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Code : 80247
Date of publication : 7/8/2015 10:36
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ईरान में अहले सुन्नत की मस्जिदों का प्रतिशत, शियों से ज़्यादा है।

इस्लामी उम्मत के बीच एकता, एकजुटता, सहनशीलता और आपसी सहयोग को बढ़ावा देने की जरूरत को आज हर मुसलमान महसूस कर रहा है। दुनिया के मौजूदा हालात और तेज़ी के साथ बदलते दुनिया के रंग, हर मुसलमान के अंदर यह भावना जगा रहे हैं कि जहां मुसलमानों की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में मौजूदा साख को देखते हुए क़ुरआन जैसे क़ीमती ख़ज़ाने की वास्तविक शिक्षाओं का दुनिया भर के लोगों तक पहुंना ज़रूरी है वहीं एक क़ुरआनी समाज का गठन भी बहुत ही ज़्यादा ज़रूरी है जिसे उम्मते वाहेदा (एकल राष्ट्र) कहा जा सके, जहां मुसलमानों के बीच आज एकजुटता, इस्लामी शिक्षाओं की वजह से आवश्यक है वहीं समय की महत्वपूर्ण ज़रूरत भी है।


بسم اللہ الرحمن الرحیم
وَ اعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللَّهِ جَميعاً وَ لا تَفَرَّقُوا وَ اذْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ كُنْتُمْ أَعْداءً فَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِكُمْ فَأَصْبَحْتُمْ بِنِعْمَتِهِ إِخْوانا، آل عمران 103-
(और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो और आपस में फूट न डालो.......)
ईरान में अहले सुन्नत की मस्जिदों का प्रतिशत, शियों से ज़्यादा है।
इस्लामी उम्मत के बीच एकता, एकजुटता, सहनशीलता और आपसी सहयोग को बढ़ावा देने की जरूरत को आज हर मुसलमान महसूस कर रहा है। दुनिया के मौजूदा हालात और तेज़ी के साथ बदलते दुनिया के रंग, हर मुसलमान के अंदर यह भावना जगा रहे हैं कि जहां मुसलमानों की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में मौजूदा साख को देखते हुए क़ुरआन जैसे क़ीमती ख़ज़ाने की वास्तविक शिक्षाओं का दुनिया भर के लोगों तक पहुंना ज़रूरी है वहीं एक क़ुरआनी समाज का गठन भी बहुत ही ज़्यादा ज़रूरी है जिसे उम्मते वाहेदा (एकल राष्ट्र) कहा जा सके, जहां मुसलमानों के बीच आज एकजुटता, इस्लामी शिक्षाओं की वजह से आवश्यक है वहीं समय की महत्वपूर्ण ज़रूरत भी है। ज़रूरत इसलिए और भी ज़्यादा है कि विश्व साम्राज्यवाद को जिस बात से सबसे ज़्यादा ख़तरा है वह मुसलमानों के बीच एकता व एकजुटता है। इसलिए कि साम्राज्यवाद यह अच्छी तरह जानता है कि जब भी मुसलमान एकजुट रहे हैं उसे मुंह की खानी पड़ी है जब जब मुसलमानों ने एकजुट होकर विश्व साम्राज्यवाद का मुकाबला किया है तब-तब साम्राज्यवाद का दुनिया पर राज करने का सपना चकनाचूर हो कर रह गया है।
अगर यथार्थवादी निगाह से देखा जाए तो पता चलेगा कि साम्राज्यवादियों की हुकूमत का रहस्य यही है कि “राष्ट्रों को आपस में लड़ाओ और राज करो, अफ़ग़ानिस्तान से फ़िलिस्तीन तक और अन्य इस्लामी देशों पर फ़ौजी हमले, अगर इस्लामी उम्मत ने अपने को बिखरने न दिया होता तो कभी भी साम्राज्यवाद के अंदर इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह आंख उठाकर भी किसी इस्लामी देश की ओर देखता।
साम्राज्यवाद ने कहीं भेदभाव को हवा दी और एक ही राष्ट्र की ताक़त को आपस में ही टुकड़ो में बांट दिया तो कहीं तानाशाही को खुद पाल पोस कर पनपाया, कहीं जाहेलियत को प्रचलित किया, कहीं सल्फ़ियत व वहाबियत का समर्थन करके विभिन्न मक्कारियों और बहानों से मुसलमानों को एक दूसरे से लड़ने पर तैयार किया और इस तरह अपनी शातेराना चालों द्वारा इस्लामी देशों में मौजूद भंडार को खूब बर्बाद किया और आज भी तेल की दौलत से मालामाल देश साम्राज्यावादी सैनिकों की छावनियों में परिवर्तित होकर उनके मुंह का निवाला बनी हुई हैं।
