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Date of publication : 20/12/2014 23:30
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पेशावर के स्कूल पर तालिबान के हमले की रिपोर्ट।

निःसंदेह तालिबान इस्लाम के नाम पर दरिंदगी कर रहे हैं। बहुत सी बातें लिखनी हैं मगर किसी और आर्टिकिल में। अभी तक मैं सकते में हूँ, इंसान इतना भी गिर सकता है? पूरी दुनिया ने इस घटना की निंदा की, ग़ैर मुसलमानों भी, लेकिन एक मौलवी साहब टीवी पर बैठकर तालिबान के हमले की निंदा से इंकार कर रहे थे। यह वही मौलाना साहब जिनके मदरसे की छात्राओं ने पिछले सप्ताह आईएसआईएस को पाकिस्तान आने का न्यौता दिया था।



विलायत पोर्टलः निःसंदेह तालिबान इस्लाम के नाम पर दरिंदगी कर रहे हैं। बहुत सी बातें लिखनी हैं मगर किसी और आर्टिकिल में। अभी तक मैं सकते में हूँ, इंसान इतना भी गिर सकता है? पूरी दुनिया ने इस घटना की निंदा की, ग़ैर मुसलमानों भी, लेकिन एक मौलवी साहब टीवी पर बैठकर तालिबान के हमले की निंदा से इंकार कर रहे थे। यह वही मौलाना साहब जिनके मदरसे की छात्राओं ने पिछले सप्ताह आईएसआईएस को पाकिस्तान आने का न्यौता दिया था। सरकार को और किस तरह के सूत्रधारों की तलाश है? यही लोग तो हैं जो तालिबान के सूत्रधार हैं, उन्हें हर तरह की सहायता पहुंचाते हैं और टीवी पर बैठकर इस दरिंदगी के लिए बहाने हैं।
ज़रूरी है कि ऐसे लोगों के विरुद्ध फिर से एक ऑप्रेशन किया जाये और वास्तविक “आज़ाद न्यायपालिका” के माध्यम से उनका ट्रायल किया जाये तो देखते हैं कि फिर यह कैसे बाइज्जत बरी होते हैं। उमर ख़ुरासानी हो या हकीमुल्लाह महसूद, बैतुल्लाह महसूद हो या मौलवी फ़ज़्लुल्लाह? मंगलबाग़ हो या एहसानुल्लाह एहसान, शाहिदुल्लाह शाहिद हो या मौलवी नजीर, गुल बहादुर हो या कोई और, सब ज़ुल्म व अत्याचार की कोख की पैदावार हैं। घटना इतनी गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस पर लिखने को शब्द कम पड़ गए। सोशल मीडिया पर एक पंक्ति ने हर आंख नम कर दी।
फूल देखे थे जनाज़ों प हमेशा शौकत
कल मेरी आँख ने फूलों के जनाज़े देखे।

