश्किलों में ज़िन्दगी ग़ुज़ार रहे थे। मुझे वह वक़्त याद है जब कभी कभी हमारे घर में रात का खाना नहीं होता था और मेरी वालेदा (माता) बड़ी मुश्किलों से कहीं खाने का एन्तेज़ाम करती थीं और वह खाना भी रोटी और किशमिश हुआ करता था।



विलायत पोर्टलः 28 जमादिउल अव्वल को, सय्यद जवाद ख़ामेनाई के घर में एक बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम उसके बाप ने सय्यद अली रखा। ख़ुद सय्यद जवाद एक बड़ी सादी ज़िन्दगी बिताने वाले एक आलिम थे। आयतुल्लाह ख़ामेनई अपनी फ़ैमली की ज़िन्दगी के बारे में यूँ बताते हैं: मेरे वालिद एक मशहूर मौलाना थे, लेकिन एक बहुत परहेज़गार (सदाचारी) और सादे आदमी थे। हम लोग बहुत मुश्किलों में ज़िन्दगी ग़ुज़ार रहे थे। मुझे वह वक़्त याद है जब कभी कभी हमारे घर में रात का खाना नहीं होता था और मेरी वालेदा (माता) बड़ी मुश्किलों से कहीं खाने का एन्तेज़ाम करती थीं और वह खाना भी रोटी और किशमिश हुआ करता था। जिस घर में आयतुल्लाह ख़ामेनई का घराना रहा करता था उसके बारे में वह कहते हैं: मेरे वालिद का घर जिसमें मैं पैदा हुआ मेरी चार पाँच साल की उम्र तक मशहद शहेर के ग़रीब इलाक़े में 60-70 मीटर का घर था जिसमें सिर्फ़ एक कमरा था और एक अंधेरे में डूबा ऐसा बेसमेंट था जिसमें जाते ही दम घुटता था। मेरे वालिद चूँकि अपने मोहल्ले के मौलाना थे तो कभी कभी मेहमान घर में होते थे। जब मेहमान घर में आते तो हम सब मेहमान के वापस चले जाने तक उसी तहख़ाने में रहते थे उसके बाद कुछ लोगों ने, जिनको हमारे वालिद से ख़ास लगाव था, हमारे घर के बराबर में एक ज़मीन ख़रीद के हमारे घर में मिला दी, जिसके बाद हमारे घर में तीन कमरे हो गये। इस्लामी इन्क़ेलाब के सुप्रीम लीडर बचपन से ही एक फ़क़ीर घराने में पले बढ़े, लेकिन फ़क़ीर होने के साथ साथ एक मज़हबी, अच्छा और दिलचस्प घराना था। चार साल की उम्र में अपने बड़े भाई के साथ मकतब जाना शुरू किया ताकि पढ़ने लिखने के साथ साथ क़ुरआन पढ़ना भी सीखें। उसके बाद दोनो भाईयों का एडमीशन दारुल तालीम दियानती नामी एक इस्लामी मदरसे में कराया गया और सय्यद अली ख़ामेनाई नें अपने बड़े भाई सय्यद मोहम्मद के साथ प्राइमरी एजूकेशन को इसी मदरसे से हासिल किया। उसके कुछ सालों के बाद नजफ़ के हौज़ए इल्मिया में पढ़ाई और उसके बाद 1962 में क़ुम के हौज़े में पढ़ाई के बीच ऐसे हालात बने जिससे आपको इमाम ख़ुमैनी (र.ह.) के हाथों शुरू होने वाली इन्क़ेलाब की लहेर में शामिल होने का मौक़ा मिला। राजा के ज़माने की ईरानी इंटेलीजेंस, सावाक नें आयतुल्लाह ख़ामेनई को कई बार (6 बार) गिरफ़्तार भी किया और उसके बाद आख़िर में सावाक ने उनको ईरान शहर में निर्वासित (जिला वतन) कर दिया। उसके बाद भी आयतुल्लाह ख़ामेनाई नें सन 1358 शम्सी में इस्लामी इन्क़ेलाब की कामयाबी तक उसका भरपूर साथ दिया और उसके कामयाब हो जाने के बाद भी पूरे जी जान से अपनी इस्लामी गतिविधियों में लगे रहे और उसके लक्ष्यों को हासिल करने के लिये उन्होंने ऐसी कोशिशें की जो उस ज़माने में बेमिसाल और बड़ी अहेम (महत्वपूर्ण) थीं। हम यहाँ ऐसे बड़े सियासी लीडरों की राय पेश कर रहे हैं जो ईरान के इस्लामी इन्क़ेलाब को एक दुश्मन के रूप में देखते हैं और साथ साथ आयतुल्लाह ख़ामेनई के बारे में ईरान और दुनिया के कुछ सियासी, मज़हबी और समाजी चेहरों के नज़रियों को भी बयान कर रहे हैं।
इमाम ख़ुमैनी (रह.)
