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Date of publication : 7/11/2014 0:21
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कर्बला के संदेश

कर्बला की घटना और हज़रत इमाम हुसैन अ. की हदीसों (कथनों) पर निगाह डालने से, आशूरा के जो संदेश हमारे सामने आते हैं उनको हम इस तरह बयान कर सकते हैं


कर्बला की घटना और हज़रत इमाम हुसैन अ. की हदीसों (कथनों) पर निगाह डालने से, आशूरा के जो संदेश हमारे सामने आते हैं उनको हम इस तरह बयान कर सकते हैं
1. पैग़म्बर स.अ. की सुन्नत को ज़िन्दा करना:
बनी उमय्या कोशिश कर रहे थे कि पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. की सुन्नत को मिटाकर जाहेलीयत के युग (पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. की नुबूव्वत के ऐलान से पहले का समय) के सिस्टम को लागू किया जाए। यह बात हज़रत इमाम हुसैन अ. के इस कथन से समझ में आती है कि, मैं आनंद व सुख की ज़िन्दगी बिताने या उपद्रव (फ़साद) बलवा करने के लिये नहीं जा रहा हूँ बल्कि मेरा मक़सद इस्लामी राष्ट्र को सुधारना और अपने नाना पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. और अपने बाबा अली इब्ने अबी तालिब अ. की सुन्नत पर चलना है।
2. बातिल (ग़लत व असत्य) के चेहरे पर पड़ी हुई नक़ाब को उलटना:
बनी उमय्या अपने दिखावटी इस्लाम द्वारा लोगों को धोखा दे रहे थे। कर्बला की घटना नें उनके चेहरे पर पड़ी इस्लामी नक़ाब को पलट दिया, ताकि लोग उनके असली रूप को पहचान सकें। साथ ही साथ इस घटना नें इंसानों और ख़ास कर मुसलमानों को यह पाठ भी दिया कि इंसान को हमेशा होशियार व सावधान रहना चाहिये और दीन का मुखौटा पहने धोखेबाज़ लोगों से धोखा नहीं खाना चाहिये।
3. अम्र बिल मारूफ़ (अच्छाई की तरफ़ बुलाना) को ज़िन्दा रखना:
हज़रत इमाम हुसैन अ. के एक कथन से मालूम होता है कि आपके इस आंदोलन का मक़सद अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुनकर (अच्छाईयों की दावत देना और बुराईयों से रोकना) था। आपने एक स्थान पर बयान किया कि मेरा मक़सद अम्र बिल मारूफ़ व नही अनिल मुनकर है। एक दूसरे स्थान पर बयान किया कि: ऐ अल्लाह! मैं अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुनकर को बहुत पसंद करता हूँ।
4. वास्तविक और दिखावटी मुसलमानों के अंतर को सामने लाना:
परिक्षण व टेस्ट के बिना सच्चे मुसलमानों, दीनदारों व ईमान के झूठे दावेदारों को पहचानना मुश्किल है। और जब तक इन सबको न पहचान लिया जाए, उस समय तक इस्लामी समाज अपनी वास्तविकता का पता नहीं लगा सकता। कर्बला एक ऐसी प्रयोगशाला थी जहाँ पर मुसलमानों के ईमान, दीनी पाबंदी व सच्चाई का साथ देने वालों के दावों को परखा जा रहा था। इमाम अ. नें ख़ुद फ़रमाया कि लोग दुनिया परस्त हैं जब आज़माया जाता है तो दीनदार कम निकलते हैं।
5. इज़्ज़त व सम्मान की रक्षा करना:
हज़रत इमाम हुसैन अ. का सम्बंध उस परिवार से है, जो इज़्ज़त व आज़ादी का प्रतीक है। इमाम अ. के सामने दो रास्ते थे, एक ज़िल्लत व अपमान के साथ ज़िन्दा रहना और दूसरा इज़्ज़त व सम्मान के साथ मौत को स्वीकार कर लेना। इमाम अ. नें ज़िल्लत को पसंद नहीं किया और इज़्ज़त की मौत को क़ुबूल कर लिया। आपने फ़रमाया कि: इब्ने ज़ियाद नें मुझे तलवार और ज़िल्लत की ज़िन्दगी के बीच ला खड़ा किया है, लेकिन मैं ज़िल्लत को क़ुबूल करने वाला नहीं हूँ।
