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Code : 60892
Date of publication : 9/10/2014 11:30
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ईदुल अज़्हा

तुम लोग अपने पालने वाले के लिए नमाज़ पढ़ो और क़ुरबानी करों। (सूरए कौसर आयत नं 2) ज़िलहिज महीने की दसवीं तारीख़ को ईदुल अज़हा मनाई जाती है जिसे बक़रीद भी कहा जाता है। यह मुसलमानों की दूसरी बड़ी ईद है। आज का दिन अल्लाह तआला की ख़ुशी के हासिल करने के लिए अल्लाह तआला के भेजे हुए पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के त्याग और उनके चहेते बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के मज़बूत और पक्के ईमान की याद दिलाता है। दूसरे शब्दों में ईदुल अज़हा, दुनियावी दिल लगी और मोहमाया से आज़ाद होने के मानि में है।



فصل لربک و انحر
विलायत पोर्टलः तुम लोग अपने पालने वाले के लिए नमाज़ पढ़ो और क़ुरबानी करों। (सूरए कौसर आयत नं 2) ज़िलहिज महीने की दसवीं तारीख़ को ईदुल अज़हा मनाई जाती है जिसे बक़रीद भी कहा जाता है। यह मुसलमानों की दूसरी बड़ी ईद है। आज का दिन अल्लाह तआला की ख़ुशी के हासिल करने के लिए अल्लाह तआला के भेजे हुए पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के त्याग और उनके चहेते बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के मज़बूत और पक्के ईमान की याद दिलाता है। दूसरे शब्दों में ईदुल अज़हा, दुनियावी दिल लगी और मोहमाया से आज़ाद होने के मानि में है। वास्तव में बक़रीद अल्लाह तआला के सामने पूरी तरह से झुकने का दिन। आज के दिन इंसान अपने अल्लाह के लिए, उसके अलावा हर चीज़ को छोड़ देता है ताकि उसे अल्लाह तआला की वास्तविक बंदगी हासिल हो सके। बक़रीद का दिन वह दिन है जब हज करने वाला हज के संस्कार पूरे करने के शुक्र तथा शैतान के साथ जंग में कामयाबी पर दुनियावी एवं आंतरिक संबन्धों को ख़त्म कर देता है और इस महान दिन जश्न मनाता है। इस मुबारक मौक़े पर हमारी तरफ़ से दिली मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए। अल्लाह तआला के महान पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ख़्वाब (स्वप्न) में देखा था कि वे अपने प्यारे बेटे की अल्लाह तआला के राह में क़ुर्बानी कर रहे हैं। इस सपने को उन्होंने तीन बार देखा। कई बार इस सपने को देखने के बाद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम समझ गए कि अपने बेटे की मुहब्बत और अल्लाह तआला के इरादे के बीच उन्हें अपने बेटे की क़ुर्बानी देनी चाहिए। इसी मक़सद से उन्होंने अल्लाह तआला के हुक्म को लागू करने का पक्का इरादा किया। पक्के इरादे को अमली बनाने के लिए पहला चरण यह था कि इस बात को वह अपने चहेते बेटे को बताते। इसी मक़सद से उन्होंने अपने चहेते बेटे इस्माईल (अ.) को संबोधित करते हुए कहा कि हे मेरे बेटे मैंने सपने में देखा है कि तुमको ज़िबह कर रहा हूं। इस संबन्ध में तुम्हारा क्या ख़्याल है? हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने, जो अपने वालिद हज़रत इब्राहीम (अ.) की ही तरह अल्लाह तआला के प्यार में डूबे हुए थे, कहा कि हे मेरे वालिद! आपको जो कुछ हुक्म दिया गया है उसे कर डालिए। अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे धैर्यवान (सब्र करने वाला) पाएँगे। अल्लाह तआला के प्रति इस अथाह लगाव ने शैतान को बौखलाहट में डाल दिया इसलिए उसने इस अल्लाह तआला के हुक्म को बेअसर बनाने के लिए अपनी कोशिशें शुरू कर दीं। अपनी स्कीम को अमली करने के मक़सद से शैतान कभी तो बेटे के पास गया तो कभी बाप के पास और कभी माँ के पास लेकिन तीनों में से किसी ने उसकी एक न सुनी। इस तरह से अपने प्रयासों में उसे नाकामी हाथ लगी। इस्लामी इतिहास के अनुसार शैतान पहले तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पीछे गया। जब वह उस जगह पर पहुंचा जो मक्के के निकट मिना में जमरए ऊला के नाम से