जब आयतुल्लाह ख़ामेनई ईरान के राष्ट्रपति थे तो उस वक़्त इमाम ख़ुमैनी (र.ह.) नें उनसे कहा: जब आप कहीं सफ़र पर चले जाते हैं तो मैं उस वक़्त तक परेशान रहता हूँ जब तक आप वापस नहीं आ जाते, ज़्यादा सफ़र न किया करें। आयतुल्लाह शहीद मुतह्हरी (रह.)
सय्यद अली ख़ामेनाई की गिनती उन लोगों में से हैं जिनसे आगे चल के बड़ी उम्मीदें हैं। मुझे उनका ख़ुलूस (प्यूरिटी) देख के आश्चर्य होता है। वह कभी अपने को दिखाने या आगे बढ़ाने के लिये कोई काम नहीं करते। इमाम ख़ुमैनी (र.ह.) के (पैरिस से वापस आने के बाद) उनके स्वागत करने के लिये जो कमेटी बनी थी उसमें, मैंने उनके तक़वे (सदाचार) को देखा। (शहीद मुतह्हरी की वाइफ़ की ज़बानी)।
आयतुल्लाह बहाउद्दीनी (रह.)
 जब आयतुल्लाह ख़ामेनई, आयतुल्लाह बहाउद्दीनी से मिले तो उनके जाने के बाद लोगों ने आयतुल्लाह बहाउद्दीनी से पूछा कि क्या कल यहाँ आयतुल्लाह ख़ामेनई आये थे? तो उन्होंने जवाब दिया: हाँ कुछ देर के लिये सूरज यहाँ आकर चमका और फिर चला गया। उनके अन्दर सूरज की तरह नेकी और बरकत है।
शहीदे मेहराब आयतुल्लाह दस्तग़ैब (रह.)
मैं जो इस इंसान (आयतुल्लाह ख़ामेनई) के बारे में समझा हूँ वह यह कि आप अल्लाह वाले है, कुर्सी या किसी पोस्ट के लालची नहीं हैं, अपनी चाहतों के बन्दी नहीं हैं, ताक़त को हाथ में नहीं लेना चाहते, इन्क़ेलाब से पहले और उसके बाद भी बार्डर पर जा के इस्लाम का बचाव करें, (यह एक बड़ी बात है)। आप वह महान इंसान हैं जो अपने कुछ नहीं समझता। वास्तव में आप एक महान लीडर हैं। इमाम ख़ुमैनी (रह.) कहा करते थे कि बेहतर है कि मुझे अपना लीडर कहने के बजाए अपना नौकर कहा करो। आयतुल्लाह अली ख़ामेनई भी ऐसे ही हैं। कोई पोस्ट नहीं चाहते और नाहि कोई पोस्ट उनको बदलती है।
शहीद आयतुल्लाह मुस्तफ़ा ख़ुमैनी (रह.)
