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Date of publication : 8/7/2015 18:44
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सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान की रौशनी में

घमण्ड का ख़तरा

इससे पहले के लेक्चर में हमनें इसतेग़फ़ार के महत्व और उसकी ज़रूरत को बयान किया। अगर हम चाहते हैं कि हमें इसतेग़फ़ार (गुनाहों से माफ़ी) की तौफ़ीक़ मिले तो दो चीज़ों से जान छुड़ानी होगी- एक ग़फ़लत (असावधानी) दूसरे घमण्ड।

विलायत पोर्टलः

इससे पहले के लेक्चर में हमनें इसतेग़फ़ार के महत्व और उसकी ज़रूरत को बयान किया। अगर हम चाहते हैं कि हमें इसतेग़फ़ार (गुनाहों से माफ़ी) की तौफ़ीक़ मिले तो दो चीज़ों से जान छुड़ानी होगी- एक ग़फ़लत (असावधानी) दूसरे घमण्ड
सबसे बड़ा ख़तरा
ग़फ़लत (असावधानी) यानी यह कि इन्सान को पता ही न चले कि उससे कोई गुनाह हुआ है। बहुत से लोग गुनाह करते हैं लेकिन उन्हें पता नहीं चलता है कि वह गुनाह कर रहे हैं। झूठ बोलते हैं, दूसरों के लिये प्रोपगंडे करते हैं, ग़ीबत (पीठ पीछे दूसरों की बुराई) करते हैं, दूसरों को तकलीफ़ और नुक़सान पहुँचाते हैं, धोखा देते हैं, लोगों को गुमराह करते हैं, यह सब करते हैं लेकिन उन्हें ध्यान होता कि वह इस तरह के गुनाह कर रहे हैं। अगर कोई उन लोगों से कहे कि आप गुनाह क्यों कर रहे हैं तो इस पर हसेंगे, उसका मज़ाक़ उड़ाएंगे कि, गुनाह? कौन सा गुनाह? हमनें तो कोई गुनाह नहीं किया।
उनमें से कुछ का सवाब या अज़ाब पर की ईमान नहीं होता। कुछ का ईमान सवाब व अज़ाब पर होता है लेकिन वह ग़ाफ़िल (असावधान) होते हैं और उन्हें मालूम भी नहीं होता कि वह क्या कर रहे हैं। अगर हम सब अपने अपने गिरेबान में झाकें और अपने छोटे छोटे कामों में विचार करें तो हमें मालूम होगा कि बहुत सी जगहों पर हम भी उन ग़ाफ़िल लोगों जैसे हैं। ग़फ़लत इन्सान की बहुत बड़ी और ख़तरनाक दुश्मन है। शायद कहा जा सकता है कि इससे बड़ा ख़तरा और इससे बड़ा दुश्मन कोई भी नहीं है ग़ाफ़िल इन्सान को कभी इसतेग़फ़ार की चिंता नहीं होती। उसे यह भी याद नहीं रहता कि उसनें गुनाह किया है। वह गुनाहों में डूबा होता है लेकिन मस्त, जैसे सोया हुआ हो। इसी लिये अख़लाक़ और इरफ़ान में ग़फ़लत से बाहर निकलने को यक़ज़ा कहते हैं यानी जागना।
ग़फ़लत की अपोज़िट तक़वा (सदाचार) है। तक़वा यानी हमेशा सावधान रहना, होश में होना और ख़ुद को चेक करते रहना। ग़ाफ़िल आदमी दसियों गुनाह करता है लेकिन उसे ध्यान भी होता कि कोई गुनाह किया है लेकिन मुत्तक़ी इन्सान से अगर छोटी सी ग़लती और गुनाह हो जाए तो उसका ध्यान फ़ौरन ही उसकी तरफ़ जाता है और उसे पश्चयाताप होता है-
’’إنّ الّذین اتّقوا إذا مسّهم طائف من الشّیطان تذكّروا‘‘
जैसे ही शैतान उनके पास से गुज़रता है और शैतान की हवा उन्हें छूती है तो उन्हें मालूम हो जाता है कि शैतान नें उन्हे बहकाया है
’’ فإذا هم مبصرون‘‘
ऐसे लोगों की आँखें खुली होती हैं।
मेरे भाइयों और बहनों! यह न सोचें कि क़ुरआने मजीद की यह आयतें और यह मैसेज आम लोगों के लिये है, जी नहीं! यह सबके लिये है। उल्मा, पढ़े लिखे लोगों, बड़ी पोस्ट वालों, पैसे वालों, क़ौम के बड़े लोगों सबको होशियार रहना चाहिये कि वह असावधान नहो जाएं, यह बिल्कुल सम्भव है कि उनसे गुनाह हो लेकिन उसकी तरफ़ उनका ध्यान ही न जाए। यह बहुत बड़ा ख़तरा है। हम और आप कभी गुनाह करते हैं लेकिन हमें पता भी नहीं चलता कि हमनें गुनाह किया है इसलिये उसकी माफ़ी भी नहीं मांगते। क़यामत के दिन हमारी आँखें खुलेंगी, उस समय मालूम होगा कि हमारे आमाल की लिस्ट में ऐसे बहुत से गुनाह हैं जिनसे हम ग़ाफ़िल थे। तो मालूम हुआ कि इसतेग़फ़ार के लिये एक बहुत बड़ी रुकावट ग़फ़लत व असावधानी है।


