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Date of publication : 6/10/2016 8:59
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इमाम हुसैन अ. की शहादत का मक़सद

इमाम हुसैन अ. का टार्गेट यह था कि बनी उमय्या की निंदनीय और इस्लाम दुश्मन साज़िश को बेनक़ाब किया जाए और इसका वास्तविक चेहरा लोगों के सामने लाया जाए मुसलमानों की सोच को जगाया जाए और उन्हें जाहेलियत (रसूले स्लाम स. के नबी बनने से पहले का युग) के ज़माने, कुफ़्र और मूर्ति पूजा के प्रचारकों से अवगत कराया जाए और आपका यह मक़सद और लक्ष्य अच्छी तरह हासिल हुआ



विलायत पोर्टलः यह सही है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार सहाबी शहीद हो गए लेकिन उन्होंने शहादत से अपना पवित्र लक्ष्य और मक़सद हासिल कर लिया।
उनका टार्गेट यह था कि बनी उमय्या की निंदनीय और इस्लाम दुश्मन साज़िश को बेनक़ाब किया जाए और इसका वास्तविक चेहरा लोगों के सामने लाया जाए मुसलमानों की सोच को जगाया जाए और उन्हें जाहेलियत (रसूले स्लाम स. के नबी बनने से पहले का युग) के ज़माने, कुफ़्र और मूर्ति पूजा के प्रचारकों से अवगत कराया जाए और आपका यह मक़सद और लक्ष्य अच्छी तरह हासिल हुआ।
विभिन्न तरह की घटनाओं के साथ समय, बहुत तेज़ी से गुज़रता रहता है। समय के दामन में घटने वाली इन्ही घटनाओं में कुछ घटनाएं ऐसी भी होती हैं जो समय बीतने के बावजूद मिटती नहीं बल्कि इतिहास में अमर हो जाती हैं। यह घटनाएं इतिहास के पन्नों पर सदा चमकती रहती हैं। यह महान घटनाएं, विचारों और नज़रियों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। सन ६१ हिजरी क़मरी में इतिहास में एक ऐसी ही महान घटना घटी जो शताब्दियां ग़ुज़र जाने के बावजूद अब भी बहुत से समाजी और सियासी तब्दीलियों के लिए आदर्श व नमूना बनी हुई है। हम कर्बला में घटने वाली उस महान घटना को यहाँ बयान कर रहे हैं जो भौगोलिक सीमाओं तथा समय और स्थान के बंधनों से निकलते हुए आज भी सभी ज़मानों के लिए आदर्श बनी हुई है।
मुहर्रम में हम कर्बला की महान घटना की याद दिलाते हुए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर सलाम भेजते हैं। अल्लाह तआला का सलाम हो उस महान इमाम पर जो, सम्मान और महानता की चोटी पर चमकता रहा और जिसने इंसानियत को अमर सबक़ सिखाया। सलाम हो इमाम हुसैन और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ऐसे हालात में अपना पाक व पाकीज़ा मूव्वमेंट शुरू किया कि जब इस्लाम की बेसिक शिक्षाओं के लिए गंभीर ख़तरे पैदा हो गए थे और उसके मिट जाने का ख़तरा था।  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम देख रहे थे कि पैग़म्बरे इस्लाम स. की बताई हुई बातों और शिक्षाओं को धीरे-धीरे भुलाया जा रहा है और बनी उमय्या के शासक माल, ज़ोर व ताक़त तथा अत्याचार के सहारे लोगों पर हुकूमत कर रहे थे।  इस बात के मद्देनज़र कि इस्लाम में रहबरी व नेतृत्व की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों में से एक, लोगों का स्पष्ट रास्ते की ओर मार्गदर्शन करना है, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने युग में मौजूद बुराइयों और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ खड़े होने का इरादा किया।  यही कारण है कि उन्होंने कहा था कि हे लोगो! जान लो कि बनी उमय्या हमेशा शैतान के साथ हैं।  उन्होंने अल्लाह तआला के हुक्मों को छोड़ दिया है और वह भ्रष्टाचार को आम कर रहे है।  वह अल्लाह के बनाए हुए नियमों को भुला बैठे हैं तथा बैतुल-माल (जनकोष) को उन्होंने अपने से विशेष कर लिया है अर्थात उसका ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं।  बनी उमय्या ने अल्लाह तआला की हलाल चीज़ों को हराम और हराम चीज़ों को हलाल कर दिया है।  इमाम हुसैन अ. के इस कथन से यह बात समझ में आती है कि उनके मूव्वमेंट का सेंट्रल प्वाइंट, समाज में दीनी अक़दार (धार्मिक मूल्यों) को दोबारा ज़िंदा करके उनको लागू करना था।  उस दौर के घुटन भरे वातावरण के ख़िलाफ़ अपने मूव्वमेंट के संदर्भ में इमाम हुसैन अ. फ़रमाते हैं कि ऐ अल्लाह! तू ख़ुद जानता है कि मैं जो कुछ करने जा रहा हूं वह हुकूमत हासिल करने के लिए नहीं है। यह दुनियावी मोहमाया के लिए भी नहीं है बल्कि इसलिए है कि तेरे दीन को उसका सही स्थान दिया जाए और तेरी ज़मीन में सुधार किया जाए तथा तेरे मज़लूम व पीड़ित बंदों और दासों को अत्याचारों से मजात दिलाऊं ताकि तेरे दीन पर उचित ढंग से अमल किया जाए।  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का यह कथन, उस दौर के इस्लामी समाज में आध्यात्मिकता के मिट जाने की निशानी है।  दूसरी ओर हुकूमत का सुख भोग रहे लोगों की ओर से माल जमा करने का अमल, समाज में भ्रष्टाचार और ग़लत रस्मों को फैलाना, पैग़म्बरे इस्लाम स. की बातों को भुलाने और उनके पाक व पाकीज़ा अहलेबैत (परिवार) को अलग-थलग करने जैसी बातें वह कारण थे जिन्होंने समाज को जाहिलीयत के युग की तरफ़ वापस ले जाने का रास्ता तय्यार कर दिया था।  बनी उमय्या के शासनकाल के दौरान जातिवाद और ख़ुद को श्रेष्ठ समझने की भावना को दोबारा ज़िंदा किया जाने लगा था।  इन बातों के पैग़म्बरे इस्लाम स. कड़े विरोधी थे।  समय बीतने के साथ ही साथ पैग़म्बरे इस्लाम स. के समय की परंपराएं और रस्में भुलाई जाने लगी थीं।  इस तरह इस्लामी समाज बहुत तेज़ी से दीन की सही शिक्षाओं से दूर होता जा रहा था।उनके उन वफ़ादार साथियों पर जिन्होंने इस्लाम की रक्षा के लिए बिना किसी संकोच के अपनी जानें निछावर कर दीं।


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