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Date of publication : 21/12/2014 0:14
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इमाम हसन अ. के अंतिम संस्कार के अवसर पर घटित होने वाली दर्दनाक घटना।

मरवान ने हज़रत की शहादत की ख़बर मुआविया को दी और कहा बनी हाशिम हसन इब्ने अली अ. को पैग़म्बर के पहलू में दफ़्न करना चाहते हैं, लेकिन जब तक मैं ज़िंदा हूँ वह अपने इस उद्देश्य में कामयाब नहीं होंगे, इस तरह इमाम हसन अ. के अंतिम संस्कार के अवसर पर दिल दुखा देने वाली दर्दनाक घटना घटित हुई।



विलायत पोर्टलः मरवान ने हज़रत की शहादत की ख़बर मुआविया को दी और कहा बनी हाशिम हसन इब्ने अली अ. को पैग़म्बर के पहलू में दफ़्न करना चाहते हैं, लेकिन जब तक मैं ज़िंदा हूँ वह अपने इस उद्देश्य में कामयाब नहीं होंगे, इस तरह इमाम हसन अ. के अंतिम संस्कार के अवसर पर दिल दुखा देने वाली दर्दनाक घटना घटित हुई। शाम (सीरिया) के शासक मुआविया ने षड़यंत्र द्वारा पैग़म्बरे अकरम स.अ के दूसरे उत्तराधिकारी और शियों के दूसरे इमाम हज़रत इमाम हसने मुजतबा अलैहिस्सलाम को उनकी पत्नी अशअस इब्ने क़ैस की बेटी जादह द्वारा ज़हर दिलाकर शहीद करवा दिया।
सन 63 हिजरी में जिस समय हर्रा की घटना में मदीने को लूटा गया इस औरत का घर भी वीरान कर दिया गया लेकिन अपने पति को शहीद करके जो उसने सेवा की थी उसको देखते हुये उसका माल व दौलत उसे वापस कर दिया गया। इतिहास की बहुत सारी किताबों ने मुआविया के षड़यंत्र से जादह द्वारा इमामे हसन मुजतबा को शहीद करवाए जाने की घटना को बयान किया है। (1)
इब्ने हमदून के अनुसार इमाम हसन अ. को ज़हर देने के बदले में जादह को एक लाख सिक्के (दिरहम) दिए जाने वाले थे बाद में उसने एक कुरैशी के साथ शादी की और एक बच्चे को भी जन्म दिया।(2) दूसरे बच्चे जब उस बच्चे को देखते थे तो कहते थे “یابن مسممۃ الازواج''” ऐ उस औरत के बेटे कि जिसने अपने पति को ज़हर दिया। (3) इमाम हसन अ. ज़हर दिये जाने के बाद चालीस दिन तक बीमार रहे और फिर शहीद हो गए। (4) उम्मे बकर मसूर की बेटी कहती है इमाम हसन अ. को कई बार ज़हर दिया गया लेकिन हर बार आप बच जाते थे यहां तक कि आख़री बार जो ज़हर दिया गया वह इतना सख्त था कि इमाम हसन अ. के जिगर के टुकड़े कट कट कर उनके मुंह से बाहर आ गए। (5)
इमाम हसन मुजतबा अ. की शहादत के बाद आपकी वसीयत के अनुसार बनी हाशिम ने यह चाहा कि उनको रसूले ख़ुदा स.अ. की क़ब्र के पहलू में दफ़्न किया जाये लेकिन जनाब आयशा ने यह तर्क पेश करते हुए कि (بیتی لا آذن فیہ) यह मेरा घर में अनुमति नहीं देती, वहाँ दफ़्न नहीं करने दिया। (6) मरवान उस समय मदीना का शासक था, उसने भी ऐलान किया कि वह ऐसा नहीं होने देगा। इमाम हसन अ. ने पहले ही कह दिया था कि अगर कोई मुश्किल पेश आये तो उन्हें बक़ीअ में दफ़्न कर दिया जाए। (7) इमाम को दफ़्न करने के लिए जब पैग़म्बरे इस्लाम स.अ की क़ब्र के पास ले गए तो जनाब आयशा ने कहाः “ھذا الامر لا یکون ابدا” ऐसा कभी नहीं होगा। (8)