आयतुल्लाह मुस्तफ़ा ख़ुमैनी नें अपने कुछ जानने वालों को एक ख़त लिखा जिसमें आया है: ख़ामेनई भाइयों और ख़ास कर हमारे सरदार अली ख़ामेनाई को हमारा सलाम कहना। शहीदे मेहराब आयतुल्लाह सदूक़ी (रह.) इन्क़ेलाब से पहले ही ख़ामेनई साहब को आयतुल्लाह कहा करते थे।
शहीद लेफ़्टिनेंट जनरल अली सय्याद शिराज़ी (रह.)
शहीद लेफ़्टिनेंट सय्याद शिराज़ी नमाज़ के क़ुनूत में बहुत सी अलग अलग दुआएं पढ़ते थे, लेकिन हर क़ुनूत के आख़िर में यह जुमला ज़रूर पढ़ते थे: اللہم ایّد آیۃ اللہ العظمیٰ خامنہ ای،اللہم احفظہ و وفقّہ و ثبّتہ ऐ अल्लाह! आयतुल्लाह ख़ामेनई का सपोर्ट कर, उनकी सुरक्षा कर, उनको (उनके लक्ष्यों में) कामयाब कर, उनको स्थिरता प्रदान कर।
शहीद सय्यद मुर्तज़ा आवीनी (रह.)
आप लिखते हैं: बहुत हैं ऐसे लोग जो इस बात को जानते हैं कि सच्चाई की कामयाबी के लिये अपने साथ रह कर तलवार चलाने में वही सवाब है जो इमाम ज़माना (अज.) के साथ रह कर जेहाद करने में है, और इस तरह वह सिर्फ़ तय्यार ही नहीं बल्कि अपनी जान देने के लिये उतावले हैं। बस आपका आदेश और हमारी जान।
आक़ाए मीर दामादी
(आयतुल्लाह ख़ामेनाई के मामू) कहते हैं कि सय्यद हाशिम मीर दामादी (आयतुल्लाह ख़ामेनाई के नाना) और ख़ुद उनके वालिद को ख़ामेनई साहब से एक ख़ास लगाव था और यह लोग कहा करते थे कि सय्यद अली का भविष्य अच्छा है। आयतुल्लाह शेख़ मुर्तज़ा हाएरी ने भी आयतुल्लाह ख़ामेनाई से कहा था: सय्यद अली जो योग्यता में तुम में देखता हूँ उससे लगता है कि तुम या तो मरजए तक़लीद बनोगे या अपने इलाक़े ख़ुरासान के जाने माने मौलाना।
आयतुल्लाह मरहूम बोहलोल (रह.)
मैंने अपनी ज़िन्दगी में बहुत सारे लीडरों और बड़ी बड़ी पोस्ट रखने वालों को देखा है, लेकिन उनमें से किसी को भी, जनाब (आयतुल्लाह ख़ामेनाई) की तरह दुनिया के मामले में सन्यासी नहीं देखा।
ज़ैनुल आबेदीन हैदरी
(ईराक़ के अल् फ़ुरात चैनल के रिपोर्टर) एक बार ईराक़ से एक डेलीगेशन तेहरान आया और उसने आयतुल्लाह खामेनई से मुलाक़ात की, उस डेलीगेशन में शामिल एक व्यक्ति नें इस मुलाक़ात के बाद कहा: मेरे ख़ानदान में कई लोग ईराक़ के बड़े और जाने माने उल्मा में से हैं और ख़ुद मेरा भी ईराक़ी उल्मा के साथ आना जाना रहता है लेकिन जब मैंनें आयतुल्लाह ख़ामेनई को देखा तो मैं उनके कैरेक्टर से बड़ा प्रभावित हुआ और उनको देखते ही रो पड़ा।
शेख़ महमूद ईद
