Wed - 2018 Oct 17
Languages
Delicious facebook RSS दोस्तों को भेजें। प्रिंट सेव करें। XML TEXT PDF
Code : 61103
Date of publication : 19/9/2016 9:27
Hit : 800

ग़दीर आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान की रौशनी में

ग़दीर मुसलमानों के बीच एकता का आधार

ग़दीर के त्योहार को अल्लाह का सबसे बड़ा त्योहार कहते हैं, यह तमाम त्योहार में सबसे बड़ा है, इस त्योहार का असर भी सबसे बड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसा क्यों है?


हिदायत का सूचक और हुकूमत की मिसाल
ग़दीर के त्योहार को अल्लाह का सबसे बड़ा त्योहार कहते हैं, यह तमाम त्योहार में सबसे बड़ा है, इस त्योहार का असर भी सबसे बड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसा क्यों है?

क्योंकि इस दिन हिदायत और हुक़ूमत (शासन के ह़वाले से मुसलमानों की ज़िम्मेदारी निश्चित कर दी गई है। इस में कोई शक नहीं है कि ग़दीर के सिलसिले में हज़रत रसूलुल्लाह (स.अ.) की हिदायत पर अमल नहीं हुआ है और पैग़म्बरे इस्लाम (स...) ने अपने कथनों में पहले भी इस बात की ख़बर दी थी। लेकिन यह बात तय है कि ग़दीर के दिन वास्तव में एक कसौटी और मापदंड का ऐलान हुआ है। ताकि क़यामत के लिए दुनिया भर के मुसलमान, उसे अपने लिए एक कसौटी और ज़िन्दगी की एक मिसाल बना कर अपने सामने रखें और उससे ज़िन्दगी में सबक़ लें। और अगर हज़रत पैग़म्बर (स.अ.) ने इतने अहेम और सेंसेटिव ज़माने का चयन किया तो वह वास्तव में अल्लाह का चयन था। इसमें उनका कोई दख़ल नहीं था। अलबत्ता इसका कदापि मतलब यह नहीं है कि ह़ज़रत पैग़म्बर (स..अ.) पहले से इमामत और विलायत की बात को नहीं जानते थे, और उस दिन पहली बार उनको ख़बर मिली। बल्कि पैग़म्बर (स.अ.) को अपनी पैग़म्बरी के पहले दिन से ख़बर थी और अपनी पैग़म्बरी के 23 साला दौर में जगह जगह पर आपने इस तरह़ इस बात को स्पष्ट किया था कि इसमें किसी भी तरह़ के शक की कोई जगह नहीं रह गई थी। लेकिन उसका औपचारिक ऐलान सबसे पहले इतने महात्वपूर्ण और सेंसेटिव दौर में अल्लाह के ह़ुक्म से हुआ।