पंक्ति में पूरी कहानी दर्ज है, 16 दिसंबर की ख़ून ख़राबे की सुबह, सूरज की फीकी फीकी किरणें ज़मीन से राज व नियाज़ कर रही थीं कि उसी क्षण वहशी दरिंदे टपके और फिर हर तरफ मौत का नाच था। तालिबान ने 144 मांओं की गोदें उजाड़ दीं। घटना, मंगलवार की सुबह पेशावर में वरस्क रोड पर स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल में हुई, एफसी की वर्दी पहने 7 सशस्त्र आतंकवादियों ने स्कूल की इमारत में प्रवेश कर छात्रों पर फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले की जिम्मेदारी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन पाकिस्तान की तहरीके तालिबान ने स्वीकार कर ली है।
संगठन के मुख्य प्रवक्ता मोहम्मद उमर ख़ुरासानी ने बीबीसी उर्दू संवाददाता रिफअतुल्लाह ओरकज़ई से बात करते हुए कहा कि “हमारे छः हमलावरों ने स्कूल में प्रवेश किया है, तालिबान के प्रवक्ता का कहना था कि यह कार्रवाई उत्तरी वजीरिस्तान में जारी सैन्य अभियान आप्रेशन ज़र्बे अज़्ब और खैबर एजेंसी में जारी ऑप्रेशन खैबर वन के जवाब में है। आतंकवादियों के प्रवक्ता ने यह स्वीकार किया कि आप्रेशन ज़र्बे अज़्ब और खैबर वन में जारी फौजी अभियानों में 500 तालिबान मारे गए हैं।
“पाकिस्तानी स्कूलों और छात्रों पर तालिबान आतंकवादियों द्वारा हमले का इतिहास हमें बताता है कि उन्होंने रौशनी और अक़्ल व तर्क के हर निशान को मिटाने की कोशिश की है। केवल 2009 से 2012 तक तालिबान ने स्वात समेत देश के अन्य भागों में स्कूलों में 800 से अधिक हमले किए, उसी से ही उनकी इल्म दुश्मनी का अनुमान लगाया जा सकता है। निःसंदेह जहां जेहालत होती है वहाँ हत्या, मारधाड़ होती है। अपने समझे हुये इस्लाम को ज़बरदस्ती पूरे समाज पर लागू करने वाले लोग कैसे एक नरम और सहिष्णुता व धैर्य की शिक्षा देने वाले दीन के प्रतिनिधि हो सकते हैं? टेढ़ी और ग़लत सोच वाले दरिंदे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रतिबंधित तहरीके तालिबान पाकिस्तान सहित पाकिस्तानी तालिबान के विभिन्न गुटों ने 1000 स्कूल जला दिए या बम धमाकों में उड़ा दिए हैं। 2011 में मौलवी इनामुल्लाह के आदेश पर तालिबान ने स्वात की छात्रा मलाला यूसफज़ई पर गोलीबारी की, जबकि उनके समर्थकों का कहना था और आज तक कह रहे हैं कि मलाला यूसफज़ई पर हमला तालिबान ने नहीं किया था, हालांकि तालिबान ने मलाला पर हमले की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली थी लेकिन तालिबान के सूत्रधारों का कहना था कि मलाला पर हमला उसके बाप ने खुद की। सवाल पूछा जा सकता है कि क्या वरस्क रोड पेशावर के स्कूल में शहीद बच्चों के मां बाप ने खुद हमला करवाया? अक़्ल से खाली लोग, तर्क व प्रमाण से बात नहीं करते हैं। वह भावनाओं के पुजारी हैं, दिखावे का शिकार, आदिवासी परंपराओं के झूठे रक्षक।
निःसंदेह तालिबान इस्लाम के नाम पर दरिंदगी कर रहे हैं। बहुत सी बातें लिखनी हैं मगर किसी और आर्टिकिल में। अभी तक मैं सकते में हूँ, इंसान इतना भी गिर सकता है? पूरी दुनिया ने इस घटना की निंदा की, ग़ैर मुसलमानों भी, लेकिन एक मौलवी साहब टीवी पर बैठकर तालिबान के हमले की निंदा से इंकार कर रहे थे। यह वही मौलाना साहब जिनके मदरसे की छात्राओं ने पिछले सप्ताह आईएसआईएस को पाकिस्तान आने का न्यौता दिया था। सरकार को और किस तरह के सूत्रधारों की तलाश है? यही लोग तो हैं जो तालिबान के सूत्रधार हैं, उन्हें हर तरह की सहायता पहुंचाते हैं और टीवी पर बैठकर इस दरिंदगी के लिए बहाने हैं। ज़रूरी है कि ऐसे लोगों के विरुद्ध फिर से एक ऑप्रेशन किया जाये और वास्तविक “आज़ाद न्यायपालिका” के माध्यम से उनका ट्रायल किया जाये तो देखते हैं कि फिर यह कैसे बाइज्जत बरी होते हैं। पर हमारे लिये सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हम हर घटना पर आपातकालीन बैठक करते हैं।
राष्ट्र के एकजुट होने का ख़ुशख़बरी सुनाई जाती है، कमेटी बनती है और कमेटी पर एक और कमेटी गठन किया जाता है और बस। लेकिन सवाल यह है कि कमेटी किस बात की और क्यों? तालिबान हमला करते हैं और इसकी जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। तालिबान के सूत्रधार सामने आते हैं, हमले के लिए बहाने खोजते हैं, सरकार पर दबाव डालते हैं कि तालिबान से बातचीत की जाये। क्या सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को अब भी तालिबान के सूत्रधारों की तलाश है? सब कुछ साफ़ है। पेशावर स्कूल पर हमले के बाद जो कुछ अंधेरे में था वह भी सामने आ गया है। राष्ट्र एकजुट है, राजनीतिक नेतृत्व भी एकजुटता का प्रदर्शन कर रही है। कुछ काम वास्तव में आपातकालीन रूप से करने के होते हैं। पहाड़ों के साथ साथ शहरों में भी एक ऑपरेशन क्लीन अप। ऐसा ऑपरेशन जो उस माइंड सेट के विरुद्ध किया जिसने तालिबानी सोच को इस्लाम की ईमेज हिंसक बनाकर पेश करना शुरू कर दी है। नासूर का इसके अलावा क्या इलाज है? कैंसर के फोड़े को कैसे खत्म किया जाता है?
आख़िर में हुकूमत आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई करती है, क्या केवल आतंकवादियों के विरुद्ध कार्यवाही काफ़ी है? या उनका समर्थन करने वालों के विरुद्ध भी कार्यवाही ज़रूरी है? अब वास्तव में आतंकवादियों और उनके समर्थकों के विरुद्ध अंतिम और निर्णायक कार्रवाई का समय आ गया, एक पल की देरी भी विनाशकारी होगी। हम सभी भारतीय अपने पाकिस्तानी भाईयों के ग़म में बराबर के शरीक हैं लेकिन पाकिस्तान सरकार से आतंकवाद के विरूद्ध ठोस कार्यवाही की मांग करते हैं और पाकिस्तानी हुकूमत को समझ लेना चाहिये कि आस्तीन में सांप पालने का क्या परिणाम होता है।


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