मशहूर है तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने सात पत्थर मारकर उसे ख़ुद से दूर कर दिया। जब हज़रत इब्राहीम (अ.) उस जगह पर पहुंचे जिसे जमरए सानिया कहा जाता है तो उन्होंने शैतान को दोबारा देखा। इस बार भी उन्होंने शैतान को सात पत्थर मारकर फिर ख़ुद से दूर किया और फिर जमरए अक़बह नामी जगह पर भी उन्होंने यही काम किया। अंततः अब बहुत ही सेंसेटिव स्टेज आ पहुंचा था। मेहरबान बाप ने अपने चहेते बेटे को ज़मीन पर लिटाया और इस्माईल के गले पर चाक़ू फेरना शुरू किया लेकिन धारदार चाक़ू उनके गले पर नहीं चला। इससे हज़रत इब्राहीम को बहुत ही आश्चर्य हुआ। इसके बाद उन्होंने उसी चाक़ू को अपने बेटे के गले पर और तेज़ी से चलाया। ख़ुलूस और निष्ठा के इस अनोखे सीन को अल्लाह तआला के फ़रिश्ते बहुत ही आश्चर्य से देख रहे थे। इसी बीच अल्लाह तआला की ओर से आवाज़ आई। हे इब्राहीम! तुमने अपने सपने को साकार कर दिखाया। निःसन्देह हम, भले लोगों को इसी तरह का इनाम देते हैं। इसी बीच अल्लाह तआला ने एक भेड़ भेजी ताकि इब्राहीम (अ.) अपने बेटे इस्माईल (अ.) के जगह पर उसकी क़ुरबानी करें। हज़रत इब्राहीम (अ.) के क़ुरबानी व बलिदान की जगह हमें अल्लाह तआला के आज्ञापालन का पाठ सिखाती है। अल्लाह तआला जिस बात का भी हुक्म दे उसे उसके बंदे को बिना किसी हिचकिचाहट के पूरा करना चाहिए। एक बाप को यह हुक्म दिया जाता है कि वह अपने प्यारे और चहेते बेटे को ज़िब्ह करे। यह काम, अल्लाह तआला के सामने हज़रत इब्राहीम (अ.) के पूरी तरह से नतमस्तक होने और अल्लाह तआला के अलावा हर एक को छ़ोड़ने के मानि में है। अपने चहेते बेटे हज़रत इस्माईल (अ.) को ज़िब्ह करने के विषय को हज़रत इब्राहीम (अ.) बहुत ही ख़ूबसूरत ढंग से बयान करते हैं और इस बारे में उनके ख़्याल जानना चाहते हैं। वास्तव में वह यह चाहते हैं कि उनका बेटा भी इच्छाओं के ख़िलाफ़ इस संघर्ष में हिस्सा ले और अपने बाप की ही तरह अल्लाह तआला की मर्ज़ी हासिल करने का मज़ा हासिल करे। दूसरी तरफ़ बेटा भी यह चाहता है कि उसके बाप अपने इरादे पर अडिग रहें। इस्माईल अपने बाप से यह नहीं कहते हैं कि आप मुझको ज़िब्ह कर दीजिए बल्कि वह कहते हैं कि आपको जो भी हुक्म दिया गया है उसे बिना हिचकिचाहट के पूरा कीजिए। मैं अल्लाह तआला के हुक्म के सामने पूरी तरह से नतमस्तक हूं। इस तरह हज़रत इस्माईल (अ.) अल्लाह तआला की इच्छा को दिल से क़ुबूल करते हैं और उसपर भरोसा करते हैं तथा उससे अपने इस इरादे पर बाक़ी रहने की दुआ करते हैं। मिना में क़ुरबानी करने से पहले हाजी ख़ुद को प्यार की क़ुरबानीगाह ले जाता है और अपनी इच्छाओं को त्याग देता है। अल्लाह तआला सूरए हज की आयत नं ३७ में कहता है कि न उनका गोश्त अल्लाह तक पहुँचता है और न ही उनका ख़ून बल्कि जो कुछ उस तक पहुंचता है वह तुम्हारा तक़वा या अल्लाह तआला का डर है। इस आधार पर इस काम का जो फ़ायदा है वह केवल हाजी को ही पहुंचता है और वह है अल्लाह तआला का डर या ज़िम्मेदारी के निभाने का एहसास। अल्लाह तआला का डर हाजी के वफ़ादार और सच्चे दिल को शांति पहुंचाता है तथा उसकी आत्मा को शुद्ध करता है। इस संबन्ध में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि क़ुरबानी देते वक़्त तुम अपनी हवस और लालच की रगें काट दो। उनके इस बयान में अहेम प्वाइंट यह है कि इसमें लालच को गला बताया गया है। अर्थात क़ुर्बानी के समय लालच के गले को इस तरह से काटना चाहिए कि वह सदा के लिए ख़त्म हो जाए। संभव है कि इसीलिए क़ुर्बानी में सबसे महत्वपूर्ण छिपी हुई चीज़ तक़वा अर्थात अल्लाह तआला का डर है जिसके कारण ईदुल अज़हा को हज्जे अकबर या महाहज कहा गया है और अल्लाह तआला के घर का दर्शन करने वाले जब बहुत सी कठिनाइयों को सहन करके और दुनियावी सुखों को छ़ोड़ते हुए अपने टार्गेट पर पहुंचते हैं तो वह ईदे क़ुरबान को बड़े जोश से मनाते हैं।


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