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کد خبر : 64945
تاریخ انتشار : 20/12/2014 8:40
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पाकिस्तान के पेशावर शहर में आतंकवादियों के भयानक अपराधों के कारणों की खोज

मौत की सज़ा ख़त्म किये जाने ने किस तरह आतंकवादियों की मदद की?

तालिबान से जुड़े 7 आतंकवादी एक स्कूल और युनीवर्सिटी की पिछली दीवार से कि जिसको खैबर पुख़तोनख्वाह राज्य के केंद्र, पेशावर शहर के सैन्य क्षेत्र में सेना चला रही है दाख़िल हुये, आतंकवादियों ने स्कूल में प्रवेश करने के लिए अपनी कार को आग लगा दी और जिस समय सुरक्षाकर्मी और अन्य लोग आग बुझाने में लगे हुए थे, वह एक सीढ़ी के माध्यम से जो अपने साथ लाये थे, स्कूल के भीतरी परिसर में पहुंचे और एक अमानवीय अपराध किया जिससे पूरी दुनिया हिल कर रह गई।


विलायत पोर्टलः इस समय पाकिस्तान के सारे अधिकारियों को चाहिए कि देश के अंदर से तकफ़ीरित, वहाबियत और आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए ठोस इरादा बना लें, केवल कुछ आतंकवादियों को मार देने से देश में शांति स्थापित नहीं होगी। बल्कि उन आतंकवादियों की चिंतनशैली और सोच की नींव को सुखाने और उनके असली केन्द्रों को ख़त्म करने की कोशिश की जाए कि जो बच्चों और महिलाओं की हत्या करने का फ़त्वा जारी करते हैं।
वास्तव में यह केन्द्र ही हैं जो कारण बनते हैं कुछ बेवक़ूफ और बहुत कम धार्मिक सूचना रखने वाले जवान रसूलुल्लाह स.अ और हूरों व अपसराओं के साथ मुलाक़ात और जन्नत के बहाने ऐसे बुरे, अमानवीय और गैर इस्लामी काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के पेशावर सहर में अत्यंत भयानक व अमानवी आतंकी घटना को हुए दो दिन गुजरे हैं। पाकिस्तानी तालिबान से जुड़े 7 आतंकवादी एक स्कूल और युनीवर्सिटी की पिछली दीवार से कि जिसको खैबर पुख़तोनख्वाह राज्य के केंद्र, पेशावर शहर के सैन्य क्षेत्र में सेना चला रही है दाख़िल हुये, आतंकवादियों ने स्कूल में प्रवेश करने के लिए अपनी कार को आग लगा दी और जिस समय सुरक्षाकर्मी और अन्य लोग आग बुझाने में लगे हुए थे, वह एक सीढ़ी के माध्यम से जो अपने साथ लाये थे, स्कूल के भीतरी परिसर में पहुंचे और एक अमानवीय अपराध किया जिससे पूरी दुनिया हिल कर रह गई।
इस स्कूल में लगभग 1000 छात्र थे कुछ आतंकवादी कि जो विस्फोट से सुरक्षित रखने वाली जैकेट पहने हुए थे वह सीधे कक्षाओं में दाख़िल हुये और छात्रों पर गोलियों की बौछार कर दी। इस नरसंहार में 141 व्यक्तियों कि जिन में 132 छोटे बच्चे थे मारे गए। पाकिस्तान की सूचना संगठनों की रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादी छात्रों से उनके नाम और उनके मां बाप के नाम पूछते थे, शहीद होने वालों में से कुछ के सिर भी काट दिए गए और सुरक्षाकर्मियों में से एक व्यक्ति की पत्नी को इन आतंकवादियों ने बच्च्चों के सामने आग लगा दी।
इस तरह के भयानक अपराधों की इंसानियत के इतिहास में कम ही मिसालें मिलती हैं। यह कौन सा विश्वास है कि जिसकी धर्म विरोधी और अमानवीय साम्राज्यवादी साहित्य के माध्यम से भी सही ठहराना संभव नहीं है, लेकिन तकफीरी उसे इस्लाम के नाम पर और जेहाद के पवित्र नाम पर करते हैं। कुछ विश्लेषक 16 दिसंबर के चुनाव को भी इस अपराध के अंजाम देने में महत्वपूर्ण बता रहे हैं। यह वह दिन है जब बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग हुआ था और उसने अपनी आज़ादी का झंडा फहराया था।