उपदेश और दीन का प्रचार पैग़म्बर (स...) के काम का ह़िस्सा है।
पैग़म्बर (स..) को इस लिए भेजा गया था कि आप लोगों को इल्म सिखायें और उनकी आत्माओं को पाक करें जितने भी नबी आये, उन्होंने अपने समय की मौजूद सुविधाओं के हिसाब से लोगो के बीच तालीम और तरबियत (शिक्षा और प्रशिक्षण) का काम अंजाम दिया। लेकिन आख़री दीन और आख़री नबी (स.अ.) ने उसे उसकी आख़री मंज़िल तक पहुँचा कर हमेशा के लिए उसे ज़िन्दा कर दिया, ताकि इंसान इस दुनिया में रहकर अपनी मन्ज़िल से (यानी आख़ेरत) से क़रीब हो जाये। और वहां तक पहुंच जाये। समाज को आगे बढ़ाने और उसे तरक़्क़ी दिलाने के लिए हर दौर में एक मुसतक़िल तालीम व तरबियत (सतत शिक्षा एंव प्रशिक्षण) का सिस्टम होना बहुत ज़रूरी है और वह भी ऐसा सिसटम जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) जैसा कोई मासूम हो, ताकि ऐसा इंसान समाज में असामान्यताओं को कम करे ताकि इंसानियत उस मंज़िल पर पहुँच जाये, जहाँ से एक सफ़ल और सौभाग्यशाली ज़िन्दगी का आरम्भ होता है। वह ज़माना जिसको हम सब ह़ज़रत इमाम ज़माना (अ.ज) का ज़माना कहते हैं।
दुनिया वालों को ग़दीर का पैग़ाम, वास्तव में एक मिसाली इस्लामी हुक़ूमत का पैग़ाम है। क्योंकि हुक़ूमत का यह क्रम, रसूलुल्लाह (स.अ.) तक बाक़ी रहेगा। इसलिए इसमें पैग़म्बर (स.अ) की अध्यात्मिकता का होना ज़रूरी है। वह इंसान जो पैग़म्बर (स..) के पद पर बैठेगा, उसके लिए ज़रूरी है कि उसमें वह विशेषताएं हों जो ह़ज़रत पैग़म्बर (स.अ.) में थीं। नबूव्वत और विलायत के इतिहास के उस महत्वपूर्ण ह़िस्से में ज़रूरी था कि कोई ऐसा इंसान इस पद को संभाले जो मासूम हो, और उस समय यह विशेषताएं ह़ज़रत अली (अ.स) मे पूरी तरह़ से पाई जाती थी। अगरचे विलायत एक राजनीतिक मुद्दा है, लेकिन ऐसा नहीं है उसका सारा मामला सियासत पर ख़त्म हो जाता है। यह विलायत वास्तव में अल्लाह की विलायत का आईना है। और ह़ज़रत अली (अ.स) को यह विलायत इस लिए मिली है क्यों कि उनके अन्दर, अल्लाह की विलायत का असर उसी तरह़ पाया जाता है जिस तरह़ ह़ज़रत पैग़म्बर (स.अ.) में पाया जाता था। ऐसा कदापि नहीं है कि ह़ज़रत पैग़म्बर (स.अ.) ने ह़ज़रत अली (अ.स) को अपनी इच्छा से अपना जानशीन (उत्तराधिकारी) बना दिया था। अलबत्ता ह़ज़रत अली (अ.स) की शख़्सियत और विशेषताऔं को देख कर कोई भी इंसान अपनी इच्छा से भी वही करता जो ह़ज़रत पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) ने किया था। लेकिन ह़ज़रत पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) ने यह काम केवल अल्लाह के आदेश से किया था। इस बात को ख़ुद हमारे सुन्नी भाइयों ने भी बयान किया है। किसी ने आकर ह़ज़रत पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) से कहा कि हम सब इतने लोग इकठ्ठा आपके दीन को मानने के लिए तैयार हैं, लेकिन हमारी एक शर्त है कि आप अपने बाद यह काम हमारे ह़वाले करदें। हमारे क़बीले का मुखिया आपका जानशीन बनेगा। ह़ज़रत पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) ने जवाब दियाः इसका फ़ैसला अल्लाह के हाथ में है। मैं उसके बारे में कोई फ़ैसला नहीं कर सकता, अल्लाह तआला जिसको चाहे मेरा जानशीन बना सकता है।
सह़ी मानों में विलायत संम्बन्ध और तअल्लुक़ात बढ़ाने का माध्यम है। जो कोई भी इस कुर्सी को संभालता है वह दुनिया के बादशाहों और राजाऔं कि तरह़ केवल एक बादशाह और राजा नहीं होता, बल्कि वह लोगों का सरपरस्त और गार्जियन होता है। लोगों के क़रीब और उनके साथ होता है और जनता के दिल का सुकून होता है। और यह बात ह़ज़रत अली (अ.स) और उनके बाद दूसरे मासूम इमामों में पूरी तरह़ पाई जाती थी। और इमाम (अ.स) की ग़ैबत के ज़माने में भी अगर यह बातें कहीं देखी जा सकती हैं चाहे कितनी ही कम क्यों न हों, तो केवल विलायत ही में उसको देखा जा सकता है।
अगर पैग़म्बर (स.अ.) को मान के मुसलमान पैग़म्बर (स.अ.) के चयन को सह़ी तरीक़े से मान लेते और ह़ज़रत अली (अ.स) को पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) का जानशीन मान लेते, तो पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) की शिक्षाएं और उनका प्रशीक्षण उनके बाद बाक़ी रहता और ह़ज़रत अली (अ.स) के बाद दूसरे मासूम इमाम भी पैग़म्बर (स.अ.) की तरह़ लोगों को इलाही तालीम व तरबियत का पाठ पढ़ाते, तो तरक़्क़ी और कामयाबी की वह मन्ज़िल, जहाँ अभी तक इंसानियत नहीं पहुंच पाई है, वह बहुत जल्दी पहुँच जाते। इतिहास में अकसर बड़ी बड़ी ग़लतियों ने बड़े बड़े नुक़सान पहुंचाये हैं।
ग़दीर, तरक़्क़ी और कामयाबी का एक पैग़ाम है। ग़दीर का वास्तविक संदेश यह था कि वह समाज जिसमें मुसलमान रहना चाहते हैं, तो उसमें इस्लाम के नियमों को लागू होना चाहिए। बहुत से वह समाज जिनमें विलायत पर विश्वास नहीं पाया जाता है, वह उसकी सज़ा भी भुगत रहे हैं।

