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Date of publication : 9/10/2016 17:47
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आशूरा के कुछ महत्वपूर्ण प्वाइंट (1)

ख़ुदाई रंग और इलाही नियत को इमाम हुसैन अ. के आंदोलन में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। इमाम अ. ने सिर्फ़ व सिर्फ़ अल्लाह के लिये और तबाह हो चुके दीन को दोबारा ज़िंदा करने के लिये आंदोलन किया और कदापि कोई दुनियावी कारण या हुकूमत व पोस्ट की लालच उसमें शामिल नहीं थी, कर्बला का चप्पा चप्पा इस दावे का गवाह है। इसलिए इमाम अ. ने अपने इस आंदोलन में हमेशा अपनी इलाही ज़िम्मेदारी पर ध्यान दिया और नतीजा अल्लाह पर छोड़ दिया। इस सच्चाई को हर जगह आपके बयानों, खुत्बों और अमली व्यवहार में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।




1. इलाही नियत और पाक मक़सद

ख़ुदाई रंग और इलाही नियत को इमाम हुसैन अ. के आंदोलन में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। इमाम अ. ने सिर्फ़ व सिर्फ़ अल्लाह के लिये और तबाह हो चुके दीन को दोबारा ज़िंदा करने के लिये आंदोलन किया और कदापि कोई दुनियावी कारण या हुकूमत व पोस्ट की लालच उसमें शामिल नहीं थी, कर्बला का चप्पा चप्पा इस दावे का गवाह है। इसलिए इमाम अ. ने अपने इस आंदोलन में हमेशा अपनी इलाही ज़िम्मेदारी पर ध्यान दिया और नतीजा अल्लाह पर छोड़ दिया। इस सच्चाई को हर जगह आपके बयानों, खुत्बों और अमली व्यवहार में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
2. दिखावे के मुसलमानों के हाथों अल्लाह के वली का क़त्ल
कर्बला की घटना की दूसरी ख़ास बात यह है कि इस घटना में न केवल यह कि मोमिन व हक़ परस्त बल्कि मासूम इमाम, असहाबे किसा का पांचवा सदस्य, रसूले इस्लाम की बेटी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा स.अ का चहेता बेटा उन लोगों के हाथों जो अपने को पैग़म्बर की उम्मत में से जानते थे, भयानक व बर्बर तरीक़े से शहीद कर दिया गया। दिन के उजाले में इमाम हुसैन को उस आध्यात्मिक व्यक्तित्व और परिवार व वंश की महानता के बावजूद। अगरचे किसी भी इंसान व मोमिन की हत्या एक बड़ा अपराध है लेकिन निश्चित रूप से किसी ऐसे इंसान को जो अल्लाह का दूत, ज़माने का इमाम हो और जिसने ज़ुल्म व अत्याचार के विरूद्ध आंदोलन कियो हो, शहीद करना वह भी उस बर्बर व दर्दनाक तरीक़े से ऐसा बड़ा गुनाह है कि जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। शिया व सुन्नी किताबों में ऐसी रिवायतें मौजूद हैं जिनमें आपकी शहादत के बाद ज़मीन व आसमान में परिवर्तन, आसमान वालों और फ़रिश्तों के आंसू बहाने का उल्लेख है, इस सच्चाई का मुंह बोलता सबूत हैं। (1)
इससे बड़ी अफ़सोस की बात यह है कि वह लोग जो मुसलमान होने का दावा करते थे, ज़ाहिर में नमाज़ भी पढ़ते थे, क़ुरआन की तिलावत भी करते थे अपने पैग़म्बर के जिगर के टुकड़े से मुक़ाबले के लिये उठ खड़े हुए (बिहारूल अनवार) और पूरी बेरहमी व निर्दयता के साथ तक़वा व ईमान के आदर्श को शहीद कर दिया और उनके परिवार का अपमान किया और उनका माल व सामान लूट लिया।
3. इमाम के साथी व असहाब
अगरचे कर्बला में शहीद होने वाले इमाम के असहाब व साथियों की संख्या बहुत कम थी लेकिन उनकी ज़िंदगी उनकी बातचीत और उनके व्यवहार से पता चलता है कि सबके सब मोमिन, वफ़ादार व निस्वार्थ लोग थे और इसका सबसे बड़ा सुबूत दसवीं मुहर्रम की रात इमाम का अपने साथियों की प्रशंसा में यह कहना कि