माना जा रहा है कि आतंकवादियों की ओर से इस दिन का चयन, पाकिस्तान की सरकार और जनता के लिए एक संदेश है कि इस देश को विभाजित करके अपनी मर्जी से उसका एक नया नक्शा बनाना चाहते हैं। इस दिन का चयन, हमारे मन में यह संदेह डालता है कि नये मध्यपूर्व की योजना बनाने वाले और आईएसआईएस और तालिबान आदि के नाम से वहशी तकफीरी आतंकवादियों को जन्म देने वाले भी अपने आपको इस तरह के अमानवीय अपराधों से बरी नहीं कर सकते हैं। दूसरी ओर ऐसा मालूम होता है कि यह दुर्घटना पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को भी एक नए चरण में ले जायेगी। वह बयान सुरक्षा अधिकारियों और खास कर सैन्य प्रवक्ताओं की ओर से सामने आ रहे हैं इसी दावे की ओर इशारा करते हैं।
पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार जो मुस्लिम लीग नवाज़ शरीफ़ के माध्यम से चल रही है, सऊदी अरब द्वारा समर्थित है और देश के आम लोगों में इस सरकार का तालिबान और उनसे जुड़े चरमपंथियों का समर्थक होना और उनके संबंध में नर्म व्यवहार रखना बहुत मशहूर है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद नवाज शरीफ ने कहा था कि आतंकवादियों ने हमारे बच्चों को मारा है। पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता ने अपने बयान में कहा है: अगर कोई यह कहता है कि इस दुर्घटना में उसके बच्चे मारे गए हैं तो फिर चाहिए कि राजनीतिक केन्द्र और राष्ट्र, आतंकवादियों के खिलाफ संयुक्त स्टैंड अपनायें।
अब समय आ गया है कि जो लोग पाकिस्तान में चरमपंथी समूहों खासकर तालिबान के संबंध में नर्म पक्ष रखते हैं अब वह अपने स्टैंड पर दोबारा नजर करें और इंसान दुश्मन मौजूद के खिलाफ मजबूत स्टैंड लें। एक और गंभीर समस्या कि जो कई साल से इंडायरेक्टली पाकिस्तान में आतंकवादियों की समर्थन कर रही है वह पूरे देश में मौत की सज़ा पर प्रतिबंध है। पिछली कई हुकूमतों के दौर से पश्चिम के दबाव के कारण पाकिस्तान में मौत की सज़ा का कानून होने के बावजूद, राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से उसे प्रतिबंधित किया जाता रहा है और यह काम आतंकवादियों के हौसले बढ़ा देता है। इस समय देश की जेलों में 8000 अपराधी ऐसे हैं कि जिन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई है कि इनमें से बड़ी संख्या में गिरफ्तार किए गए आतंकवादी हैं लेकिन अस्थायी तौर पर बने कानून की वजह से वह अपने किये की सज़ा तक नहीं पहुंचे हैं।
पाकिस्तानी सेना ने हालिया कार्रवाई में देश के अंदर तालिबान से जुड़े 3000 आतंकवादी गिरफ्तार किए गए हैं, जो बहुत सी आतंकवादी घटनाओं ख़ास कर कुवैटा और कराची में बम धमाकों में कि जिनके परिणाम स्वरूप सैकड़ों लोगों मारे गये हैं, शामिल थे लेकिन अब तक उन्हें सजा नहीं मिली है ऐसा लगता है कि जब तक यह कानून जो मौत की सज़ा न दिए जाने पर आधारित है मौजूद रहेगा आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाएगी।
इसलिये पाकिस्तान सरकार को चाहिए कि देश के अंदर से तकफ़ीरित, वहाबियत और आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प कर लें। केवल कुछ आतंकवादियों को मार देने से देश में शांति स्थापित नहीं होगी। बल्कि उन आतंकवादियों की चिंतनशैली और सोच की नींव को सुखाने और उनके असली केन्द्रों को ख़त्म करने की कोशिश की जाए कि जो बच्चों और महिलाओं की हत्या करने का फ़त्वा जारी करते हैं। वास्तव में यह केन्द्र ही हैं जो कारण बनते हैं कुछ बेवक़ूफ और बहुत कम धार्मिक सूचना रखने वाले जवान रसूलुल्लाह स.अ और हूरों व अपसराओं के साथ मुलाक़ात और जन्नत के बहाने ऐसे बुरे, अमानवीय और गैर इस्लामी काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं।


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