(अर्जेंटाइना के इस्लामी सेंटर के मैनेजर) अर्जेंटाइना के लोग इस्लामी इन्क़ेलाब से बड़ी मोहब्बत करते हैं इसलिये कि वह अमरीका और ज़ायोनी शासन के नेतृत्व में विश्व साम्राज्य के सामने खड़ा हुआ है। अब से 5 साल पहले 22 ग्रेजवेट विदेशी छात्रों के एक ग्रुप के साथ आयतुल्लाह ख़ामेनाई से मिलने गये। उसमें यह तय हुआ कि एक तुर्की और एक पाकिस्तानी स्टूडेंट वहाँ कुछ बोलेगा। जब पाकिस्तानी स्टूडेंट की बारी आयी तो वह बोलते वक़्त घबरा गया और उसके हाथ काँपने लगे। यह देख कर आयतुल्लाह ख़ामेनई ने कहा कि अगर यह मेरी वजह से है तो मैं तो एक आम आदमी हूँ, आप आराम से अपनी बात बोलें, जब यह बात सबने सुनी तो सब रो पड़े। उसके बाद जब उनका हाथ चूमने की बारी आयी तो आज़रबाईजानी नें आयतुल्लाह ख़ामेनाई से कहा कि क़यामत के दिन हमारे लिये दुआ (प्रार्थना) कीजिएगा। उन्होंने जवाब दिया: अगर मैं जन्नती रहा तो मैं आप लोगों के लिये दुआ करुँगा और अगर आप जन्नती रहे तो आप मेरे लिये दुआ करें। उस दिन जो आयतुल्लाह ख़ामेनाई से मुलाक़ात हुई वह मेरे जीवन का सबसे अच्छा और मीठा फल था, सदा यह दुआ करता हूँ कि वह पल फिर से आ जाएं।
विलादेमीर पुतिन (रुसी राष्ट्रपति)
कुछ साल पहले ईरान के इस्लामी इन्क़ेलाब की कामयाबी के बाद पहली बार रूसी राष्ट्रपति पुतिन का ईरान आना हुआ। पुतिन डिप्लोमैटिक सिद्धांतों के मामले में बड़े ही अनुशासित राष्ट्रपति हैं लेकिन उसके बावुजूद उन्होंने कई बार यह पूछा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई से उनकी मुलाक़ात हो पायगी या नहीं? उन्होंने आयतुल्लाह ख़ामेनाई से मुलाक़ात की उसमें आयतुल्लाह ख़ामेनई नें उन्हे सोवियत यूनियन के बारे में कुछ बातें बताईं जो उनके लिये बिल्कुल नई थीं। इस मुलाक़ात के बाद राजनयिक अधिकारियों का कहना है कि पुतिन का व्यवहार बहुत बदल गया था और ख़ुद उन्होंने ईरान के फ़ारेन मिनिस्ट्री से कहा कि आप ज़रूर रूस की यात्रा करें ताकि आपस में कुछ बात चीत करें। पुतिन की रूस वापसी के बाद एक रिपोर्टर ने आयतुल्लाह ख़ामेनाई के साथ होने वाली उनकी मुलाक़ात के बारे में उनसे पूछा तो उन्होंने जवाब दिया: मैंने जीसास (यीशू यानि हज़रत ईसा मसीह अ.) को नहीं देखा, बस उनकी कुछ विशेषताओं को मैंने सुना और इन्जील में पढ़ा है लेकिन मैंने ईरानी लीडर में जीसास को देखा है।
कोफ़ी अन्नान (यू. एन. ओ. के पूर्व जनरल सिक्रेटरी)
जब कोफ़ी अन्नान यू एन ओ के जनरल सिक्रेटरी थे तो उस वक़्त ईरान की यात्रा पर आये। ईरान से वापसी के समय तेहरान से निकलते हुए उन्होंने कहा: मैं अपनी नौजवानी में दुनिया के बड़े और टैलेंटेड लोगों के बारे में बहुत पढ़ता था और मेरे दिमाग़ में सदा यह सवाल रहता कि अगर कभी दुनिया कि किसी बड़े और प्रतिभाशाली आदमी से मेरा सामना हो तो मेरा क्या रिऐक्शन होगा? (मेरी क्या प्रतिक्रिया