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Date of publication : 30/11/2014 7:21
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प्रोजेक्ट ब्लैक रोबोट, क्या है?

सन 1979 में इस्लामी इंक़ेलाब ईरान की कामयाबी के शुरुआती दिनों में ही अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों ने मुसलमानों के आंदोलन को कंट्रोल करने के लिए और मध्य पूर्व और दुनिया के अन्य देशों में अपनी पकड़ को बनाए रखने के लिए, पश्चिमवासियों के बीच एक बिगड़ी हुई राजनीतिक इस्लाम की विचारधारा को वुजूद में लाने के लिए अपने सबसे बड़े संघर्ष को शुरू कर दिया था


व्हाइट हाउस, इस्लाम फ़ोबिया और ईरान फ़ोबिया प्रोजेक्ट पर अमल करके क्या हासिल करना चाहता है?
विलायत पोर्टलः वर्ष 1979 में ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी से इस्लामी देश बहुत बड़ी हद तक प्रभावित हुए थे, और वर्ष 2010 से क्रांतिकारी गतिविधियां बहुत सारे देशों में बड़े पैमाने पर फैल गईं जिनके फलस्वरूप इन देशों में कई आंदोलनों ने जन्म लिया। न्यू ईस्टर्न आउट लोक की रिपोर्ट के अनुसार पिछले दशकों में हमने देखा कि उनमें राजनीतिक और आर्थिक गतिशीलता और उत्साह में बढ़ोत्तरी हुई है।
वर्ष 1979 में ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी से इस्लामी देश बहुत बड़ी हद तक प्रभावित हुए थे और वर्ष 2010 से क्रांतिकारी गतिविधियां कई देशों में बड़े पैमाने पर फैल गईं जिनके फलस्वरूप इन देशों में कई आंदोलनों ने जन्म लिया। इस्लामी देशों के राजदूतों और उच्च अधिकारियों ने 31 अगस्त वर्ष 2011 में सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई के साथ एक बैठक में इस्लामी जागरूकता की यह व्याख्या की कि आज का मुसलमान समाज, महत्वपूर्ण घटनाओं के अनुभवों से जूझ रहा है, जागरूकता और इस्लामी अनुभव कि जो इस समय कुछ इस्लामी देशों में देखने को मिला है, यह लोगों के अंदर पहले से ज़्यादा अपना फैसला खुद करने की भावना पैदा होने का कारण बना है। वर्तमान घटनाएं, एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कीमती ऐतिहासिक निरंतरता है।
वह घटनाएं जो मिस्र, ट्यूनीशिया, लीबिया, यमन, बहरैन और कुछ अन्य देशों में हो रही हैं, वह एक राजनीतिक लड़ाई में जनता की भरपूर भागीदारी की पहचान करा रही हैं। इन देशों के लोग अपने मामलों की बागडोर अपने हाथों में लेने की कोशिश में लगे हैं और लोगों की यह मांग हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से है यही मुद्दे एक इस्लामी समाज और पूरे मध्य पूर्व के महत्व की पहचान कराते हैं। पश्चिम पर हावी राजनीति में और सबसे पहले अमेरिका ने इन घटनाओं को दुश्मनी के रूप में देखा है कि जिसके कारण उनके अंदर इस्लाम से और ज़्यादा नफरत पैदा हो गई है जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने समस्त पश्चिमी समाजों में इस्लाम से डरने (इस्लामो फ़ोबिया) का प्रचार किया है।
सन 1979 में इस्लामी इंक़ेलाब ईरान की कामयाबी के शुरुआती दिनों में ही अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों ने मुसलमानों के आंदोलन को कंट्रोल करने के लिए और मध्य पूर्व और दुनिया के अन्य देशों में अपनी पकड़ को बनाए रखने के लिए, पश्चिमवासियों के बीच एक बिगड़ी हुई राजनीतिक इस्लाम की विचारधारा को वुजूद में लाने के लिए अपने सबसे बड़े संघर्ष को शुरू कर दिया था। इसी सिलसिले में ब्लैक रोबोट नामक परियोजना का ईरान के खिलाफ इस्तेमाल किया गया परियोजना को अमली बनाने की वजह यह थी कि पश्चिम ने ईरान पर शरारत की धुरी का सदस्य होने का आरोप लगाया था। यहां तक कि एक बड़े दावे में यह घोषणा की गई कि ईरान विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है इसलिए पश्चिम ने दुनिया में, ईरान से डरने (ईरान फ़ोबिया) की परियोजना को जन्म दिया।
मुस्लिम देशों में राजनीतिक चेतना की बढ़ती लहर और उनके इस रुझान से कि वह वाशिंगटन की बताई हुई तरकीबों से आज़ाद रहकर जीवन व्यतीत करना चाहते हैं मुकाबला करने के लिए, युनाईटेड स्टेट ने मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में कुछ आंतरिक झड़पों को शुरू करवाया, जिसका परिणाम यह हुआ कि वाशिंगटन को इस्लामी देशों में हस्तक्षेप करना पड़ा और शिया और सुन्नी के बीच लड़ाई में बढ़ोत्तरी हो गई। अमेरिका की पहली परियोजना में, अफगानिस्तान में राजनीतिक विरोधियों के साथ लड़ाई में, अलक़ायदा आतंकवादी संगठन को एक हरबे के रूप में चुना गया। वाशिंगटन ने फ़ार्स की खाड़ी के बादशाहों के समर्थन से ISIL (दाइश) जैसे नए उग्रवादी दलों के जन्म को अपनी परियोजनाओं का हिस्सा करार दिया, ताकि इस तरह से उनसे ईरान, सीरिया और इराक़ के खिलाफ जंग में हरबे का काम ले। इसी तरह सीरिया के विरोधियों की जो कि वास्तव में आतंकवादी हैं राजनीतिक, फौजी और सुनियोजित वित्तीय सहायता करके अपनी योजनाओं के पूरा करने का मार्ग प्रशस्त किया।
