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Date of publication : 14/12/2014 21:41
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इमाम हुसैन (अ) के चेहलुम का महत्व आयतुल्लाह ख़ामेनई की ज़बानी।

चेहलुम के महत्व का रहस्य क्या है? सिर्फ यही कि शहीद की शहादत को चालीस दिन हो गए, इसमें क्या खास बात है? अगर इतिहास में यह महान शहादत तो अंजाम पा जाती लेकिन बनी उमय्या इसमें सफल हो जाते कि जिस तरह उन्होंने देखने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके सभी साथियों को मार डाला था और उनके पाक जिस्मों को मिट्टी के नीचे छुपा दिया था, उनकी याद को भी उस युग और आइंदा पीढ़ियों के दिलों से मिटा देते तो क्या इस स्थिति में इस शहादत का इस्लाम को कोई फ़ायदा पहुंचता?



विलायत पोर्टलः चेहलुम के महत्व का रहस्य क्या है? सिर्फ यही कि शहीद की शहादत को चालीस दिन हो गए, इसमें क्या खास बात है? अगर इतिहास में यह महान शहादत तो अंजाम पा जाती लेकिन बनी उमय्या इसमें सफल हो जाते कि जिस तरह उन्होंने देखने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके सभी साथियों को मार डाला था और उनके पाक जिस्मों को मिट्टी के नीचे छुपा दिया था, उनकी याद को भी उस युग और आइंदा पीढ़ियों के दिलों से मिटा देते तो क्या इस स्थिति में इस शहादत का इस्लाम को कोई फ़ायदा पहुंचता?
चेहलुम के महत्व का रहस्य क्या है?
केवल यही कि शहीद की शहादत को चालीस दिन हो गए तो इसका क्या फ़ायदा है? चेहलुम की विशेषता यह है कि चेहलुम के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत की याद ताज़ा हो गई और यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। मान लें कि अगर यह महान शहादत इतिहास में अंजाम पा जाती यानी हुसैन इब्ने अली और बाकी शहीद करबला में जामे शहादत पी लेते लेकिन बनी उमय्या केवल इतना करने में सफल हो जाते कि जिस तरह से उन्होंने इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों व रिश्तेदारों को बेदर्दी से मार दिया था उनके पाक जिस्मों को मिट्टी में छिपा दिया था इसी तरह उनकी याद को भी दुनिया भर के इंसानों के दिलों से भुला देते तो ऐसी स्थिति में इस्लाम को इस शहादत से क्या फायदा पहुंचता? या अगर उस दौर में कुछ असर हो भी जाता तो क्या इतिहास में इस घटना को बाद की पीढ़ियों को, मुज़लूमों को इतिहास के आने वाले समय के यज़ीदों की यज़ीदयत को फ़ाश करने के संदर्भ में कोई फ़ायदा मिलता? अगर हुसैन (अ) शहीद हो जाते लेकिन उस युग के लोग और आने वाली पीढ़ियां न जान पाती कि हुसैन (अ) शहीद हो गए हैं तो यह घटना राष्ट्रों और इंसानी समाजों और इतिहास को क्रांतिकारी मोड़ देने में अपना कोई प्रभाव और भूमिका छोड़ पाती? आप देख रहे हैं कि इसका कोई असर न होता, जी हां हुसैन (अ) शहीद हो गए और दुनिया के बहुत से दूसरे शहीद भी जो ग़ुरबत व परदेस में बेदर्दी से शहीद किये गये वह जन्नत में तो अपने उच्च स्थान तक पहुँच गए, उनकी आत्माएं कामयाब हो गईं और अल्लाह की बारगाह