6. ताग़ूती (शैतानी) ताक़तों से जंग:
इमाम हुसैन अ. का आंदोलन ताग़ूती ताक़तों के ख़िलाफ़ था। उस ज़माने का ताग़ूत यज़ीद बिन मुआविया था। क्योंकि इमाम अ. नें इस जंग में पैग़म्बरे इस्लाम स. के कथन को सुबूत के तौर पर पेश किया है कि कोई ऐसे ज़ालिम शासक को देखे जो अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों को हलाल और उसकी हलाल की हुई चीज़ों को हराम कर रहा हो, तो उस पर ज़रूरी है कि उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए और अगर वह ऐसा न करे तो उसे अल्लाह की तरफ़ से सज़ा दी जाएगी।
7. दीन पर हर चीज़ को क़ुर्बान कर देना चाहिये:
दीन की अहमियत इतनी ज़्यादा है कि उसे बचाने के लिये हर चीज़ को क़ुर्बान किया जा सकता है। यहाँ तक कि अपने साथियों, भाइयों और संतानों को भी क़ुर्बान किया जा सकता है। इसी लिये इमाम अ. नें शहादत को क़ुबूल किया। इससे मालूम होता है कि दीन की अहमियत बहुत ज़्यादा है और समय पड़ने पर उसको बचाने के लिये सब चीज़ों को क़ुर्बान कर देना चाहिये।
8. शहादत की भावना को ज़िंदा रखना:
जिस चीज़ पर दीन के बाक़ी रहने, ताक़त, शक्ति व अज़मत एंव महानता का दारोमदार है वह जेहाद और शहादत की भावना है। हज़रत इमाम हुसैन अ. नें दुनिया को यह बताने के लिये कि दीन केवल नमाज़ रोज़े का ही नाम नहीं है बल्कि अगर आवश्यकता हो तो यहां ख़ून भी देना पड़ता है, ताकि पब्लिक में शहादत की भावना ज़िंदा हो और आनंद व सुख की ज़िंदगी का अंत हो। इमाम हुसैन अ. नें अपनी एक स्पीच (ख़ुत्बे) में फ़रमाया कि: मैं मौत को सौभाग्य समझता हूँ। आपका यह कथन दीन के लिए शहीद हो जाने को बयान कर रहा है।
9. अपने लक्ष्य पर आख़री सांस तक बाक़ी रहना:
जो चीज़ अक़ीदे और विश्वास की मज़बूती को ज़ाहिर करती है, वह है अपने लक्ष्य पर आख़िरी सांस तक बाक़ी रहना। इमाम अ. नें आशूरा के पूरे आंदोलन में यही किया, कि अपनी आख़िरी साँस तक अपने लक्ष्य व मक़सद पर बाक़ी रहे और दुश्मन के सामने नमस्तक नहीं हुए। इमाम अ. नें इस्लामी राष्ट्र को एक बेहतरीन पाठ यह दिया कि मुसलमानों की सीमाओं का उलंघ्घन करने वालों के सामने कदापि नहीं झुकना चाहिये।
10. जब सच्चाई के लिये संघर्ष करो तो हर वर्ग से मदद हासिल करो
कर्बला से, हमें यह सबक़ मिलता है कि अगर समाज में सुधार करना या इंक़ेलाब दृष्टिगत हो तो समाज में मौजूद हर वर्ग से मदद हासिल करनी चाहिये। ताकि कामयाबी हासिल हो सके और लक्ष्य तक पहुंतचा जा सके। इमाम अ. के साथियों में जवान, बूढ़े, काले, गोरे, ग़ुलाम, आज़ाद सभी तरह के लोग मौजूद थे।
11. साथियों की कमी से घबराना नहीं चाहिये:
कर्बला, अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली अ. के इस कथन को पूरा करती है कि सच्चाई व मार्गदर्शन के रास्ते में लोगों की संख्या की कमी से नहीं घबराना चाहिये। जो लोग अपने लक्ष्य पर ईमान व विश्वास रखते हैं उनके पीछे बहुत बड़ी ताक़त होती है। ऐसे लोगों को अपने साथियों की संख्या की कमी से नहीं घबराना चाहिये और ना ही लक्ष्य से पीछे हटना चाहिये। इमाम हुसैन अ. अगर अकेले भी रह जाते तब भी हक़ व सच्चाई का बचाव करते रहते और इसका सबूत आपका वह कथन है जो आपने शबे आशूर (9 मुहर्रम की रात) अपने साथियों को सम्बोधित करते हुए फ़रमाया कि आप सब जहां चाहें चले जाएं यह लोग केवल मेरे ख़ून के प्यासे हैं.......