अबू सईद खदरी और अबू हुरैरह ने मरवान से कहा: क्या हसन इब्ने अली अ. को उनके नाना के पहलू में दफ़्न नहीं होने दोगे हालांकि रसूले ख़ुदा स.अ. ने उन्हें जन्नत के जवानों का सरदार कहा है, मरवान ने उनका मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा अगर आप जैसे लोग पैगम्बर की हदीसें बयान न करते तो हदीसें बर्बाद हो जातीं। (9) मोहम्मद इब्ने हनफ़िया कहते हैं जब इमाम हसन अ. की शहादत हुई तो सारा मदीना अज़ादारी में डूब गया और सभी रो रहे थे। मरवान ने हज़रत की शहादत की ख़बर मुआविया को दी और कहा बनी हाशिम हसन इब्ने अली अ. को पैग़म्बर के पहलू में दफ़्न करना चाहते हैं, लेकिन जब तक मैं ज़िंदा हूँ वह अपने इस उद्देश्य में कामयाब नहीं होंगे।
इमाम हुसैन अ., पैग़म्बर स.अ की क़ब्र के पास तशरीफ़ ले गए और कहा उस जगह को खोदें, सईद इब्ने आस कि जो मदीने का शासक था वहां से चला गया लेकिन मरवान ने बनी उमय्या को उकसाया और वह सब हथियार लेकर आ गए। मरवान ने कहाः ऐसा हरगिज़ नहीं होगा, इमाम हुसैन अ. ने कहा तुमसे क्या मतलब है क्या तुम इस शहर के हाकिम हो? मरवान ने कहा, लेकिन जब तक मैं ज़िंदा हूँ ऐसा करने की अनुमति नहीं दूंगा। इमाम हुसैन ने उन लोगों से जो हल्फ़ुल्फ़ज़ूल के अवसर पर बनी हाशिम के साथ थे, मदद मांगी।
इस अवसर पर बनी तीन, बनी ज़ोहरा, बनी असद और बनी जऊबह के लोग सशस्त्र हो गए। इमाम हुसैन अ. और उनके मानने वालों के पास झंडे थे और मरवानियों के पास भी और इन दोनों के बीच तीर भी चले। इमाम हुसैन अ. ने इमाम हसन अ. की वसीयत के अनुसार जिसमें आपने कहा था कि अगर खून ख़राबा होने की संभावना हो तो उन्हें बकीअ में दफ़नाया जाए, आपको बक़ीअ में दफ़ना दिया। (10) इतिहास कि किताबों में मिलता है कि मरवान जो उस समय मुआविया द्वारा बर्ख़ास्त किया जा चुका था, अपनी इस कार्यवाही से चाहता था कि मुआविया को मना ले। (11) मरवान ने इमाम को पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के पहलू में दफ़्न किए जाने की राह में बाधा डालने के बाद इस खबर को बड़ी ख़ुशी खुशी लिख कर मुआविया के पास भेजा। (12) उसने लिखा था: क्यों उस्मान के हत्यारे का बेटा पैग़म्बर के पहलू में दफ़्न हो। (13) इसमें कोई शक नहीं कि मरवान बनी उमय्या का सबसे नापाक चेहरा है और जब तक वह मदीने का हाकिम था अपनी नापाक ज़बान से हज़रत अली अ. और बनी हाशिम को गाली दिया करता था।