पहुंच गईं। लेकिन उनकी शहादत से इस्लाम व इंसानियत को कितना फ़ायदा पहुंचा? वही शहीद सीख व शिक्षा का कारण बनती है कि जिसकी शहादत व मज़लूमियत के बारे में उसके समकालीन और आने वाली पीढ़ियां सुनें और जानें। वह शहीद मॉडल बनता है जिसका ख़ून हमेशा जोश मारता कहे और इतिहास के साथ बहता चला जाए। किसी क़ौम की मज़लूमियत केवल उस समय तक राष्ट्रों के मज़लूम व घायल जिस्म को मरहम लगाकर ठीक कर सकती है कि जब उसकी मज़लूमियत फरियाद बन जाए। उस मज़लूमियत की आवाज़ दूसरे इंसानों के कानों तक पहुंचे। यही कारण है कि आज बड़ी शक्तियों ने शोर मचा रखा है ताकि हमारी आवाज बुलंद न होने पाए। इसलिए वह तैयार हैं कि चाहे जितनी पूंजी खर्च हो लेकिन दुनिया यह न समझ पाए कि हम पर जंग क्यों थोपी गई और उस दौर में भी साम्राज्यवादी शक्तियां तैयार थीं कि चाहे जितनी पूंजी लग जाए मगर हुसैन (अ) का नाम और उनकी याद व शहादत एक पाठ बनकर उस युग के लोगों और बाद की पीढ़ियों के मन व दिल में न बैठने पाए। वह शुरुआत में नहीं समझ पाए कि समस्या कितनी गंभीर है लेकिन जैसे-जैसे समय गुज़रता गया लोग ज़्यादा से ज़्यादा आगाह होने लगे। बनी अब्बास की हुकूमत के दौरान यहां तक कि इमाम हुसैन की मुबारक क़ब्र को भी उजाड़ दिया गया, पाक रौज़े को पानी से भर दिया उनकी कोशिश यह थी कि उसका कोई नामोनिशान बाक़ी न रहे। शहादत और शहीदों की याद मनाने का यही फ़ायदा है शहादत तब तक अपना प्रभाव नहीं दिखाती जब तक कि शहीद का ख़ून जोश न मारे और उसकी याद दिलों में ताज़ा न की जाए और चेहलुम का दिन वह दिन है जिस दिन पहली बार करबला की शहादत के संदेश के झंडे को बुलंद किया गया। यह शहीदों के परिवार के ज़िंदा बच जाने वालों का दिन है अब चाहे पहले ही चेहलुम के अवसर पर इमाम हुसैन के अहले हरम कर्बला में आ गए हों या न आए हों लेकिन पहला चेहलुम वह दिन है जब पहली बार हुसैन इब्ने अली के मशूर ज़ाएर जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी और अतीयः कि जो पैग़म्बर के सहाबी थे कर्बला की ज़मीन पर पहुँचे, जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंधे थे और जैसा कि रिवायतों में आया है अतीयः ने उनका हाथ पकड़ा और उसे हुसैन इब्ने अली की कब्र पर रखा उन्होंने कब्र को छुआ और रोये और उनसे राज़ो नियाज़ किया हुसैन इब्ने अली अ. की याद को जीवित किया और शहीदों की क़ब्रों की ज़ियारत की, अच्छी रीत को प्रचलित किया, चेहलुम का दिन एक ऐसा ही महत्वपूर्ण दिन है। इमाम हुसैन के आंदोलन का उद्देश्य। इमाम हुसैन अ. ने सच्चाई और न्याय के लिये आंदोलन किया थाः (’’انما خرجت لطلب الصلاح فی امۃ جدی ارید ان امر بالمعروف و انھیٰ عن المنکر ‘‘) चेहलुम की ज़ियारत में जो एक बेहतरीन ज़ियारत है हम पढ़ते हैः (’’و منح النصح و بذل مھجتہ فیک لیستنقذ عبادک من الجہالۃ و حیرۃ الضلالۃ‘‘) पैग़म्बरे इस्लाम स.