ऐसे में मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि साम्राज्यवादियों के उद्देश्य और लक्ष्य को पहचानें और हर नारा लगाने से पहले उसकी दिशा और अंदाज़े का अनुमान लगाने के साथ साथ यह भी जानने की कोशिश करें कि उसका स्रोत कहां है? आज हर समय से ज्यादा आपस में एकजुट होने की ज़रूरत है और यह जानने की ज़रूरत है कि हमारे आंतरिक मतभेदों में कहीं ऐसा तो नहीं कि दुश्मन के हाथ निहित हों और हमें ख़बर ही न हो। इसलिए एकता के साथ साथ एक दूसरे पर विश्वास, भरोसे और यक़ीन की ज़रूरत है ताकि हमारी बदगुमानियों और दुर्भावनाओं से दुश्मन को अपनी चाल चलने का मौका न मिल सके, एक दूसरे पर विश्वास के साथ प्रतिदिन की जारी समस्याओं से खुद को बाख़बर रखने की भी ज़रूरत है क्योंकि कभी कभी यही बेख़बरी अराजकता और दूरी का कारण बन जाती है और इसी बेख़बरी का परिणाम बदगुमानी के रूप में सामने आता जो पीढ़ियों तक चलता रहता है और यूँ मतभेद गहरे होते जाते हैं जब कि अगर एक दूसरे पर विश्वास और भरोसा हो तो यही विश्वास न केवल आपसी माहौल को अनुकूल बनाता है बल्कि राष्ट्र के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जैसा कि अल्लामा इक़बाल कहते हैं
यक़ीं अफ़राद का सरमाया तामीरे मिल्लत है।
यही क़ूव्वत है जो सूरतगरे तक़दीरे मिल्लत है।
तेहरान में सुन्नी भाइयों की मस्जिद की शहादत की अफ़वाह को इसी संदर्भ में देखने की ज़रूरत है कि यह उसी विश्वास को चकनाचूर करने की एक साजिश है यह खबर अपने आप में चीख चीख कर अपने झूठे होने के साथ साथ साम्राज्यवादी षड़यंत्र को भी बयान कर रही है जब कि सबको पता है की ईरान में अहले सुन्नत हज़रात की मस्जिदों की क्या स्थिति है, जिस देश में सैकड़ों अहले सुन्नत भाइयों के मदरसे हों, जिस देश की युनीवर्सिटीयों में शियों के साथ साथ सुन्नी भाई अपनी अपनी योग्यता के मानकों पर शिक्षा ले रहे हों और शिया फ़िक्ह के साथ उनके मज़हबों की फ़िक्ह की शिक्षा उन्हें दी जाती हो, जिसकी संसद में शियों की तरह अहले सुन्नत भी अपने सुझाव एवं विचार और योजनाएं प्रस्तुत करने का अधिकार रखते हों, जिस देश में उसके सुप्रीम लीडर की ओर से सुन्नी क्षेत्रों में विशेष प्रतिनिधि मौजूद हों। जो देश, मुसलमानों के बीच एकता व एकजुटता का परचमदार हो बेशक उस देश के बारे में आम लोगों में संदेह और शंका पैदा करना वह भी एक मस्जिद की शहादत को लेकर साम्राज्यवादी साज़िश को बयान करता है जबकि ईरान में अगर अहले सुन्नत मस्जिदों की समीक्षा की जाए तो लगभग सत्तर हजार (70000) कुल मस्जिदें हैं जिनमें 11 हज़ार से ज़्यादा अहले सुन्नत से सम्बंधित हैं और हर पांच सौ लोगों पर अहले सुन्नत के यहाँ एक मस्जिद है जबकि शियों के यहां साढ़े चार हजार (4500) लोगों पर एक मस्जिद है प्रतिशत के हिसाब से देखा जाए तो ईरान में अहले सुन्नत की मस्जिदों की संख्या शियों से कहीं अधिक है।
इसी तेहरान में 9 के करीब अहले सुन्नत भाइयों की मस्जिदें हैं जिनमें मस्जिदे नसीम, मस्जिदुन्नबी, सादक़ीया आदि उल्लेखनीय हैं।
ऐसे में इस्लाम दुश्मन तत्वों की ओर से अगर बिकाऊ मीडिया झूठी खबरें गढ़ कर मुसलमानों की एकता का पामाल करने की कोशिश करे और कुछ सादे और भोले भाले लोग इसका शिकार हो जायें तो यह अपने आप में एक त्रासदी से कम नहीं है।
हम मजमा-ए-मोहक़्क़ेक़ीने हिंद (INDIAN RESEARCHER'S COUNCIL) की ओर से दुनिया में खासकर भारतीय मीडिया में इस झूठी ख़बर के प्रकाशित होने और कुछ भोले भाले लोगों की ओर से दुश्मन के हाथों में बहाना देने की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं और सभी सुन्नी बुद्धिजीवियों और उल्मा से अपील करते हैं कि इस सिलसिले में क़ौम का सही मार्गदर्शन करें।
मजमा-ए-मोहक़्क़ेक़ीने हिंद (indian researcher’s council, -IRC


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