होगी), उसके बाद कहते हैं कि जो लोग मुझे यू एन ओ तक लाये वह सब दुनिया के जाने माने लोग थे और मुझे उनसे लगाव था जैसे जैक शेराक, मैं जैक शेराक से बड़ा प्रभावित था क्योंकि जब भी वह बोलते तो बग़ैर कुछ सोचे अपनी सारी बात साफ़ कह जाते थे। मिखाइल_गोर्बाचोफ और हेल्मुट कोल भी ऐसे ही थे। यह लोग ऐसे थे जो बोलने के लिये ज़रा भी रुकते और सोचते नहीं थे। मुझे यह लोग पसंद थे लेकिन (आयतुल्लाह) ख़ामेनाई से मिलने के बाद मुझे ऐसा लगा कि मैंने उनके जैसा आज तक नहीं देखा था उनके आध्यात्मिक रूख़ (Spiritual Personality) ने मुझे ऐसा प्रभावित किया कि मैं अपने से पूछने लगा कि क्यों मैं यू एन ओ का जनरल सिक्रेटरी हूँ जबकि मेरे अन्दर वह आध्यात्मिकता और मानवीयत नहीं है। मिस्टर ख़ामेनई को देखने के बाद मैं उन सब लोगों को भूल गया जिन्होंने मुझे अपनी तरफ़ आकर्षित किया था। मैं दुनिया की बहुत सारी आध्यात्मिक पर्सनालिटीज़ से मिला हूँ लेकिन उनमें से किसी के पास सियासी जानकारी नहीं थी। ख़ामेनई साहब को देखने के बाद मेरे दिमाग़ में उन सबकी छवि फिर पहले की तरह नहीं रही। मुझे आश्चर्य होता है कि उन (आयतुल्लाह ख़ामेनई) के होते हुए भी ईरान कभी कभी क्यों मुश्किल में फंसता है? मुझे नहीं लगता कि मैं यू एन ओ वापस जाने के बाद भी उनको भुला पाउंगा।
जेविएर पेरेज डे क्यूलार (यू एन ओ के भूतपूर्व जनरल सिक्रेटरी)
ईरान, ईराक़ की जंग के वक़्त पेरेज ईरान आये और उन्होंने राष्ट्रपति आयतुल्लाह ख़ामेनई से भी मुलाक़ात की। मुलाक़ात के बाद उन्होंने लोगों से पूछा: तुम्हारे राष्ट्रपति नें दुनिया की कौन सी यूनिवर्सिटी में पॉलिटिक्स पढ़ी है? उसके बाद कहते हैं कि मैंने पॉलिटिक्स साइंस से पी. एच. डी. की है और तीस साल से सियासत में हूँ और कई साल से यू एन ओ का जनरल सिक्रेटरी हूँ, मैं इस बीच बहुत से सियासी लीडरों और राष्ट्रपतियों से मिला हूँ, लेकिन उनके जैसा पॉलिटीशियन और अक़्लमंद आदमी मैंने आज तक नहीं देखा।
बनी सद्र (ईरान के अपदस्थ राष्ट्रपति)
अबुल हसन बनी सद्र ईरान का पहला राष्ट्रपति था जो कई बार विश्वासघात (ख़ेयानत) करने के बाद ईरान की असेम्बली द्वारा और इमाम ख़ुमैनी (रह.) की तरफ़ से पुष्टि हो जाने के बाद बर्ख़ास्त कर दिया गया था। उसने इंग्लैण्ड के आब्ज़र्व नाम के दैनिक अख़बार के साथ अपनी एक बात चीत में कहा- अगर आज इमाम ख़ुमैनी ज़िन्दा होते तो सैंकड़ों बार मिस्टर ख़ामेनई को शाबाश कहते इस लिये कि जो सिस्टम इमाम ख़ुमैनी (रह.) नें ईरान में ईजाद किया उसको उन्होंने अच्छी तरह बचा कर रखा है।


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