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Date of publication : 8/7/2016 11:2
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वहाबी कौन हैं और उनकी विचारधाराएं क्या हैं? (2)

मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के विचारों में एक महत्वपूर्ण विचार यह था कि वर्तमान समय के मुसलमानों का अक़ीदा शुद्ध तौहीद पर आधारित नहीं है, बल्कि उनके अक़ीदों में शिर्क की मिलावट है इसलिए उसने मुसलमानों को शुद्ध तौहीद की तरफ़ बुलाया और शिर्क व अंधविश्वासों से दूरी की दावत दी।



मोहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के विचार
शेख़ मोहम्मद अब्दुल वह्हाब के विचारों को सारांश में यूं बयान किया जा सकता है।
 1. शिर्क के साथ लड़ाई, प्योर तौहीद और शुरू के सच्चे मुसलमानों के इस्लाम की ओर वापसी।
मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के विचारों में एक महत्वपूर्ण विचार यह था कि वर्तमान समय के मुसलमानों का अक़ीदा शुद्ध तौहीद पर आधारित नहीं है, बल्कि उनके अक़ीदों में शिर्क की मिलावट है इसलिए उसने मुसलमानों को शुद्ध तौहीद की तरफ़ बुलाया और शिर्क व अंधविश्वासों से दूरी की दावत दी। उसने अल-तौहीद नामक किताब में जो 1153 हिजरी में लिखी गई है, लिखा है: “मैं तुम्हें तौहीद और एक ख़ुदा की इबादत की दावत देता हूं और चाहता हूं कि शिर्क को पूरी तरह से दूर फेंक दिया जाए।
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तौहीद के सिलसिले में उसके इस दृष्टिकोण की वजह यह थी कि उसका मानना था कि आज के मुसलमान, रसूले इस्लाम स.अ के ज़माने के नेक और सच्चे मुसलमानों के अक़ीदे से भटक गए हैं उनके तौहीद के अक़ीदे में शिर्क की मिलावट हो गई है और अपनी ज़िंदगी और प्रोग्रामों में जेहालत और नादानी की वजह से शिर्क करते हैं, इसलिए उसने लोगों को शुद्ध तौहीद और एक अल्लाह की इबादत की ओर दावत देने को अपनी ज़िम्मेदारी समझा। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब और उसके समर्थक बजाए इसके कि मुसलमानों के बीच तौहीद के संबंध में उत्पन्न होने वाली समस्याओं और अंधविश्वासों के कारणों को खोजें और उन कारकों व कारणों को समाज से खत्म करें और बजाए इसके कि दूसरे इस्लामी उलमा और दूसरे मज़हबों के पढ़े लिखे लोगों से बैठकर इस बारे में बातचीत करें और उलमा के साथ मिल कर इस्लामी समाज की मुश्किलों को हल करें, उन्होंने अपनी सोच के अनुसार दूसरे समुदायों के अक़ीदों और ख़ास कर अहलेबैत (अ) के मानने वालों के अक़ीदों को अपने हमलों का निशाना बनाया और उनके सिलसिले में काफ़िर और मुशरिक जैसे शब्दों को बड़ी आसानी से इस्तेमाल कर उनकी मज़हबी निशानियों का अपमान करना शुरू कर दिया। इससे बदतर यह कि इब्ने अब्दुल वह्हाब और उनके समर्थकों ने अक्सर मुसलमानों पर मुशरिक और कॉफ़िर होने का लेबिल लगा दिया यहाँ तक कि उनके क़त्ल को वाजिब कह दिया और मुशरिक व काफिर (अपने अलावा दूसरे मुसलमानों) के साथ जंग को अल्लाह की राह में जेहाद का नाम देने लगे।
उनका यह दृष्टिकोण इस बात का कारण बना कि सभी इस्लामी देशों के भीतर गृहयुद्ध शुरू हो गया। हंबली मज़हब के अलावा जिसके वह खुद मानने वाले थे सभी मुसलमानों के साथ जंग को जिहाद का नाम दे दिया! मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब और उनके मानने वालों ने और ला इलाहा इल्लल्लाह की इस तरह व्याख्या करना शुरू की कि उनके अलावा कोई दूसरा मोवह्हिद (अल्लाह को एक मानने वाला) हो ही नहीं सकता था। उन्होंने तौहीद की व्याख्या के साथ सभी क़ब्रों यहां तक ​रसूले इस्लाम की पाक क़ब्र की ज़ियारत करना, बुजुर्गों की कब्रों पर गुंबद बनवाना, कब्र पर फ़ातेहा पढ़ना और चेराग़ जलाना, पैग़म्बरे इस्लाम स.अ की ज़रीह को चूमना, सहाबा और रसूले इस्लाम स.अ की ऑल की क़ब्रों की ज़ियारत और उनके पास नमाज़ अदा करना, उनसे तवस्सुल करना, लौ लगाना और शिफ़ाअत की दुआ करना आदि सारी चीज़ों को शिर्क और कुफ्र के प्रमाणकों में से बता दिया। मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब ने अपनी किताब कशफ़ुश शुभहात में अपने टोले के अलावा सभी मुसलमानों को मुशरिक, कॉफ़िर, बुत परस्त, मुर्तद, मुनाफ़िक़ व कपटी, तौहीद का दुश्मन, अल्लाह का दुश्मन, जाहिल और शैतान जैसी संज्ञा दी और इस बहाने से सभी मुसलमानों का ख़ून बहाना और उनके रूपये पैसे व धन सम्पति को क़ब्ज़े में ले लेने को उचित ठहराया।
