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Date of publication : 15/12/2014 0:14
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जायोनी और तकफीरी, एक ही वास्तविकता के दो नाम।

पिछले तीन साल के दौरान इस्लामी देशों में तकफीरी विचारधारा बहुत तेजी से फैली है और इस अवधि में उसने अमेरिका और इस्राईल के मजबूत हाथ के रूप में काम किया है। हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई ने 25 नवंबर 2014 को चरमपंथ और तकफीरी विचारधारा के खिलाफ़ इंटरनेशनल कॉन्फ़्रेंस में हिस्सा लेने वालों को संबोधित करने के दौरान इस बारे में यूं कहा था, “तकफीरी आतंकवादी गिरोह पिछले कुछ वर्षों से विश्व साम्राज्यवाद की ओर से इस्लामी दुनिया पर थोपी गई एक बड़ी समस्या है।“



विलायत पोर्टलः पिछले तीन साल के दौरान इस्लामी देशों में तकफीरी विचारधारा बहुत तेजी से फैली है और इस अवधि में उसने अमेरिका और इस्राईल के मजबूत हाथ के रूप में काम किया है। हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई ने 25 नवंबर 2014 को चरमपंथ और तकफीरी विचारधारा के खिलाफ़ इंटरनेशनल कॉन्फ़्रेंस में हिस्सा लेने वालों को संबोधित करने के दौरान इस बारे में यूं कहा था, “तकफीरी आतंकवादी गिरोह पिछले कुछ वर्षों से विश्व साम्राज्यवाद की ओर से इस्लामी दुनिया पर थोपी गई एक बड़ी समस्या है।“ इस बारे में इस प्वाइंट को स्वीकार करना चाहिए कि साम्राज्यवाद शक्तियों द्वारा बनाये गये तकफ़ीरी टोले ने फ़िलिस्तीन और क़ुद्दस शरीफ से मुसलमानों का ध्यान हटाकर अपने ज़ायोनी आकाओं द्वारा दी गई ड्यूटी को बहुत अच्छी तरह अंजाम दिया है। जैसा कि आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई इस बारे में कहते हैं, “इस क्षेत्र में मुसलमानों के सामने सबसे बड़ा मोर्चा फ़िलिस्तीन का मुद्दा था, लेकिन तकफीरी समूहों ने इस मुद्दे को बदल दिया और जंग को इराक़, सीरिया, पाकिस्तान और लीबिया के शहरों और गली कूचों तक खींच लाए। यह तकफीरी समूहों का सबसे बड़ा और गंभीर अपराध है”।
ज़ायोनी हुकूमत की ओर से तकफीरियों के समर्थन के कुछ उदाहरण
 1. फ़ौजी ट्रेनिंग और संगठन बनाना:
मौजूदा साक्ष्यों और प्रमाणों की रौशनी में तकफीरी आतंकवादी जॉर्डन, तुर्की, अधिकृत फिलिस्तीन और कुछ अन्य देशों में अमेरिकी और इस्राईली फौजी कमांडर्ज़ के हाथों फ़ौजी ट्रेनिंग हासिल कर रहे हैं और उन्हें ज़रूरी ट्रेनिंग दिए जाने के बाद आतंकवादी गतिविधियों के लिए इराक़ और सीरिया भेज दिया जाता है। उदाहरण के लिए एक अंतर-राष्ट्रीय अनुसंधान संस्था “ग्लोबल रिसर्च” ने 16 जुलाई 2014 को विकीलीक्स के संस्थापक स्नोडेन के अनुसार इस तथ्य से पर्दा उठाया कि दाइश का मुखिया अबू बकर बग़दादी लगभग एक साल तक इस्राईली खुफिया एजेंसी “मोसाद” के देखरेख में अधिकृत फिलिस्तीन में आतंकवाद की ट्रेनिंग हासिल करता रहा है।
2. घायल होने वाले तकफीरी आतंकवादियों का इलाज:
अधिकृत फिलिस्तीन की अरब कमेटी ने एक बयानिया जारी किया है जिसमें इस्राईल की ग़ासिब ज़ायोनी हुकूमत की ओर से घायल तकफीरी आतंकवादियों को मेडिकल ट्रीटमेंट की सुविधा प्रदान किए जाने की निंदा की है। इसी तरह इस कमेटी के सक्रिय जवानों ने अधिकृत फिलिस्तीन के उत्तरी भाग में स्थित सफद शहर के रैफ अस्पताल के सामने प्रदर्शन किये और ज़ायोनी हुकूमत से मांग की कि वह तकफीरी आतंकवादियों की मदद न करे। इस विरोध की प्रतिक्रिया में इस्राईली सेना के प्रवक्ता ने कहाः “इस्राईल मानवीय सेवाएं दे रहा है और उसे इस बात से कोई ग़रज़ नहीं कि घायल लोगों का संबंध किससे है। इस्राईल मानवीय आधार पर जारी अपनी गतिविधियां जारी रखेगा।