12. त्याग व बलिदान के साथ साथ समाज....
 कर्बला, केवल जेहाद व बहादुरी का मैदान नहीं है बल्कि समाजी ट्रेनिंग व उपदेश व नसीहत का सेंटर भी है। कर्बला के इतिहास में इमाम हुसैन अ. का यह संदेश निहित है। इमाम अ. नें बहादुरी, त्याग व बलिदान और निष्ठा की छाया में इस्लाम को नजात देने के साथ लोगों को जगाया और उनके इंटलेक्चुअल, बौद्धिक व दीनी लेविल को भी ऊंचा किया, ताकि यह समाजी व जेहादी आंदोलन, अपने नतीजे को हासिल करके मुक्ति देने वाला भी बन सके।
13. तलवार पर ख़ून की जीत:
मज़लूमियत सबसे अहेम अस्लहा है। यह भावनाओं को जगाती है और घटना को अमर बना देती है। कर्बला में एक तरफ़ ज़ालिमों की नंगी तलवारें थीं और दूसरी तरफ़ मज़लूमियत। दिखावे में इमाम अ. और आपके साथी शहीद हो गए। लेकिन कामयाबी उन्ही को हासिल हुई। उनके ख़ून नें जहाँ बातिल (असत्य) को अपमानित किया वहीं हक़ व सच्चाई को मज़बूती भी दी। जब मदीने में हज़रत इमाम सज्जाद अ. से इब्राहीम बिन तलहा नें सवाल किया कि कौन जीता और कौन हारा? तो आपने जवाब दिया कि इसका फ़ैसला तो नमाज़ के समय होगा।
14. पाबंदियों से नहीं घबराना चाहिये:
कर्बला का एक पाठ यह भी है कि इंसान को अपने अक़ीदे व ईमान पर बाक़ी रहना चाहिये। चाहे तुम पर फ़ौजी व आर्थिक पाबंदियां ही क्यों न लगी हों। इमाम हुसैन अ. पर तमाम पाबंदियां लगी हुई थी। कोई आपकी मदद न कर सके इस लिये आपके पास जाने वालों पर पाबंदी थी। नहेर से पानी लेने पर पाबंदी थी। लेकिन इन सब पाबंदियों के होते हुए भी कर्बला वाले न अपने लक्ष्य से पीछे हटे और नाहि दुश्मन के सामने झुके।
15. पूरा आंदोलन सिस्टमेटिकः
हज़रत इमाम हुसैन अ. नें अपने पूरे आंदोलन को एक सिस्टम के अंतर्गत चलाया। जैसे बैअत से इंकार करना, मदीने को छोड़कर कुछ महीने मक्के में रहना, कूफ़ा व बसरा की कुछ मशहूर हस्तियों को ख़त लिखकर उन्हे अपने आंदोलन में शामिल करने के लिये दावत देना। मक्का, मिना और कर्बला के रास्ते में तक़रीरें करना आदि। इन सब कामों द्वारा इमाम अ. अपने मक़सद को हासिल करना चाहते थे। आशूरा के आंदोलन को कोई भी अंश बिना पालीसी के अंजाम नहीं पाया। यहाँ तक कि आशूरा की सुबह को इमाम हुसैन अ. नें अपने साथियों के बीच जो ज़िम्मेदारियाँ बाटीं थीं वह भी एक सिस्टम के अंतर्गत थीं।
16. महिलाओं की भूमिका को प्रयोग में लेनाः
महिलाओं नें इस दुनिया के बहुत से आंदोलनों में बड़ी अहेम भूमिका अदा की है। अगर पैग़म्बरों की कहावतों पर निगाह डाली जाए तो हज़रत ईसा अ., हज़रत मूसा अ., हज़रत इब्राहीम अ. ....... यहाँ तक कि पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के ज़माने की घटनाओं में भी महिलाओं की भूमिका बहुत प्रभावी रहा है। इसी तरह कर्बला की घटना को अमर बनाने में भी हज़रत ज़ैनब स. हज़रत सकीना अ. , अहलेबैत अ. में से जिन्हें बंदी बनाया गया था और कर्बला के दूसरे शहीदों की बीवियों के अहेम भूमिका रही है। किसी भी आंदोलन के संदेश को पब्लिक तक पहुँचाना बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण है। कर्बला के आंदोलन के संदेश को पब्लिक तक कर्बला के बंदियों नें ही पहुँचाया है।
17. जंग के मैदान में भी अल्लाह की याद:
जंग की हालत में भी अल्लाह की इबादत और उसके ज़िक्र को नहीं भूलना चाहिये। जंग के मैदान में भी इबादत व अल्लाह की याद ज़रूरी है। इमाम हुसैन अ. नें शबे आशूर दुश्मन से जो समय लिया था, उसका मतलब क़ुरआने करीम की तिलावत, नमाज़ और अल्लाह से मुनाजात थी। इसी लिये आपने फ़रमाया था कि मैं नमाज़ को बहुत ज़्यादा दोस्त रखता हूँ। शबे आशूर आपके ख़ैमों से पूरी रात इबादत व मुनाजात की आवाज़ें आती रहीं। आशूर के दिन इमाम अ. नें ज़ोहर की नमाज़ को राइट टाइम पढ़ा। यही नहीं बल्कि इस पूरे सफ़र में हज़रत ज़ैनब स. की नमाज़े शब भी क़ज़ा नहीं हो सकी, चाहे आपको बैठकर ही नमाज़ क्यों न पढ़नी पढ़ी हो।
18. अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करना:
सबसे महत्वपूर्ण बात इंसान का अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करना है। चाहे इस ज़िम्मेदारी को निभाने में इंसान को दिखावटी तौर पर कामयाबी नज़र न आए। और यह भी हमेशा याद रखना चाहिये कि इंसान की सबसे बड़ी कामयाबी अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा करना है, चाहे उसका नतीजा कुछ भी हो। हज़रत इमाम हुसैन अ. नें भी अपने कर्बला के सफ़र के बारे में यही फ़रमाया था कि जो अल्लाह चाहेगा बेहतर होगा, चाहे मैं क़त्ल हो जाऊँ या मुझे (बिना क़त्ल हुए) कामयाबी मिल जाए।
19. दीन की रक्षा के लिये क़ुर्बानी:
दीन के अनुसार, दीन का महत्व, दीन को मानने वालों से ज़्यादा है। दीन को बाक़ी रखने के लिये हज़रत अली अ. व हज़रत इमाम हुसैन अ. जैसी मासूम हस्तियों नें भी अपने ख़ून व जान को फ़िदा किया है। इमाम हुसैन अ. जानते थे कि यज़ीद की बैअत दीन के लक्ष्यों के ख़िलाफ़ है इसलिए बैअत से इंकार कर दिया और दीनी लक्ष्य की सुरक्षा के लिये अपनी जान क़ुर्बान कर दी और इस्लामी राष्ट्र को समझा दिया कि दीन की रक्षा के लिये दीन के चाहने वालों की क़ुर्बानी ज़रूरी है। इंसान को याद रखना चाहिये कि यह क़ानून केवल आपके ज़माने से ही विशेष नहीं था बल्कि हर ज़माने के लिये हैं।
20. अपने लीडर का समर्थन ज़रूरी है:
कर्बला, अपने लीडर के समर्थन की सबसे बड़ी मिसाल है। इमाम हुसैन अ. नें शबे आशूर अपने साथियों के सरों से अपनी बैअत को उठा लिया था और फ़रमाया था जहाँ तुम्हारा दिल चाहे चले जाओ। मगर आपके साथी आपसे जुदा नहीं हुए और आपको दुश्मनों में अकेला नहीं छोड़ा। शबे आशूर आपके समर्थन के सिलसिले में हबीब इब्ने मज़ाहिर और ज़ुहैर इब्ने क़ैन की बात चीत सोचने योग्य है। यहाँ तक कि आपके सहाबियों नें जंग के मैदान में जो नारे लगाए हैं और जिस तरह दुश्मन को ललकारा है उनसे भी अपने लीडर का समर्थन ज़ाहिर होता है, जैसे हज़रत अब्बास अ. नें फ़रमाया कि अगर तुमने मेरा दाहिना हाथ जुदा कर दिया तो कोई बात नहीं, मैं फिर भी अपने इमाम व दीन का समर्थन करूँगा। मुस्लिम इब्ने औसजा नें आख़िरी समय में जो हबीब को वसीयत की वह भी यही थी कि इमाम को अकेला न छोड़ना और उन पर अपनी जान क़ुर्बान कर देना।
21. दुनिया, बहकने वाली जगह है:
दुनिया के आनंद व सुख व माल व दौलत की मोहब्बत तमाम षड़यंत्रों व उपद्रव व फ़साद की जड़ है। कर्बला के मैदान में जो लोग गुमराह हुए या जिन्होंने अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा नहीं किया, उनके दिलों में दुनिया की मोहब्बत समाई हुई थी। यह दुनिया की मोहब्बत ही थी जिसनें इब्ने ज़ियाद व उमरे साद को इमाम हुसैन अ. का ख़ून बहाने पर आमादा किया। लोगों नें शहरी की हुकूमत के लालच और अमीर से मिलने वाले इनामों की उम्मीद पर इमाम अ. का ख़ून बहाया। यहाँ तक कि जिन लोगों नें आपकी लाश पर घोड़े दौड़ाए उन्होंने भी इब्ने ज़ियाद से अपनी इस करतूत के बदले इनाम चाहा। शायद इसी लिये इमाम हुसैन अ. नें फ़रमाया था कि लोग दुनिया परस्त हो गए हैं, दीन केवल उनकी ज़बानों तक रह गया है। ख़तरे के समय वह दुनिया की तरफ़ दौड़नें लगते हैं। चूँकि इमाम हुसैन अ. के साथियों के दिलों में दुनिया की ज़रा भी मोहब्बत नहीं थी इस लिये उन्होंने बड़े आराम के साथ अपनी जानों को अल्लाह के रास्ते में क़ुर्बान कर दिया। इमाम हुसैन अ. नें आशूरे के दिन सुबह के समय जो ख़त्बा दिया उसमें भी दुश्मनों से यही फ़रमाया कि तुम दुनिया के घोखे में न आ जाना।
22. तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला है:
तौबा का दरवाज़ा कभी भी बंद नहीं होता, इंसान जब भी तौबा करके सही रास्ते पर आ जाए बेहतर है। हुर जो इमाम अ. को घेर कर कर्बला के मैदान में लाया था, आशूर के दिन सुबह के समय बातिल व ग़लत रास्ते से हट कर हक़ व सच्चाई के रास्ते पर आ गया। हुर इमाम हुसैन अ. के क़दमों पर अपनी जान को क़ुर्बान करके, कर्बला के महान शहीदों में शामिल हो गया। इस से मालूम होता है कि हर इंसान के लिये हर हालत में और हर समय तौबा का दरवाज़ा खुला है।
23. आज़ादी:
कर्बला, आज़ादी का पाठशाला है और इमाम हुसैन अ. इस पाठशाला के शिक्षक हैं। आज़ादी वह अहेम चीज़ है जिसे हर इंसान पसंद करता है। इमाम अ. नें उमरे साद की फ़ौज से कहा अगर तुम्हारे पास दीन नहीं है और तुम क़यामत के दिन से नहीं डरते हो तो तुम कम से कम आज़ाद इंसान बन कर तो जी लो।
24. जंग में आरम्भ नहीं करनी चाहिये:
इस्लाम में जंग को प्राथमिकता नहीं है। बल्कि जंग, हमेशा इंसानों की हिदायत व मार्गदर्शन के रास्ते में आने वाली रुकावट को दूर करने के लिये की जाती है। इसी लिये पैग़म्बरे इस्लाम स. हज़रत अली अ. व इमाम हुसैन अ. नें हमेशा यही कोशिश की कि बिना जंग के मामला हल हो जाए। इसी लिये आपनें कभी भी जंग में आरम्भ नहीं किया। इमाम हुसैन अ. नें भी यही फ़रमाया था कि हम उनसे जंग में पहेल नहीं करेंगे।
25. इंसानी अधिकारों का समर्थन:
कर्बला जंग का मैदान था, मगर इमाम अ. नें इंसानों के माली अधिकारों का मुकम्मल समर्थन किया। कर्बला की ज़मीन को उसके मालिकों से ख़रीद कर वक़्फ़ किया। इमाम अ. नें जो ज़मीन ख़रीदी उसकी सीमा ठीकठाक था। इसी तरह इमाम अ. नें आशूर के दिन फ़रमाया कि ऐलान कर दो कि जो इंसान क़र्ज़दार हो वह मेरे साथ न रहे।
26. अल्लाह से राज़ी रहना:
इंसान का सबसे बड़ा कमाल, हर हाल में अल्लाह से राज़ी रहना है. इमाम हुसैन अ. नें अपने ख़ुत्बे में फ़रमाया कि हम अहलेबैत की इच्छा वही है जो अल्लाह की मर्ज़ी है। इसी तरह आपनें ज़िन्दगी के आख़िरी समय में भी अल्लाह से यही प्रार्थना की कि पालने वाले! तेरे अतिरिक्त कोई माबूद (इबादत के योग्य) नहीं है और मैं तेरे फ़ैसले पर राज़ी हूँ।
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