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Date of publication : 19/9/2016 9:25
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ग़दीर हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई की ज़बानी।

इमामत यानी दुनिया की हर हुकूमत और मैनेजमेंट से अच्छा और बेहतर सिस्टम जिसमें इन्सानों को सही रास्ते पर चलाया जाये और सही मंज़िल की तरफ़ ले जाया जाये और उसमें वह बुराइयां न हों जो दुनिया के दूसरे सिस्टम्ज़ और हुकूमतों में पाई पाई जाती है जैसे मनमानी, लालच, अपने फ़ायदे के लिये काम करना और लोगों को बिल्कुल भूल जाना। इस्लाम नें दुनिया के मैनेजमेंट के लिये इमामत की शक्ल में एक सिस्टम पेश किया है जो ख़ुदा से जुड़ा हुआ है।


रसूलल्लाह स. हज़रत अली अ. के बारे में फ़रमाते हैं:

"اَعدَلُکُم فِی الرَّعِیَّۃِ"

वह लोगों के बीच तुम में सबसे ज़्यादा इंसाफ़ करने वाले हैं। यहाँ दोनों तरह की अदालत की तरफ़ इशारा है। एक इमाम अली (अ.) की निजी ज़िन्दगी की अदालत और दूसरी समाजी ज़िन्दगी और लोगों के बीच उनकी अदालत।

यह वह चीज़ें हैं जिन्हे ज़बान से बड़ी आसानी से कहा जा सकता है और उनके बारे में बात की जा सकती है लेकिन उस पर अमल करना और ज़िन्दगी में उसे लागू करना आसान नहीं और इंसान उस समय तक उसको नहीं समझ सकता जब तक उस पर अमल करके न दिखाए। अगर आपको अदालत और इंसाफ़ देखना है तो इमाम अली अ. की ज़िन्दगी में पूरी तरह से नज़र आएगा। आज इमाम अली अ. के ज़माने को गुज़रे कई शताब्दियां बीत चुकी हैं लेकिन आज भी अगर आप अद्ल व इंसाफ़ की परिभाषा करना चाहें और उसके लिये कोई मिसाल देना चाहें तो आपको इमाम अली अ. से अच्छी मिसाल नहीं मिल सकती इसी लिये रसूलुल्लाह (स.अ.) नें अल्लाह तआला के हुक्म से आपकी विलायत और इमामत को लोगों के लिये बयान किया और पहचनवाया और आपको अपने बाद लोगों का वली (अभिभावक) बनाया, यह एक ऐसी सच्चाई है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता। आप सोचें कि आपके सामने रसूलुल्लाह (स.अ.) के बाद मुसलमानों की लीडरशिप के बारे में दो चीजें सामने आती हैं: एक तो यह कि जिसने भी हुकूमत हासिल कर ली और मुसलमानों का शासक बन गया वह रसूल के बाद उनका ख़लीफ़ा है चाहे वह कैसा भी इंसान हो और उसनें जैसे भी हुकूमत हासिल की हो और दूसरे यह कि एक ऐसा इंसान जो नेक और अच्छा है, अल्लाह वाला है, मुसलमानों का हमदर्द है, और ख़ुद रसूल नें अल्लाह के हुक्म से उसे अपने बाद वली बनाया है और यह भी फ़रमाया है मेरे बाद सबसे अच्छा इंसाफ़ करने वाला है, इन दोनों में कितना ज़्यादा अंतर पाया जाता है? इस लिये ग़दीर केवल शियों का नहीं है बल्कि सारे मुसलमानों से उसका रिश्ता है क्योंकि यह रसूल के बाद अद्ल, न्याय, श्रेष्ठता और अल्लाह की विलायत वाली हुकूमत को हमारे सामने बिल्कुल साफ़ करता है। हम हर एक को अपना इमाम नहीं बना सकते, रसूलुल्लाह (स.अ.) की इस हदीस में इशारा हुआ है कि मुसलमानों का इमाम और रसूल के बाद उनका ख़लीफ़ा वह होगा जो सबसे अच्छा इंसाफ़ करने वाला हो हमें देखना होगा कि कौन सबसे अच्छा इंसाफ़ करने वाला है ताकि उसको अपना इमाम बनाएं। अगर हम सचमुच हज़रत अली अ. की इमामत व विलायत को मानने वालें हैं तो हमें भी अपनी ज़िन्दगी में इस उसूल यानी अद्ल व इंसाफ़ से क़रीब होने की कोशिश करना होगी। हम जितना जितना अद्ल व इंसाफ़ के क़रीब होते जाएंगे और अपनी सुसाइटी को उसकी तरफ़ ले जाएंगे उतना ही इमाम अली अ. से भी क़रीब होते जाएंगे।

इमाम अली अ. की पाँच साला हुकूमत

इमामत यानी दुनिया की हर हुकूमत और मैनेजमेंट से अच्छा और बेहतर सिस्टम जिसमें इन्सानों को सही रास्ते पर चलाया जाये और सही मंज़िल की तरफ़ ले जाया जाये और उसमें वह बुराइयां न हों जो दुनिया के दूसरे सिस्टम्ज़ और हुकूमतों में पाई पाई जाती है जैसे मनमानी, लालच, अपने फ़ायदे के लिये काम करना और लोगों को बिल्कुल भूल जाना। इस्लाम नें दुनिया के मैनेजमेंट के लिये इमामत की शक्ल में एक सिस्टम पेश किया है जो ख़ुदा से जुड़ा हुआ है। जिसके क़ानून ख़ुदा की तरफ़ से और लोगों के फ़ायदे में हों। जिसमें हाकिम स्वंय को अहमियत न दे बल्कि लोगों की हिदायत, उनकी आसानी और उनकी ज़िन्दगी की मुश्किलों और कठिनाइयों के ख़त्म करने की कोशिश में लगा रहे। इमाम अ. नें अपनी पाँच साला (बल्कि उससे भी कम) हुकूमत में अपने अमल से साबित कर के दिखाया कि ऐसा मुमकिन है, ऐसा हो सकता है। इमाम अ. की हकूमत का ज़माना पूरी दुनिया के लिये आइडियल है जिसे दुनिया कभी नहीं भुला सकती। वह हर ज़माने में आइडियल बन कर रहेगी। यह है ग़दीर जो लोगों में अद्ल व इंसाफ़ की एक पहचान है।

किताबे अल-ग़दीर

मेरी निगाह में अल्लामा अमीनी (र.ह) की मशहूर किताब अल-ग़दीर भुला दी गई है। मैंने कई बार यह बात कही है कि यह हमारी सौ अहेम किताबों में से एक है जिसमें विभिन्न चीज़ें और विभिन्न विषय हैं बल्कि हज़ारों विषय हैं। कहीं कहीं एक आदमी, एक बात या एक हदीस के बारे में सत्तर अस्सी पेज, इस किताब में मिलते हैं। अगर किसी को इस किताब में कुछ देखना है तो कभी उसे पूरी किताब पढ़ना पढ़ती है। आज के ज़माने में कौन है जो एक चीज़ के लिये ग्यारह जिल्द पढ़ेगा। इस किताब पर काम होना चाहिये और इसके हर विषय को अलग करना चाहिये और अलग अलग कई किताबें बनाना चाहिये। अल्लामा अमीनी नें अल ग़दीर के नाम से जो एक महान क़िला बनाया है वह अपनी जगह सुरक्षित रहे और उसे अलग अलग हिस्सों में भी बांटा जाये ताकि उससे सही तौर से फ़ायदा उठाया जा सके।


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