अ की एक मशहूर हदीस हैः (’’ایھا الناس انّ رسول اللہ صلّی اللہ علیہ وآلہ وسلّم قال: من رائی سلطانا جائرا مستحلّا لحرم اللہ ناکثا لعھد اللہ مخالفا لسنت رسول اللہ صلّی اللہ علیہ وآلہ وسلّم یعمل فی عباد اللہ بالاثم و العدوان فلم یغیر علیہ بفعل ولا قول کان حقا علی اللہ ان یدخلہ مدخلہ‘‘) पैग़म्बरे इस्लाम स.अ की सभी हदीसों से या जो मासूमीन से इमाम हुसैन के बारे में बयान हुई हैं, यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अपने लक्ष्य सच्चाई, न्याय और अल्लाह के दीन को मज़बूत बनाना, शरीयत की प्रभुसत्ता को वुजूद में लाना और जुल्म व अत्याचार और सरकशी को जड़ से उखाड़ फेंकना था। पैग़म्बर अकरम स.अ के उद्देश्य और अन्य पैगम्बरों के रास्ते को आगे बढ़ाना था (’’یا وارث آدم صفوۃ اللہ یا وارث نوح نبی اللہ‘‘) यानी ऐ आदम और नूह के वारिस और यह बात सबको पता है कि पैगम्बरों के आगमन का उद्देश्य (’’ لیقوم الناس بالقسط ‘‘) हक और अदालत को स्थापित करना और इस्लामी सरकार और इस्लामी व्यवस्था को स्थापित करना था। चेहलुम का महत्व मुख्य रूप से चेहलुम के महत्व का रहस्य यह है कि इस दिन पैग़म्बरे इस्लाम स.अ के अहलेबैत के उपायों द्वारा इमाम हुसैन के आंदोलन की याद हमेशा के लिए अमर हो गई और उसका आधार डाल दिया गया। अगर शहीदों के परिवार के जीवित बचे लोगों और असली वारिस तरह तरह के दर्दनाक हादसों में जैसे आशूरा के दिन इमाम हुसैन की शहादत के बाद शहादत की निशानियों की सुरक्षा की खातिर कमर न कस लें तो बाद की पीढ़ियां शहादत के नतीजों से फ़ायदा नहीं उठा पाएंगी। यह बात सही है कि अल्लाह तआला शहीदों को इस दुनिया में भी ज़िंदा रखता है और शहीद इतिहास में और लोगों की मन व दिल में हमेशा अमर रहता है लेकिन यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि शहीदों की याद और ज़ियारत को ज़िंदा रखें। आशूरा के ज़िंदा रहने का रहस्य। अगर ज़ैनबे कुबरा (स) और इमाम सज्जाद अ. अपने उन्हीं बंदी बनाये जाने के दिनों में चाहे कर्बला में अस्रे आशूर के अवसर पर और चाहे बाद के दिनों में कूफ़ा और शाम (सीरिया) के रास्ते में और खुद शाम में और उसके बाद कर्बला के सफ़र के दौरान और मदीना की ओर वापसी के दौरान और बाद के कई वर्षों में जब तक यह बुज़ुर्गवार जीवित रहे उन्होंने कर्बला की घटना की व्याख्या के संबंध में संघर्ष न किया होता और आशूरा के फ़लसफ़े की सच्चाई और हुसैन इब्ने अली के उद्देश्य और दुश्मनों के अत्याचार का वर्णन न किया होता तो आशूरा की घटना आज तक पूरे उत्साह के साथ ज़िंदा न होती। रिवायत के अनुसार क्यों इमाम जाफ़र सादिक़ ने फ़रमाया कि जो इंसान आशूरा के बारे में एक शेर कहे और लोगों को इस शेर के माध्यम से रुलाये जन्नत को उसके लिए वाजिब कर देता है? चूंकि पूरी दुनिया की मीडिया कर्बला को और पूरी तरह से अहलेबैत अ. की सत्यता को छिपाने और अंधेरे में रखने पर पूरे तरह से तैयार हो गए थे, ताकि लोग यह न समझ पाएं कि क्या हुआ और वास्तव में बात है क्या और सच्चाई क्या है। प्रोपगंडा ऐसा ही होता है उस ज़माने में भी आज की तरह क्रूर और ज़ालिम ताक़तें शैतानी, एकतरफ़ा और झूठे प्रचार के माध्यम से ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाती थीं, ऐसी स्थिति में क्या यह संभव था की आशूरा की यह घटना जो एक जंगल में दुनिया से दूर एक कोने पर घटित हुई, इस महानता और जोश व उत्साह के साथ बाक़ी रहती? निश्चित रूप से इन कोशिशों के बिना समाप्त हो जाती जिस चीज़ ने इस घटना को जिंदा रखा वह इमाम हुसैन के अहले हरम की कोशिशें थीं जितना हुसैन इब्ने अली और उनके साथियों की कोशिशों को बाधाओं और रूकावटों का सामना हुआ, उतना ही हज़रत ज़ैनब, इमाम सज्जाद और दूसरे ज़िंदा बच जाने वालों को भी, लेकिन उनका मैदान, जंग का मैदान नहीं था बल्कि उपदेश और कल्चरल मैदान था हमें इन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए। यह जनाब ज़ैनब और इमाम सज्जाद अ. का संघर्ष था जिसने करबला को हमेशा हमेशा के लिये अमर बना दिया। चेहलुम का पाठ चेहलुम जो दर्स हमें देता है वह यह है कि शहादत की वास्तविकता को दुश्मनों के प्रचारों के तूफान के सामने ज़िंदा रहना चाहिए, आप देखिये ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब की शुरुआत से आज तक इंक़ेलाब, इमाम ख़ुमैनी, इस्लाम और ईरानी कौम के खिलाफ़ प्रचार की मात्रा कितनी ज़्यादा रही है चाहे वह प्रचार के तूफान जंग के खिलाफ़ उठाए गये हों वह जंग कि जो जनता की शराफ़त, सज्जनता, हैसियत और देश और इस्लाम की रक्षा के लिये थी अब देखिए कि दुश्मन उन प्रिय शहीदों के खिलाफ जिन्होंने अपनी जानों यानी सबसे बड़ी पूंजी को आगे बढ़कर खुदा की राह में कुर्बान कर दिया, डायरेक्ट और इंनडायरेक्ट तरीके से रेडियो, समाचारों, मैगज़ीनों और किताबों के माध्यम से पूरी दुनिया में सीधे-साधे इंसानों के दिलों को उनसे दूर करने के लिए कितने प्रोपगंडे कर रहा है। यहां तक हमारे देश के भी कुछ भोले भाले जाहिल भी उनके प्रोपगंडों के धोखे में आ जाते हैं। अगर उन कुप्रचारों के मुक़ाबले में सही प्रचार न होता और न हो, अगर ईरानी राष्ट्र वक्ताओं, लेखकों और कलाकारों की जानकारी और अंतर्दृष्टि उस सच्चाई की सेवा में व्यस्त न हो जो इस देश में पाई जाती है तो दुश्मन प्रचार के मैदान में हावी हो जाएगा, प्रचार का क्षेत्र बहुत महान और जोखिम भरा क्षेत्र है हालांकि क़ौम की अधिकांश जनता, इंक़ेलाब के प्रति सही जानकारी की बरकत से दुश्मन के प्रचारों से सुरक्षित है दुश्मन ने बहुत झूठ बोला और जो चीजें हमारी नज़रों की सामने थीं उन्हें उल्टा करके दिखाया लेकिन हमारी क़ौम को इंटरनेशनल मीडिया के झूठे प्रोपगंडों और निराधार बातों पर बिल्कुल यक़ीन नहीं रहा। यज़ीद की ज़ालिम और दमनकारी हुकूमत अपने प्रचार के माध्यम से हुसैन इब्ने अली को दोषी ठहराती थी और यह बताती थी कि हुसैन वह इंसान हैं कि जिन्होंने इस्लामी हुकूमत और अद्ल व इंसाफ़ के खिलाफ दुनिया की खातिर आंदोलन किया है (नऊज़बिल्लाह) कुछ लोग इन झूठे प्रचारों पर विश्वास कर लेते थे लेकिन जनाबे ज़ैनब और इमाम सज्जाद के प्रचार ने इन सभी प्रोपगंडों और झूठे दावों को मिट्टी में मिला दिया और हक़ ऐसा ही होता है।


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