3. इस्लामी प्रतिरोध के सैन्य केन्द्रों और कारवानों पर हमले
इस्राईल एयर फ़ोर्स ने अब तक कई बार सीरिया के सैन्य केन्द्रों और कारवानों को हवाई हमलों का निशाना बनाया है और इस तरह तकफीरी आतंकवादी तत्वों की मदद करने की कोशिश की है।
4. सीरिया के तथाकथित दोस्तों की सभाओं का आयोजन
इस्राईल ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से विश्व जनमत और मुसलमानों को धोखा देने के लिए अब तक फ़्रैंड्ज़ ऑफ़ सीरिया के नाम से यूरोपीय और एशियाई देशों में कई सभाओं और मीटिंगों के आयोजन की व्यवस्था की है। याद रहे कि अब तक फ़िलिस्तीन के बारे में इस्राईल के खिलाफ अरब देशों के बीच कोई ऐसा गठबंधन नहीं बन सका जो फ़्रैड्ज़ ऑफ फिलिस्तीन के नाम पर किसी सभा या बैठक का आयोजन करें।
5. तकफीरी आतंकवादियों को हथियार और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति
इस्राईल की ग़ासिब ज़ायोनी हुकूमत अब तक कई तरीकों और बहानों से तकफीरी आतंकवादी तत्वों को हथियार और सैन्य उपकरण प्रदान कर चुकी है। अलसोमरिया समाचार के अनुसार इराक़ के प्रांत दियाली के पुलिस प्रमुख ने बताया कि इराकी सुरक्षा बल अब तक दाइश के खिलाफ कई ऑप्रेशनों में इस्राईली हथियारों को क़ब्जे में ले चुकी हैं। उसने बताया कि बअकूबा से 60 किलोमीटर उत्तर की ओर स्थित क्षेत्र अल-अज़ीम, अलमेक़दादिया के आसपास और अलमुफ़रक में दाइश के आतंकवादियों से इस्राईल के बने हुये सैन्य हथियार मिल रहे हैं।
6. मीडिया के माध्यम से तकफीरी आतंकवादियों का समर्थन:
अरब, अमरीकी और पश्चिमी मीडिया तकफीरी आतंकवादी तत्वों से सीरिया और इराक़ में प्रदर्शन करने वाले आतंकवादी कार्रवाई को बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहे हैं और उनके पक्ष में प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने दाइश के खिलाफ़ लड़ने वाले इराक़ी और सीरियाई सुरक्षा बलों के खिलाफ़ नियमित रूप से मनोवैज्ञानिक युद्ध शुरू कर रखा है। यह मीडिया तकफीरी आतंकवादियों को निडर और बहादुर योद्धा बनाकर पेश कर रहे हैं और इस तरह स्थानीय लोगों के दिल में उनका रौब डालने की कोशिश कर रहे हैं।
तकफीरियों की से इस्राईल की नौकरी के कुछ उदाहरण
1. इस्राईल की सीमाओं को सुरक्षित बनाना
सीरिया से शुरू होकर इराक़ को अपनी चपेट में लेने और अन्य इस्लामी देशों पर भी अपना क़ब्ज़ा जमाने का इरादा जाहिर करने वाले तकफीरी आतंकवादी गुट आईएसआईएल की ताक़त में दिन प्रतिदिन बढ़ोत्तरी ने उसके पीछे अंतर-राष्ट्रीय साम्राज्यवादी ताकतों का हाथ होने को साबित कर दिया है। वास्तविकता यह है कि अमेरिका और इस्राईल की ग़ासिब ज़ायोनी हुकूमत इस तकफीरी समूह की संस्थापक और सऊदी अरब, क़तर और तुर्की जैसे देशों उसको अमली रूप देने वाले हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान अमेरिका और इस्राईल ने एक सोची समझी योजना के तहत क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की है। उन्होंने तकफीरी आतंकवाद की शुरुआत से मुसलमानों के भीतर सांप्रदायिक जंगें भड़का कर यहूदी -इस्लामी झगड़े को इस्लामी-इस्लामी झगड़े की आड़ में छिपाने की कोशिश की है। इस मैदान में इस्राईल को एक हद तक सफलता मिली है लेकिन लंबी अवधि में उसकी यह रणनीति भी नाकामी का शिकार हो जाएगी।