 (فَإِنِّی لا أَعْلَمُ أَصْحاباً أَوْلَى وَ لا خَیْراً مِنْ أَصْحابِی، وَ لاَ أَهْلَ بَیْت أَبَرَّ وَ لاَ أَوْصَلَ مِنْ أَهْلِ بَیْتِی)
मेरे साथियों से बेहतर किसी के साथी नहीं और मेरे परिवार वालों से नेक और ज़िम्मेदार किसी का परिवार नहीं है। (2)
4. ज़िल्लत व अपमान क़बूल न करना।
इमाम हुसैन अ. और उनके असहाब वैसे तो बहुत सी विशेषताओं के मालिक थे लेकिन एक बहुत महत्वपूर्ण विशेषता जो उनमें पाई जाती थी ज़िल्लत व अपमान को स्वीकार न करना और निडर होकर बहादुरी से ज़ुल्म से टकराना था। दुश्मन ने जितनी भी कोशिश की कि उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करे या एक भी शब्द यज़ीद की ख़िलाफ़त की पुष्टि में उनकी ज़बान से जारी हो जाये लेकिन कामयाब नहीं हुआ और उनके मुंह से कमज़ोरी व पछतावे पर आधारित एक भी शब्द के सुनने की हसरत दुश्मन के दिल में ही घुट कर रह गई। (هَیْهاتَ مِنَّا الذِّلَّةَ ,हम अपमान स्वीकार कर लें यह सम्भव ही नहीं, (3) का नारा और (وَاللهِ لاَ أُعْطِیکُمْ بِیَدِی إِعْطاءَ الذَّلِیلِ، وَ لاَ أَفِرُّ فَرارَ الْعَبیدِ / अल्लाह की क़सम न मैं ज़िल्लत स्वीकार करूंगा और न ही ग़ुलामों की तरह फ़रार करूंगा।,) हमेशा हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गया। इब्ने अबिल हदीद मोतज़ेली ने अपनी किताब में नहजुल बलाग़ा के 51वें ख़ुत्बे की व्याख्या में ज़ुल्म स्वीकार न करने वालों का इतिहास (أُباةُ الضَّیْمِ وَ أَخْبارُهُمْ) के शीर्षक से एक चर्चा की जिसमें कुछ ऐसी हस्तियों का नाम बयान किया है जिन्होंने इसालमी इतिहास में ज़ुल्म व अत्याचार को क़बूल नहीं किया। इस चर्चा की शुरूआत में उन्होंने लिखा है
 (سَیِّدُ أَهْلِ الاِْباءِ الَّذی عَلَّمَ النّاسَ الْحَمِیَّةَ وَ الْمَوْتَ تَحْتَ ظِلالِ السُّیُوفِ، إِخْتِیاراً لَهُ عَلَى الدَّنِیَّةِ، أَبُوعَبْدِاللهِ الْحُسَیْنُ بْنُ عَلِىِّ بْنِ أَبِی طالِب عَلَیْهِمَا السَّلامُ)
दुनिया के ऐसे लोग जिन्होंने ज़ुल्म कबूल नहीं किया और तलवारों की छाया में मौत को ज़िल्लत व अपमान पर प्राथमिकता दी सबके सरदार व लीडर का नाम हुसैन इब्ने अली अ. है जिन्हें और जिनके असहाब को अमान दी गई लेकिन उन्होंने ज़िल्लत के आगे सर नहीं झुकाया और मौत को स्वीकार कर लिया।(4) न केवल इमाम हुसैन अ. बल्कि उनके सारे साथी जो 10वीं मुहर्रम सन 61 हिजरी में कर्बला के मैदान में शहीद किये गए, आत्मसम्मान और हिम्मत व बहादुरी के शीर्ष पर थे।
शिम्र के अमान नामे का हज़रत अबुल फ़ज़लिल अब्बास द्वारा रद्द किया जाना इस सच्चाई की एक मिसाल है। दुश्मनों ने उनके जिस्मों के टुकड़े टुकड़े कर दिये लेकिन उनकी इज़्ज़त, सम्मान और महानता को कम नहीं कर सके। एक अरब शाएर ने कहा हैः
तलवारों और भालों ने उनके बदन के टुकड़े टुकड़े कर दिये *** लेकिन उनकी बड़ाई और महानता में को कम नहीं कर सके।
 قَدْ غَیَّرَ الطَّعْنُ مِنْهُمْ کُلَّ جارِحَة *** إِلاَّ الْمَکارِمَ فِی أَمْن مِنَ الْغِیَرِ (1)

(1) बिहारूल अनवार जिल्द 45 पेज 201-219 / सियरे आलामुन नुबला जिल्द 4 पेज 425-428
(2) तारीख़े तबरी जिल्द 4 पेज 317/ बेहारुल अनवार जिल्द 44 पेज 392
(3) एहतेजाजे तबरसी जिल्द 2 पेज 99)
(4) अल-इरशाद पेज 450
(5) शरहे नहजुल बलाग़ा, इब्ने अबिल हदीद जिल्द 3 पेज 249


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