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Code : 64694
Date of publication : 16/12/2014 8:34
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मौलाना कल्बे जव्वाद

इमाम हुसैन (अ) की क़ुरबानी इंसानियत को बचाने के लिए थी।

कुछ तथाकथित मुसलमान जैसे सलमान रुश्दी या बंगला देशी लेडी एक ओर क़ुरआन को पुरानी हो चुकी किताब कहकर रिजेक्ट करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं लेकिन क़ुरआन ने कुछ ऐसी बातें बता दीं जिससे आज की साइंस भी हैरान है।


विलायत पोर्टलः एक ज़माना था जब सभी साइंटिस्टों को घर्म का विरोधी बताकर फांसी दे दी जाती थी, मगर क़ुरआन वह अकेली किताब है जिसने हमेशा साइंस को बढ़ावा दिया। इस दौर में कुछ तथाकथित मुसलमान जैसे सलमान रुश्दी या बंगला देशी लेडी एक ओर क़ुरआन को पुरानी हो चुकी किताब कहकर रिजेक्ट करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं लेकिन क़ुरआन ने कुछ ऐसी बातें बता दीं जिससे आज की साइंस भी हैरान है।
इन विचारों को आज महदी विला में आयोजित सालाना मजलिस में मौलाना कल्बे जव्वाद ने व्यक्त किया। मौलाना ने क़ुरआन पर विस्तार से रौशनी डालते हुए कहा कि क़ुरआन में ख़ुदा फ़रमाता है कि हमने हर चीज़ को जोड़े से पैदा किया है। हालांकि पिछले ज़माने में उलमा इसकी जो व्याख्या करते थे वह यह कि जोड़े से तात्पर्य चांद-सूरज, रौशनी और अंधेरा, ज़मीन व आसमान आदि हैं। लेकिन क़ुरान की व्याख्या यहां नही रुकी और आगे बढ़ी कि क़ुदरत ने जब जोड़े बनाए तो एक को तुलनात्मक रुप से कम रखा और दूसरे को अधिक लेकिन जिसे कम रखा उसे कुछ ऐसी विशेषता दे दी जिससे वह ज़्यादा वाले से लज्जित न हो।
जैसे आसमान को ज़मीन से ऊंचा ऱक्खा मगर ज़मीन को कुछ ऐसे महान लोगों और शख़्सियतों से नवाज़ा कि आसमान वाले ज़मीन पर आने को गर्व की बात समझने लगे। ऐसे ही मर्द को कुछ ज़्यादा दिया तो कुछ ऐसी बा अमल औरतें बनाईं जो कायनात की औरतों की सरदार कहलाईं। दिन को रात से कुछ अधिक रौशनी बख़्शी तो दिन को काम के लिए और रात को आराम का माध्यम बना दिया। सूरज को रौशनी तो चांद से ज़्यादा दी मगर चांद की रौशनी को ठंडक बख़्श कर उसे भी शरमिंदा होने से बचा लिया। मौलाना ने कहा कि, क़ुरआन तब तक पुरानी किताब नही हो सकता जब तक ज़मीन पर इंसानियत की ज़रुरत है।
क्योंकि क़ुरआन इंसान को इंसान बनाने के लिए आया है। क्योंकि क़ुरआन इंसान को इंसान बनाने के लिए आया है। अन्त में मौलाना ने अहलेबैते रसूल का किरदार प्रस्तुत करते हुए कहा- कि यह वह नूरानी शख़्सियतें हैं जिन्होंने पहला रोज़ा पानी से खोलकर इफ़तार एक यतीम को दे दिया, दूसरा रोज़ा पानी से खोला और इफ़्तार मिस्कीन को दे दिया, तीसरा रोज़ा भी पानी से खोला और इफ़्तार एक असीर को दे दिया, जबकि असीर ग़ैर मुसलिम हुआ करते थे अर्थात इमाम हुसैन(अ) ने यह पैग़ाम दिया कि हम किसी एक मज़हब के नही बल्कि पूरी इंसानियत की सुरक्षा के लिए आए हैं। यही वजह है कि आज हर धर्म व सम्प्रदाय के लोग इमाम हुसैन(अ) का ग़म मनाते हैं।
इमाम हुसैन(अ) ने चौदह सौ साल पहले जो महान बलिदान दिया था वह रहती दुनिया तक पूरी इंसानियत को बचाने के लिए थी इसलिए जो भी इंसान होगा वह इंसानियत के मसीहा इमाम हुसैन(अ) के ग़म में सम्मिलित ज़रूर होगा।


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