अगर मुसलमान मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब की व्याख्या के अनुसार तौहीद की दावत को स्वीकार तो इस्लाम के दायरे में प्रवेश कर सकते और उन्हें अमान मिल सकती हैं वरना उन्हें दुनिया में जीने का कोई अधिकार नहीं है! मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब का विश्वास यह था कि मुसलमान होना और अपनी जान व माल की सुरक्षा करना केवल शहादतैन (ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर् रसूलुल्लाह) पढ़ने से संभव नहीं है, बल्कि उन सभी बातों को छोड़ना होगा जो क़ुरआन और सुन्नत के खिलाफ़ है और सलफ़े सालेह (सहाबा, ताबेईन व ताबेअ ताबेईन) की बातें के अनुसार अमल करना होगा वरना वह काफ़िर व मुशरिक है और उसकी जान व माल हलाल है (यानी उसको क़त्ल करना जाएज़ है) अगरचे शहादतैन पढ़ता हो।
जबकि दूसरी ओर इस्लामी दुनिया के बहुत से मशहूर व महान उल्मा व विद्धानों ने मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के माध्यम से बयान हुए इस्लामी और क़ुरआनी विश्वासों की व्याख्या पूरी तरह से इस्लामी, क़ुरआनी और नबी की सुन्नत के स्पष्ट सिद्धांतों के खिलाफ़ जाना और उसका सख़्ती से विरोध किया। मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के विचारों के पहले विरोधी ख़ुद उनके भाई सुलैमान बिन अब्दुल वह्हाब हैं, जिन्होंने स्पष्ट रूप से कहा: “आज लोग ऐसे आदमी के पीछे जा रहे हैं जो खुद को क़ुरआन और सुन्नत से सम्बंधित बतलाता है और उन से नए नए इल्म को बाहर निकालता है और अगर कोई इसका विरोध करे तो वह बिना हिचक के अपने विरोधियों को काफ़िर कह देता है हालांकि खुद उसमें इज्तेहाद की कोई एक निशानी भी नजर नहीं आती, ख़ुदा की क़सम यहां तक ​​इज्तेहाद के निशानियों का दसवाँ हिस्सा भी उसमें दिखाई नहीं देता फिर भी उसकी बातें बहुत सारे नादान लोगों को प्रभावित कर गई हैं ऐसी हालत में यही कहना होगा इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन”।
दूसरी जगह कहते हैः “वह मुद्दे जिन्हें वहाबी शिर्क और कुफ्र का कारण मानते हैं और उन्हें बहाना बनाकर मुसलमानों की जान व माल को मुबाह व अनुमेय समझते हैं वह इमामों के दौर में भी पाये जाते थे लेकिन किसी भी इमाम से न सुना गया और न किसी से नक़्ल हुआ कि उन कामों को अंजाम देने वाले काफ़िर या मुर्तद हैं और उनके खिलाफ़ जिहाद का आदेश दिया जाए या बेलादुल मुसलेमीन को जैसा कि वह कहते हैं बेलादे शिर्क व कुफ़्र का नाम दे दिया जाए। शेख सुलैमान अपनी दूसरी किताब फ़सलुल ख़ेताब फ़िर् रद्दे अला मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब में अपने भाई के विचारों और दृष्टिकोणों का सख़्ती से खंडन करते हैं। कहा जाता है कि एक दिन शेख सुलैमान ने अपने भाई मोहम्मद से पूछा इस्लाम के स्तम्भ कितने हैं? उन्होंने जवाब दिया: पांच हैं, सुलैमान ने कहा: लेकिन तुमने उन्हें छः कर दिया है! चूंकि तुम कहते हो जो तुम्हारा अनुसरण न करे और तुम्हारी विचारधाराओं और विचारों को न माने, वह काफ़िर है। बारहवीं शताब्दी हिजरी के बाद से अब तक इस्लामी शिया सुन्नी उल्मा व विद्वानों ने शेख मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के विचारों और दृष्टिकोणों की प्रतिक्रिया में दसियों किताबें लिखी हैं जिनका अध्ययन किया जा सकता है। जारी..................(आगे की बातें अगले हिस्से में पढ़ें)


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