दूसरा बड़ा ख़तरा
इसतेग़फ़ार के लिये दूसरी ख़तरनाक रुकावट घमण्ड है। इन्सान छोटा सा काम करता है तो उसे घमण्ड होने लगता है। हदीसों और दुआओं में है-
’’اَلاِغتِرَارُ بِااللہِ‘‘
यानी ख़ुदा के सामने घमण्ड करना। सहीफ़ए सज्जादिया की एक दुआ में है
’’ و َالشِّقَاءُ الأَشقَى لِمَن اغتَرَّ بَكَ‘‘
सबसे ज़्यादा दुष्ट इन्सान वह है जो ख़ुदा के सामने घमण्ड करे। घमण्डी इन्सान दो रकअत नमाज़ पढ़ ले, किसी का कोई काम कर दे, किसी ग़रीब को कुछ दे दे, या कोई भी नेक काम करे तो उसे घमण्ड होने लगता है कि उसनें बहुत बड़ा काम कर लिया है, अब उसे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। शायद ज़बान से वह यह सब न कहे लेकिन दिल में यही सोचता है।
हमें होशियार रहना चाहिये! ख़ुदा नें हमारे लिये तौबा का दरवाज़ा खोला है और उसके ज़रिये हमारे गुनाह माफ़ करने का वादा किया है इसका मतलब यह नहीं है कि गुनाह कोई छोटी चीज़ है, गुनाह सी चीज़ है जो कभी कभी इन्सान का सब कुछ बर्बाद कर देता है, इन्सान इन्सानियत की चोटी से नीचे गिर कर जानवर बन जाता है बल्कि उससे भी नीचे गिर कर जानवर बन जाता है बल्कि उससे भी गिर जाता है। यह कभी न सोचें कि गुनाह मामूली चीज़ है।
यही झूठ, ग़ीबत, यही लोगों का अपमान करना, यही ज़ुल्म, यही अत्याचार यह सब छोटी चीज़ें नहीं हैं। ख़ुदा गुनाह को इसलिये माफ़ नहीं है क्योंकि वह छोटे होते हैं बल्कि इसलिये माफ़ करता है क्योंकि ख़ुदा की ओर जाना और उससे माफ़ी मांगना ख़ुदा को पसंद है। गुनाह बहुत बुरी चीज़ है लेकिन ख़ुदा की ओर लौटना और सच्ची तौबा करना इतना ज़्यादा महत्व रखता है कि ख़ुदा गुनाह को माफ़ कर देता है। लेकिन छोटे छोटे नेक कामों पर ख़ुश होना और घमण्ड करना इस बात का कारण बनता है कि हम गुनाह ही को भूल जाते हैं और उसकी माफ़ी मागने की नौबत ही नहीं आती। इमामे सज्जाद फ़रमाते हैं-
’’فَاَمَّا أَنتَ یَا اِلٰهِى فَاهلُ أَن لَایَغتَرَّ بِكَ الصِّدّیقُونَ‘‘
इमाम फ़रमाते हैं- सिद्दीक़ीन जोकि बहुत सर्वश्रेष्ठ होते हैं और ख़ुदा के यहाँ उनकी ख़ास हैसियत होती है, उन्हें भी अपने आमाल पर घमण्ड नहीं करना चाहिये क्योंकि यह उनके लिये भी रुकावट है।


माफ़ी किस तरह मांगें?
गुनाहों की माफ़ी मांगने का भी एक ख़ास तरीक़ा है। उसके लिये बहुत सी शर्तें हैं। जिनमें से एक शर्त यह है कि यह है कि माफ़ी दिल से मांगी जाए, ऐसा न हो कि ज़बान तो गुनाहों की माफ़ी मांग रही हो लेकिन दिल साफ़ न हो। मान लीजिए कि आपका कोई ऐसा दोस्त, रिश्तेदार या बेटा बीमार है जिसे आप बहुत ज़्यादा प्यार करते हैं, रोते हैं, ख़ुदा से उसकी तंदुरुस्ती की दुआ करते हैं, ऐसे में आपका हाल क्या होता है? आप दिल से दुआ करते हैं, यह आपकी ज़बान नहीं आपका दिल बोलता है, यह आपके दिल की आवाज़ होती है। गुनाहगार गुनाहों की माफ़ी केवल ज़बान से मांग रहा हो लेकिन दिल में पश्चयाताप न हो तो वह अपना मज़ाक़ उड़ा रहा है। यह इसतेग़फ़ार नहीं है। रमज़ानुल मुबारक इसतेग़फ़ार का सबसे अच्छा मौक़ा है क्योंकि उसमें दिल भी तैयार होता है, इन्सान का ध्यान किसी हद तक ख़ुदा की तरफ़ होता है, रोज़े के कारण बहुत से गुनाहों से दूर भी होता है और ख़ुद में बदलाव भी लाना चाहता है। इसलिये उससे फ़ायदा उठाना चाहिये, यह मौक़ा बार बार नहीं आता।


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