2. ग़ज़्ज़ा के खिलाफ़ इस्राईल की 50 दिवसीय आक्रामकता के दौरान चुप्पी साधे रहना और इस्लामी प्रतिरोध का साथ न देना।
जैसा कि आयतुल्लाह ख़ामेनई ने अपनी स्पीच में कहा कि क्षेत्र में तकफीरी षड़यंत्र के जन्म से पहले तक मुसलमानों के लिए पहला मुद्दा फ़िलिस्तीन था लेकिन तकफीरी गुट आईएसआईएल के जन्म के बाद इस्लामी दुनिया का ध्यान अपनी आंतरिक समस्याओं में लग गया। तकफीरी आतंकवादियों ने जिहाद जैसे पवित्र धार्मिक कर्तव्य के समझने और उसके मतलब में बदलाव करते हुए उसे कुफ़्फ़ार और इस्लाम दुश्मन तत्वों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष की बजाये शिया मुसलमानों के नरसंहार के रूप में पेश किया। तकफीरी तत्वों ने बड़े पैमाने पर मासूम और बेगुनाह मुसलमानों के नरसंहार और रसूले इस्लाम स.अ के सहाबियों और अपनी सोच के विरूद्ध सोच रखने वाली सुन्नी हस्तियों के मक़बरों को ध्वस्त कर अपनी बर्बरता का सबसे खराब उदाहरण दिया है। तकफीरी समूहों ने क़रीबी दुश्मन से मुकाबले की प्राथमिकता जैसे झूठ विश्वास के तहत सशस्त्र संघर्ष को इस्राईल की बजाये खुद मुसलमानों की ओर ही मोड़ दिया। वह वास्तव में इस्राईल के खिलाफ़ जिहाद को अपनी पहली प्राथमिकता नहीं समझते। इसी सोच के आधार पर ग़ज़्ज़ा के खिलाफ़ इस्राईल की थोपी गई 50 दिवसीय जंग के दौरान तकफीरी गिरोह दाइश (isil) ने इस्राईल के इस उत्पीड़न व अत्याचार की ज़बानी भी निंदा नहीं की। दाइश ने न केवल मज़लूम फिलिस्तीनी मुसलमानों के समर्थन की घोषणा नहीं की बल्कि फिलीस्तीनी ध्वज को आग लगाकर और पैरों के नीचे रौंद कर उसकी वीडियो बनाई और सामाजिक नेटवर्क पर अपलोड की जबकि दूसरी ओर ज़ायोनी दरिंदों द्वारा मुसलमानों के पहले क़िबले मस्जिदुल अक्सा के अपमान के खिलाफ भी एक शब्द नहीं बोले। सच्चाई यह है कि उन्हें विश्व साम्राज्यवाद से यह ड्यूटी सौंपी गई थी कि मुसलमानों का ध्यान इस्राइली अत्याचार से निकालें और उन्होंने यह काम ग़ज़्ज़ा की हालिया जंगों के दौरान बहुत अच्छे तरीके से अंजाम दिया है। तकफीरी आतंकवादी तत्वों ने शिया सुन्नी कलह फैलाकर मुसलमान उम्मत का ध्यान फ़िलिस्तीन से हटा दिया।
3. हिज़्बुल्लाह लेबनान का ध्यान बंटाने की कोशिश।
तकफीरी तत्वों ने पिछले कुछ वर्षों में इस्राईल विरोधी इस्लामी प्रतिरोध समूह “हिज़्बुल्लाह लेबनान” को सीरिया में अपने साथ व्यस्त कर रखा है। इसी तरह दाइश ने सीरिया से लेबनान के सीमावर्ती इलाकों में आतंकवादी गतिविधियों का सिलसिला शुरू कर रखा है। जबकि सच्चाई यह है कि इस समय इस्राईल का मुक़ाबला कर रहे मुजाहिद संगठनों में हिज़्बुल्लाह लेबनान का नाम शीर्ष पर है। सभी अच्छी तरह जानते हैं कि अगर इस्राईल इस्लामी दुनिया के खिलाफ़ आक्रामक कार्यवाही से कतराता है तो यह हिज़्बुल्लाह लेबनान के बहादुर मुजाहिदों के बलिदान का ही नतीजा है। तकफीरी गुट हिज़्बुल्लाह लेबनान को अपने साथ जंग में व्यस्त करके इस्राईल की सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहते हैं।
4. इस्लामी दुनिया में इस्राईल विरोधी ताक़त को कमजोर करना।