एक रिवायत के अनुसार इमाम हसन अ. की शहादत, रबीउल अव्वल सन 49 हिजरी में हुई, एक और रिवायत के अनुसार रबीउल अव्वल सन 50 हिजरी में अपनी शहादत हुई। (14) लेकिन सही यही है कि आपकी शहादत सन 49 हिजरी में हुई। जिस ज़माने में इमाम की शहादत हुई बनी हाशिम ने कुछ लोगों को मदीने के विभिन्न स्थानों और उसके आसपास की ओर रवाना किया ताकि अंसार को इस घटना के बारे में बता दें। कहा जाता है कि एक आदमी भी अपने घर में नहीं रुका (15) बनी हाशिम की औरते लगातार एक महीने तक इमाम की मजलिस व अज़ादारी करती रहीं। (16) तबरी ने इमाम बाक़िर अ. के हवाले से लिखा है कि मदीने के लोगों ने सात दिनों तक पैगम्बरे इस्लाम स.अ. के नवासे की शहादत का ग़म मनाया और उन्होंने बाजार बंद रखे। (17) तबरी ने लिखा है कि इमाम हसन अ. के अंतिम संस्कार में बक़ीअ में इतनी भीड़ थी कि तिल धरने की भी जगह नहीं थी। (18)
इमाम की शहादत की ख़बर ने बसरा के शियों को भी दुखी कर दिया। (19) इमाम हसन मुजतबा अ. की शहादत के बाद कूफ़े के शियों ने संवेदना पर आधारित एक चिट्ठी इमाम हुसैन अ. की सेवा में रवानी की। इस चिट्ठी में लिखा था कि इमाम की मौत पूरी उम्मत के लिए और आपके लिए और खासकर उनके शियों के लिए एक बड़ी मुसीबत है इन शब्दों से पता चलता है कि शिया और यहां तक कि शिया शब्द 50 हिजरी से पहले वुजूद में आ चुका था। उन्होंने इस चिट्ठी में इमाम हसन मुजतबा अ. को “علم الھدیٰ” और “نور البلاد” जैसी उपाधियों से याद किया था। वह इंसान कि जिनसे दीन को मज़बूत करने और अच्छे व नेक लोगों की चरित्र को दोबारा ज़िंदा करने की उम्मीद थी, उन्होंने उम्मीद जताई कि अल्लाह तआला इमाम हुसैन अ. का अधिकार उन्हें वापस दिलाएगा। (20)
रिफ़रेंसः
(1) तरजुमा-ए-अल-इमामुल हुसैन इब्ने साद, पेज 175-176, अंसाबुल अशराफ़, भाग 3, पेज 55-88,।
(2) अल-तज़किरतुल हमदूनिया भाग 9 पेज 293-294
(3) अंसाबुल अशराफ़ भाग 3 पेज 59
(4) तरजुमा-ए-अल-इमामुल हुसैन इब्ने साद, पेज 176
(5) अल-मुंतख़ब मिन ज़ैलिलमज़ील पेज 514
(6) तारीख़ुल यअकूबी भाग 2 पेज 225
(7) अंसाबुल अशराफ़ भाग 3 पेज 61-64
(8) तरजुमा-ए-अल-इमामुल हुसैन इब्ने साद, पेज 184
(9) अंसाबुल अशराफ़ भाग 3 पेज 65
(10) तरजुमा-ए-अल-इमामुल हुसैन इब्ने साद, पेज 177-179
(11) पिछला रिफ़रेंस पेज 180
(12) पिछला रिफ़रेंस पेज 188
(13) पिछला रिफ़रेंस पेज 183।
(14) अंसाबुल अशराफ़. भाग 3 पेज 66, अल-इमाम हसन का अनुवाद, इब्ने साद पेज 183, 189, 190
(15) अल-इमाम हसन का अनुवाद, इब्ने साद पेज 181, अल-इमाम हसन का अनुवाद अनुवाद पेज 371
(16) अल-इमाम हसन का अनुवाद, इब्ने साद पेज 182, अल-इमाम हसन का अनुवाद अनुवाद पेज 338
(17) अल-इमाम हसन का अनुवाद, इब्ने साद पेज 182
(18) अल-मुंतख़ब मिन ज़ैलिलमज़ील पेज 514, अलमुस्तदरक अलस् सहीहैन, भाग 3 पेज 173, अल-इमाम हसन का अनुवाद इब्ने साद पेज 182, अल-इमाम हसन का अनुवाद इब्ने असाकिर, पेज 372।
(19) मुख़तसर तारीख़े दमिश्क़ भाग 5 पेज 224।
(20) तारीख़ुल यअकूबी भाग 2 पेज 228।
(21) तारीख़े सियासी इस्लाम (तारीख़े ख़ुल्फ़ा), रसूल जाफ़रयान बाग 2, पेज 399।


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