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Date of publication : 20/12/2014 18:27
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आरिफ़ मोहम्मद ख़ान

पेशावर जैसी घटनाएं, इस्लामी शिक्षाओं से दूरी का नतीजा।

पेशावर में हुई बर्बर घटना के बाद जब पूर्व केन्द्रीय मन्त्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ान से उनके विचार पूछे गए तो उन्होंने कहा यह घटना शर्मिन्दिगी के अलावा कुछ नही।



विलायत पोर्टलः पेशावर में हुई बर्बर घटना के बाद जब पूर्व केन्द्रीय मन्त्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ान से उनके विचार पूछे गए तो उन्होंने कहा यह घटना शर्मिन्दिगी के अलावा कुछ नही। उन्होंने कहा कि हम दुनिया में इकलौती क़ौम हैं जिनके यहां केवल अक़ीदे के आधार पर लोगों की हत्या की जाए और उसको सही ठहराया जाए। कहां तो क़ुरान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि अगर एक बेगुनाह इंसान की हत्या की तो पूरी इंसानियत की हत्या की। हमारे लिए तो शरीयत क़ुरान है लेकिन जो कुछ हो रहा है यह सब हमारी फ़िक़ह (धर्मशास्त्र) की किताबों में मौजूद है।
उन्होंने कहा जो लोग अमानवीय काम कर रहे हैं उनको ऐसी तालीम कहां से मिल रही है इसकी खोजबीन की जानी चाहिए। खोज के बाद पता चल जाएगा कि कौन उनके आईडियल हैं और उन्होंने यह अमानवीय काम करने की सीख कहां से प्राप्त की है। आरिफ़ मोहम्मद खान ने बताया कि मैं बुलंदशहर के जिस गांव का रहने वाला हूं वहां पर सभी अहलेसुन्नत हैं और वह सब मोहर्रम मनाते हैं और ताज़िएदार हैं। वहां से बीस किलोमीटर दूरी पर एक गांव है जहां शिया हज़रात रहते हैं। लेकिन वहां पर हमने किसी तरह का शिया सुन्नी तनाव नही देखा। मैं बचपन में ही वहां से चला आया और मेरी एजूकेशन का अधिकतर हिस्सा अलीगढ़ में पूरा हुआ। जहां मेरा नज़रिया शियों के ख़िलाफ़ वैसा बना जैसा आज के बहुत से मुसलमानों का है। मुझे आरंभ से ही पढ़ने और सुन्ने का शौक था।
मैं अक्सर नक़्क़न साहब की मजलिसें भी सुनने जाया करता था, लेकिन अलीगढ़ के माहौल में पनपा मेरा यह अक़ीदा कि शिया ग़ुलू (hyperbole) करते हैं हमेशा मेरे ऊपर सवार रहा जिसकी वजह से मैं हक़ीक़त तक पहुंचने में असमर्थ रहा। 1991 में मैं लंदन में था, बुक स्टाल पर किताबें देख रहा था कि अचानक मौलाना आज़ाद की किताब “शहादत-ए-इमाम हुसैन” पर नज़र पड़ी। अगर किसी शिया की होती तो कभी न लेता।
मौलाना आज़ाद एक तो सुन्नी ऊपर से ऐसे आलिम जिनका आज तक सभी सम्मान करते हैं यह सोचकर किताब ले ली। घर ले कर आया, किताब को उस रात कई बार पढ़ा, और जब पढ़ता था तो आंखों से आंसू जारी हो जाते थे यह सोचकर कि क्या हम उनकी आल से हैं जिन्होंने रसूल (स) के नवासे को शहीद कर दिया था? फिर मैंने पढ़ना शुरू किया तो पता चला कि, यहां तो मामला ही सब उलटा है। शरीयत कुछ और है और फ़िक़ह की किताबें कुछ और कहती हैं। उन्होंने कहा की सारी समस्या की जड़ है इतिहास की सही जानकारी न होना है, अगर सही सही इस्लामी हिस्ट्री पढ़ा दी जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
इसलिए सोच समझ कर बड़ी बड़ी इस्लामी संस्थाओं में इस्लामिक हिस्ट्री नही पढ़ाई जा रही है। उन्होंने कहा कि लखनऊ के ही एक बहुत बड़े आलिम ने अपनी किताब में ऐसी घटना का वर्णन किया है जिसका किसी किताब में कोई हवाला नही मिलता। अब तो हद हो गई सही बुख़ारी का जिसके पास पुराना एडीशन होगा वह आज की सही बुख़ारी से मिलाकर देख ले तो उसकी आंखें खुली की खुली रह जांएगी।
उन्होंने कहा कि आज भी जो बाज़ार में सही बुख़ारी उपलब्ध है उसमें हज़रत आयशा से जो हदीस जनाबे फ़ातिमा (स) के सम्बंध में है उसे सभी मुसलमान जानते नही हैं। इसलिए एक सोची समझी साज़िश के तहत एक ख़ास फ़िरक़े की ओर से कैम्पेन चलाई गई कि बस अल्लाह अल्लाह करो इसके सिवा कुछ नही। केवल इसलिए की अगर हम शिक्षित हो गए तो कोई राज़, राज़ न रहेगा। रसूल(स) के अहलेबैत का सही स्थान क्या है यह लोगों को पता चल जाएगा। इसलिए हर इस्लामी संस्था इस्लामी हिस्ट्री पढ़ाने से बचती हैं।


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