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Date of publication : 8/7/2015 18:15
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रमज़ानुल मुबारक -6

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल लाहो अलैहि वे आलेही व सल्लम फ़रमाते हैं जब भी तुम में से कोई दुआ करे तो सबके लिए करे क्योंकि ऐसा करने से दुआ के क़ुबूल होने की संभावना बढ़ जाती है। अल्लाह ने दुआ का हुक्म देते हुए कहा है कि जो लोग दुआ करने से मुंह मोड़ेंगे उन्हें मैं जल्दी ही जहन्नम में डाल दूंगा। इससे यह पता चलता है कि दुआ एक ऐसी चीज़ है जिसे अल्लाह बहुत पसंद करता है।


विलायत पोर्टलः पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल लाहो अलैहि वे आलेही व सल्लम फ़रमाते हैं जब भी तुम में से कोई दुआ करे तो सबके लिए करे क्योंकि ऐसा करने से दुआ के क़ुबूल होने की संभावना बढ़ जाती है। अल्लाह ने दुआ का हुक्म देते हुए कहा है कि जो लोग दुआ करने से मुंह मोड़ेंगे उन्हें मैं जल्दी ही जहन्नम में डाल दूंगा।
इससे यह पता चलता है कि दुआ एक ऐसी चीज़ है जिसे अल्लाह बहुत पसंद करता है। यही नहीं, दुआ अल्लाह को इतनी पसंद है कि जो लोग दुआ करने से मुंह मोड़ेंगे उन्हें वह जहन्नम में डाल देगा। जिस तरह से इंसान को मकान की छत पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों की ज़रूरत होती है उसी तरह अल्लाह तक पहुंचने की सीढ़ी दुआ है। दुआ वह साधन है जिसके माध्यम से इंसान अपने परवरदिगार को पुकारता है, कमाल व परिपूर्णता के शिखर को तय करता है और अपने परवरदिगार के क़रीब हो जाता है।
दुआ के महत्व के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही वसल्लम कहते हैं, "बेहतरीन इबादत दुआ है। जब अल्लाह किसी बंदे को दुआ करने की कृपा प्रदान करता है तो वह उस बंदे की ओर अपनी कृपा व दया का दरवाज़ा खोल देता है। निःसन्देह, दुआ करने वाला इंसान कभी बर्बाद नहीं होगा। "पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. की हदीस से स्पष्ट है कि जो इंसान दुआ करता है वह वास्तव में दुआ व कृपा के अल्लाह के दरवाज़ा को खटखटाता है और इंसान का परवरदिगार इतना बड़ा दानी है कि जिसकी कल्पना उसकी समस्त रचनाएं भी नहीं कर सकतीं। यह दुनिया उसके दान का छोटा सा उदाहरण है। सूरज, चांद, आसमान, तारे तथा पानी सहित दुनिया की हर एक चीज़ उसी के दान का नतीजा है। वह मांगने और न मांगने वाले दोनों तरह के इंसानों को देता है। उसके दरवाज़े से कोई ख़ाली हाथ वापस नहीं लौटता। वह कितना भी किसी को दे दे उसके ख़ज़ाने में किसी तरह की कोई कमी नहीं होती। हर इंसान जिस चीज़ का निर्माण करता है या कोई पेड़ लगाता है तो वह दूसरे लोगों की अपेक्षा अपनी बनाई हुई चीज़ या पौधे से ज़्यादा मुहब्बत करता है। इस दुनिया का रचयिता  महान अल्लाह के अतिरिक्त और कौन हो सकता है? कौन है जो अपनी रचना से ज़्यादा मुहब्बत करता है? हर माँ-बाप अपनी संतान से मुहब्बत करते हैं, चाहे वह इंसान हो या पशु-पक्षी। इन सबके भीतर अपनी संतान से मुहब्बत करने की भावना किसने पैदा की? मुहब्बत करने की यह भावना अगर नहीं होती तो क्या मां-बाप, अपनी संतान को बड़ा करने के लिए तरह तरह की कठिनाइयां सहन करते? अपनी रचना को वुजूद देने और उसे बाक़ी रखने के लिए अल्लाह ने ही माँ-बाप के अंदर मुहब्बत की भावना पैदा की है। हम सबका परवरदिगार अगर हम सबसे मुहब्बत न करता तो हमारे माँ-बाप को ही वुजूद में न लाता। यह मुहब्बत ही है जिसके कारण उसने हमारे माँ-बाप को वुजूद दिया। जब कोई बच्चा अपने मां-बाप से कोई चीज़ मांगता है तो माँ-बाप उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं तो क्या हमारा परवरदिगार, जो हमारे माँ-बाप से कहीं ज़्यादा हमसे मुहब्बत करता है। इंसान को अपनी कृपा के दरवाज़े से ख़ाली वापस कर देगा जबकि उसके मुहब्बत से माँ-बाप के मुहब्बत की तुलना नहीं की जा सकती।


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