यह चीज़ कुछ अरब देशों में अच्छी तरह देखी जा सकती है क्योंकि फिलिस्तीन के खिलाफ़ इस्राईल की पिछली जंग (8 दिवसीय और 22 दिन) के दौरान इस्लामी देशों ने स्पष्ट रूप से फिलिस्तीन में इस्लामी प्रतिरोध का समर्थन किया था लेकिन हाल के 50 दिवसीय जंग के दौरान ऐसा समर्थन देखने को नहीं मिला। इसकी मुख्य वजह यह थी कि सीरिया, इराक़ और लेबनान जैसे महत्वपूर्ण अरब देशों तकफीरी षड़यंत्र के कारण अपने आंतरिक मुद्दों में व्यस्त हो चुके थे जबकि दूसरे इस्लामी देश जैसे सऊदी अरब, क़तर और तुर्की तकफीरी समूहों के समर्थन में लगे हुए थे। इसलिए तकफीरी आतंकवादी तत्वों ने न केवल इस्लामी प्रतिरोध ब्लॉक फ्रंट लाइन यानी हिज़्बुल्लाह लेबनान को अपने साथ व्यस्त करने की भी कोशिश की है बल्कि इस्लामी देशों को भी अपनी आंतरिक समस्याओं में फंसा दिया है। इस्राईल की ग़ासिब ज़ायोनी हुकूमत ने भी अवसर का फ़ायदा उठाते हुए इस्लामी देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की चुप्पी की छाया में ग़ज़्ज़ा पर धावा बोल दिया और बेगुनाह फिलिस्तीनी बच्चों और महिलाओं का नरसंहार शुरू कर दिया। ज़ायोनी हुकूमत इसी चुप्पी और लापरवाही से फ़ायदा उठाते हुए हाल ही में मुसलमानों के पहले क़िबले मस्जिदुल अक्सा का अपमान किया है और अधिकृत फ़िलिस्तीन को यहूदी राज्य बनाने का ऐलान कर दिया है।
5. अंतर राष्ट्रीय पर इस्लामी प्रतिरोध का चेहरा बिगाड़ने की कोशिश।
हाल ही में दाइश के समर्थक मिस्र के मुफ्ती ने यह ऐलान किया है कि ग़ज़्ज़ा के फिलिस्तीनी मुजाहिदों ने ईरानी मिसाईलों के माध्यम से इस्राईल के मज़लूम नागरिकों का नरसंहार किया है जो निंदनीय है और इसके बदले में इस्राईल ग़ज़्ज़ा पर हवाई हमले करने पर मजबूर हो गया। इस मुफ्ती ने ग़ज़्ज़ा में सक्रिय फिलिस्तीनी मुजाहिदों को शिया बताकर उनकी हर प्रकार की मदद को हराम कह दिया।  दाइश के समर्थक मुफ़्तियों की ओर से इस तरह के फ़त्वों से तकफीरी समूह की सोच का अच्छी तरह अनुमान लगाया जा सकता है और यह भी समझा जा सकता है कि वह इस्लामी प्रतिरोध संगठनों के बारे में क्या राय रखते हैं और उन्होंने ग़ज़्ज़ा के खिलाफ़ हालिया इस्राईली आक्रामकता के मुक़ाबले में में ऐसा रुख क्यों अपनाया?
नतीजा:
तकफीरी आतंकवादी गुट ने फ़िलिस्तीन और मुसलमानों के पहले क़िबले मस्जिदुल अक्सा के मुद्दे को इस्लामी दुनिया की पहली प्राथमिकता से हटाकर इस्लामी देशों को अपनी आंतरिक समस्याओं में उलझाने की कोशिश की है। इसी तरह तकफीरी तत्वों ने अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर इस्लामोफ़ोबिया फैलाने और दुनिया वालों को इस्लाम से घृणित करने की कोशिश की है। वर्तमान समय में यह गिरोह दाइश, अलनुस्रह फ्रंट आदि नामों से सक्रिय हैं और हो सकता है भविष्य में किसी और नाम से सामने आयें। यहाँ इस महत्वपूर्ण विषय की ओर इशारा करना ज़रूरी है कि तकफीरी गिरोह भी अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवाद शक्तियों की पैदावार हैं जिनके कुछ ख़ास उद्देश्य हैं और विश्व साम्राज्यवाद ताक़तें अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ऐसे गिरोह बनाती आई हैं और भविष्य में भी बनाती रहेंगी जो वांछित लक्ष्यों के पूरा होने के बाद पुराने टिशू पेपर्ज़ की तरह दूर फेंक दिए जाते हैं। जब तक यह गुट इस्राईल के हितों की पूर्ति के लिए सक्रिय रहेंगे अमेरिका और पश्चिमी देश भी उनका समर्थन करते रहेंगे। एक अन्य महत्वपूर्ण प्वाइंट यह है कि तकफीरी षड़यंत्र को ख़त्म करने का एकमात्र रास्ता इस्लामी दुनिया में एकता और गठबंधन के माहौल को ईजाद करना है।


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