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Date of publication : 9/12/2014 22:42
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पूरी अक़ीदत के साथ मनाया गया बीमारे कर्बला दिवस।

उन्नाव में अन्जुमने मुहाफ़िज़े अज़ा की ओर से बीमारे करबला दिवस का आयोजन इमाम बाड़ा मरहूम मुशताक़ हुसैन में हुआ। जिसमे स्थानीय व बाहरी शायरों ने भाग लेते हुए बारगाह-ए-मौला सज्जाद इमाम ज़ैनुलआबेदीन (अ) में अक़ीदत के फूल न्योछावर किए।


विलायत पोर्टलः उन्नाव में अन्जुमने मुहाफ़िज़े अज़ा की ओर से बीमारे करबला दिवस का आयोजन इमाम बाड़ा मरहूम मुशताक़ हुसैन में हुआ। जिसमे स्थानीय व बाहरी शायरों ने भाग लेते हुए बारगाह-ए-मौला सज्जाद इमाम ज़ैनुलआबेदीन (अ) में अक़ीदत के फूल न्योछावर किए।
प्रोग्राम का आरम्भ तिलावते क़ुरान-ए-मजीद से किया गया, जिसमें निज़ामत की ज़िम्मेदारी मौलाना ज़ैग़म अब्बास ज़ैदी इमामे जुमा उन्नाव ने निभाई। इसके बाद फ़ैज़ाबाद से तशरीफ़ लाए मौलाना सैयद हसन ज़फ़र ने इमाम ज़ैनुलआबिदीन (अ) के मसाएब बयान करते हुए फ़रमाया कि बादे शहादते इमाम हुसैन (अ) जब लुटा हुआ क़ाफ़िला करबला से शाम होते हुए मदीना पहुंचा और आप के चाहने वाले मदीने के लोगों ने आप से पूछा कि आप पर सबसे ज़ादा मुसीबत कहां पड़ी? तो मौला की ज़बान पर एक ही नाम था अश्शाम अश्शाम, इमाम ने कहा कि शाम के बाज़ारों में लोग तमाशाई बन कर अपनी छतों पर खड़े हुए थे और अपने घरों की छतों से अंगारे फेंक रहे थे। एक अंगारा मेरे अमामे पर आकर पड़ा और अमामा जलता हुआ आग मेरे सर तक पहुंच गई। लोगों ने पूछा कि मौला आपने आग बुझाई क्यों नही? तब इमाम ने फ़रमाया कि मेरे हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ी पड़ी हुई थी, मैं किस तरह से आग बुझाता, यज़ीदी लशकर के लोगों ने आले मोहम्मद पर इतनी मुसीबतें ढाईं कि अगर दिनों पर ढाते तो वह रात की तरह हो जाते। इतना सुनते ही लोगों की आंखों से आंसू जारी हो गए।
इसके बाद शायरों ने अपने कलाम पढ़े जिनमें- रमन श्रीवास्तव, फ़ारूक़ ज़ैदी, सफ़दर बिलगिरामी, रज़ा लखनवी, सलमान ताबिश, हाफ़िज़ रिज़वान, शरीफ़ उन्नावी, मोहम्मद बाक़िर बनारसी आदि शामिल थे।


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