ग़दीर मुसलमानों के बीच एकता का आधार
यह क़िस्सा इतिहास का एक सच्चा क़िस्सा है। और ऐसा कदापि नहीं है कि ग़दीर की दासतान को केवल शिया समुदाय ने बयान किया हो।
बहुत से आलिमों ने भी इसे बयान किया है। और सच तो यह है कि ग़दीर का मुद्दा अपने पैग़ाम के ह़वाले से केवल शियों के लिए नहीं है बल्कि उसका सम्बंध पूरी इस्लामी दुनिया से है। क्योंकि ग़दीर का मतलब, इंसाफ़ व न्याय का शासन, अच्छाइयों का शासन और अल्लाह की विलायत का शासन है।
अल्लामा अमीनी (र.ह) और शहीद मुतह्हरी (र.ह) के अनुसार ग़दीर मुसलमानों के बीच इत्तेह़ाद, एकता और गठबंधन का कारण है। ग़दीर का क़िस्सा, मुसलमानों को एक प्वाइंट पर लाकर जमा कर देता है और वह प्वाइंट ह़ज़रत अली (अ.स) हैं। ह़ज़रत अली (अ.स) की शख़्सियत और बड़ाई के बारे में मुसलमानों के बीच कोई मतभेद नहीं है। सदाचार, परहेज़गारी और बहादुरी के हिसाब से ह़ज़रत अली (अ.स) जिस ऊँचाई पर थे, सारे मुसलमानों ने उन्हें इसी तरह़ देखा है। यानी ह़ज़रत अली (अ.स) को सारे मुसलमान मानते हैं।
अमीरुल मोमेनीन ह़ज़रत अली (अ.स) इस्लामी ह़ाकिम, इस्लामी शासन और हर मुसलमान के लिए एक महान व्यक्तित्व हैं।
अगर हम इस्लामी एकता की बात करते रहेंगे, तो इसका कदापि यह मतलब नहीं है कि इस्लाम को तरक़्क़ी, निजात दिलाने वाला विलायत और ग़दीर के अस्ली और महत्वपूर्ण मुद्दे को भुला दें, ग़दीर शिया समुदाय की पहचान का एक बेहतरीन ज़रिया है।
विलायत, इस्लाम का प्रमुख और महत्वपूर्ण मुद्दा है। शिया समुदाय को विलायत पर गर्व होना चाहिए और उसको पहचानने की कोशिश करना चाहिए। हमारे समाज में कल भी और आज भी अल्लाह की कृपा से हर कोण से विलायत अपना असर दिखाती आई है।
हम सभी मुसलमानों को यह दावत देते हैं, कि वह इस मुद्दे पर सोंचें। मुसलमानों के बीच एकता को बाक़ी रखने के लिए हम यह कभी नहीं कहेंगे कि एक समुदाय दूसरे समुदाय को सह़ी मान ले, हाँ हमारी एक लाजिक प्रार्थना यह है कि सारे मुसलमान कम से कम उन बातों को देखें कि जिन्हें शिया समुदाय के बुज़ुर्ग आलिमों ने लिखा है और हमारे ह़वाले किया है, उन्हें ध्यान से देखें, उससे दूर न रहें। सय्यद शरीफ़ुद्दीन आमुली की किताब को देखें, अल्लामा अमीनी की किताब अल-ग़दीर देखें, उन सब किताबों में सच्चाई लिखी गई है।
शिया समुदाय की लाजिक बहुत मज़बूत है। अपने धर्म की सच्चाई को साबित करने के लिए, शिया विद्धवानों की लाजिक और उनकी बह़स बहुत ही मज़बूत है। लेकिन उसका मतलब यह नहीं है कि शिया समुदाय के मानने वाले दूसरे समुदाय वालों के साथ ग़लत तरीक़े से पेश आंए और बुरा व्यवहार करें और आपस में दुश्मनी बढ़ायें। और इस तरह़ आपस में एक दूसरे के साथ झगड़ा करें। मैं अचछी तरह़ जानता हूँ कि आज बहुत सारा धन केवल इस लिए लुटाया जा रहा है कि ऐसी किताबें लिखी जा रही हैं जिनमें एक दूसरे को गाली दी जा रही है एक दूसरे को बुरा कहा जा रहा है और एक दूसरे को बदनाम किया जा रहा है। दोनों समुदाय एक दूसरे के ख़िलाफ़ लिख रहे हैं। और इस तरह़ की बातों के लिए दोनों को एक ही जगह से पैसा मिल रहा है। क्या इन सब बातों को देख कर, हमें अभी भी सोते रहना चाहिए?


आपका कमेंट



मेरा कमेंट शो न किया जाये
Security Code :