व्हाइट हाउस की आतंकवाद के खिलाफ़ गतिविधियों में 11 सितंबर 2001 की घटना के बाद विस्तार पैदा होने के कारण अमेरिका में ईरान से डरने (ईरान फ़ोबिया) में भी बढ़ोत्तरी हुई। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा वतनपरस्ती के कानून का पास किया जाना, कि जो अमेरिकी जासूसी एजेंसियों और अमेरिका में कानून लागू करने वाले संगठनों को आतंकवादी गतिविधियों की जांच करने और सभी मुसलमानों पर नज़र रखने में असीम शक्ति और पूर्ण स्वतंत्रता देता था, इस्लामोफ़ोबिया को ज़्यादा करने में मददगार साबित हुआ।
अफ़गानिस्तान और इराक़ में अमेरिकी फौजी हस्तक्षेप पर आधारित कार्यवाहियां और कार्टून का मुद्दा कि जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया और इसी तरह फ्लोरिडा में एक अमेरिकी पादरी द्वारा कुरआन को जलाने की अपमानजनक कीर्यवाही और कुछ अन्य घटनाएं जो एक के बाद एक अमेरिका में उत्पन्न हुईं, उन सबने अमेरिका में इस्लाम के खिलाफ़ ग़लत भावनाओं को और बढ़ा दिया, ग्लोप के सर्वे ने कई बार यह बताया कि सभी धार्मिक दलों पर आधारित अमेरिका की आधी से ज़्यादा आबादी, ख़ास कर सरकारी कर्मचारियों, कानून लागू करने वाले संगठनों की नज़र में मुसलमानों के साथ सबसे ज़्यादा भेदभाव होता है, अमेरिकी मीडिया ने कई बार इस्लाम से डराने (इस्लामो फ़ोबिया) का काम किया है। इस देश में शांति की स्थिति के सुधार के लिए अमेरिकी अधिकारियों ने राष्ट्रीय कानून लागू करने वाली संस्थाओं, ख़ास कर सरकारी पुलिस के विभागों, पुलिस चौकियों और राष्ट्रीय गार्ड को मजबूत किया। इस काम को अंजाम देने के लिए हालिया वर्षों में अमेरिका में कानून लागू करने वाली संस्थाओं में लोगों की समस्याओं पर विशेष बल दिया गया है जिसके परिणाम स्वरूप बहुत कम प्रशिक्षण के साथ या बिना प्रशिक्षण बहुत सारे लोगों को काम पर लगाया गया, शिक्षा के स्तर में सुधार और कर्मचारियों की आई क्यू बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की मौजूदगी में सेमिनार और भाषणों के कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनका संबंध अमेरिका के रक्षा मंत्रालय, ख़ुफ़िया विभागों या कानून लागू करने वाली संस्थाओं से है। इस शैक्षिक दौरे में ताजा भाग लेने वाले प्रचारकों की जिम्मेदारी थी कि वह इस झूठ को ज़्यादा से ज़्यादा हवा दें कि अमेरिका में मुसलमानों का बहुमत इस प्रयास में है कि वह अमेरिकी सत्ता के ढांचे में प्रवेश कर अमेरिका में इस्लामी कानून को वुजूद में लाए।
इस्लाम से डराने का एक और दिलचस्प काम वालिद शूबियात का था कि उसने अमेरिका सरकार से, सभी मुसलमानों विशेषकर छात्रों और स्थानीय मस्जिदों के इमामों पर ज्यादा से ज़्यादा नजर रखने के लिए मदद का अनुरोध किया। इस बात की पुष्टि के लिये कि उच्च अधिकारियों की सभाओं में, इस्लाम का डर पाया जाता है, सीआईए के पूर्व प्रमुख रॉबर्ट जेम्स की किताब “शरीअत अमेरिका के लिए खतरा” में पूरी तौर पर देखा जा सकता है। अमेरिका में इस्लाम से डरने की, गैर सरकारी संगठनों और मानवाधिकार के प्रतिनिधियों द्वारा ख़ासकर मुसलमानों के चैनल के ग़ैर सरकारी संगठन और अमेरिका और इस्लामी सम्पर्क संगठन, सी ए आई आर कि जो वाशिंगटन में स्थापित है, हमेशा निंदा की गई है। इसके प्रमुख नेहाद अवाद ने अमेरिका मुख्य न्यायाधीश के नाम एक पत्र लिखकर मांग की कि अमेरिका के राष्ट्रीय कानून लागू करने वाली संस्थाओं में इस्लाम से डरने को नकारा जाये।
ख़राब लोगों से उस्तादों के रूप में काम लेना इस सच्चाई को उजागर करेगा कि अमेरिका में कानून लागू करने वाली संस्थाओं के काम का आधार, अमेरिका की शांति के मुद्दों पर नहीं, बल्कि गलत सूचनाओं पर रखा गया है। जाहिर है कि आतंकवाद और धार्मिक उग्रवाद का मुकाबला करने के लिए पूरी अंतरराष्ट्रीय सुसाईटी का एकजुट होना ज़रूरी है, यह एक सच्चाई है कि व्हाइट हाउस की गलत नीतियां और इस्लामो फ़ोबिया का झूठा प्रचार शांति स्थापित करने में सहायक नहीं है। इन परिस्थितियों में व्हाइट हाउस की आंतरिक और विदेश राजनीति के खिलाफ़ इस्लामी दुनिया और अमेरिकी सुसाईटी की ओर से बहुत स्पष्ट नकारात्मक प्रतिक्रियाओं व्यक्त की जा रही है।


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