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Date of publication : 11/10/2016 9:19
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आयतुल्लाह ख़ामेनई की ज़बानी

कर्बला के शहीदों की श्रेष्ठ्ता का राज़।

कभी अल्लाह के नाम पर दिया जाने वाला एक रूपया वह काम कर जाता है जो काम दूसरे वक़्त में हज़ारों रूपये भी नहीं कर सकते। कर्बला के शहीदों की शहादत इस वजह से दूसरी शहादतों से ज़्यादा श्रेष्ठ नहीं है कि वह प्यासे शहीद किये गए क्योंकि दुनिया में, हिस्ट्री में और भी बहुत से शहीद मिलते हैं जो प्यास से शहीद हुए बल्कि उनकी शहादत की श्रेष्ठता का अस्ली और मौलिक कारण वह वक़्त और ज़माना है जब वह शहीद हुए।



विलायत पोर्टलः दुनिया में सारी शहादतें एक जैसी नहीं होती बल्कि कुछ शहादतें दूसरी शहादतों से श्रेष्ठ होती हैं। सम्भव है कोई यह कहे कि शहादत, शहादत होती है अब आदमी कैसे भी कहीं भी शहीद हो इस से क्या अंतर पड़ता है, बिल्कुल फ़र्क़ पड़ता है शहादतें समय और स्थान के हिसाब से अलग अलग होती हैं।
कभी अल्लाह के नाम पर दिया जाने वाला एक रूपया वह काम कर जाता है जो काम दूसरे वक़्त में हज़ारों रूपये भी नहीं कर सकते। कर्बला के शहीदों की शहादत इस वजह से दूसरी शहादतों से ज़्यादा श्रेष्ठ नहीं है कि वह प्यासे शहीद किये गए क्योंकि दुनिया में, हिस्ट्री में और भी बहुत से शहीद मिलते हैं जो प्यास से शहीद हुए बल्कि उनकी शहादत की श्रेष्ठता का अस्ली और मौलिक कारण वह वक़्त और ज़माना है जब वह शहीद हुए। यह घटना एक ऐसे संवेदनशील ज़माने में घटी है कि अगर उस वक़्त यह घटना न घटती तो दीन को ख़त्म कर दिया जाता। अगर कोई भी इन्सान हिजरी इतिहास की चौथी, पांचवी और छठी शताब्दी को पढ़े और उसे मालूम हो कि यज़ीद कौन था और क्यों था? और उसे पता हो कि मक्का और मदीना जहाँ क़ुरआन की आयतें उतरा करती थी उन दिनों किन हालात से गुज़र रहा था, वहाँ कैसा भ्रष्टाचार था और दीने इस्लाम किस सिचुवेशन में था तो वह बड़ी आसानी से समझ सकता है कि अगर उन दिनों इमाम हुसैन अ. यज़ीद के विरोध में न उठते तो रसूले ख़ुदा की ख़िलाफ़त के नाम पर जो बुराइयां, ज़ुल्म और कुफ़्र किया जा रहा था उसके ख़िलाफ़ फिर कोई खड़ा न होता और फिर यह हमेशा ही ऐसे रहता।मेरे लिये यह बात बिल्कुल साफ़ है कि अगर इमाम हुसैन इब्ने अली अ. विरोध में खड़े न होते तो पैग़म्बरे इस्लाम की सारी मेहनतों, जंगों, इसी तरह हज़रत अली अ. और इमामे हसन अ. की सारी मेहनतों पर पानी फिर जाता। जो काम इतना सेंसेटिव हो वह उतना ही सख़्त भी है।इमाम हुसैन अ. जानते थे कि अगर वह चुप बैठे रहे, अगर वह भी दूसरों की तरह घर पर आराम करते रहें और अत्याचार और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ वह आवाज़ न उठाऐं तो इस्लाम पर कैसा वक़्त आएगा। अगर एक ऐसी हुकूमत जिसके पास पैसा, ताक़त, फ़ौज सब कुछ हो लेकिन वह ज़ुल्म, भ्रष्टाचार और ग़लत रास्ते पर चल रही हो और हक़ के तरफ़दार चुप बैठे रहें तो इसका मतलब यह होता है कि वह उसके काम को सही समझते हैं। यह एक ऐसा गुनाह था जो उसस वक़्त बड़े बड़े लोगों नें यहाँ तक बनी हाशिम के लोगों नें भी अन्जाम दिया लेकिन इमाम हुसैन अ. कभी ऐसा नहीं कर सकते थे इसलिये वह उठ खड़े हुए।कर्बला के बाद एक व्यक्ति नें इमाम सज्जाद अ. से पूछा: आप लोगों को कर्बला जा कर क्या मिला? उसनें अपने हिसाब से सही कहा था, क्योंकि जब यह क़ाफ़िला मदीने से निकला था तो उसमें इमाम हुसैन अ. थे, उसमें जनाबे अब्बास थे, उसमें हज़रत अली अकबर थे, उसमें जनाबे क़ासिम थे, उसमें औन व मोहम्मद व अली असग़र थे लेकिन जब मदीने वापस आया है तो उनमें से कोई भी नहीं था, सब क़त्ल कर दिये गए थे, सब शहीद हो गए थे, इस हिसाब से देखा जाए तो अहलेबैत सब कुछ लुटा कर आए थे उनके पास कुछ नहीं बचा था लेकिन इस सवाल करने वाले नें असली चीज़ पर ध्यान नहीं दिया था इसी लिये जनाबे सज्जाद नें उसे जवाब दिया: ज़रा सोचो अगर हम न जाते तो क्या होता? जी हाँ! अगर न जाते तो यह सब लोग तो ज़िन्दा होते लेकिन हक़ और हक़ीक़त नष्ट हो जाती, अन्तर्आत्मा मर जाती, अक़्ल का जनाज़ा निकल जाता और इस्लाम का नाम भी बाक़ी न रहता।इस स्थिति में बहुत से लोग इमाम हुसैन अ. और उनके मक़सद को समझ गए थे इस लिये उन्होंने इमाम का साथ दिया लेकिन बहुत से नहीं समझ पाए। दुश्मन तो दुश्मन था, वह तो आया ही था इमाम को क़त्ल करने और उनका ख़ून बहाने के लिये लेकिन बहुत से ऐसे लोग जो इमाम हुसैन अ. को अपना इमाम मानते थे, उनके चाहने वाले थे यहाँ ग़लती कर बैठे और इमाम का साथ नहीं दिया। उन्हे नहीं मालूम था कि दीन की रक्षा कहां और किस वक़्त करनी चाहिये। वह नहीं जानते थे कि वह ज़मीन कौन सी है जहाँ दीन की रक्षा करना ज़रूरी है बल्कि अगर जान की बाज़ी भी लगाना पड़े तो वह भी ज़रूरी है। वह मदीने में ही रहे केवल इसलिये कि लोगों को चार बातें बता सकें उन्होंने असली इस्लाम को, अपने इमाम को जनाब फ़ात्मा ज़हरा स. के बेटे को अकेला छोड़ दिया। कुछ लोग कर्बला में भी आए उन्होंने ल़ड़ाई भी लड़ी लेकिन आख़िरी वक़्त में इमाम के पास आकर बोले: मौला हम से जितना हो सकता था आपका साथ दिया अब हमें आज्ञा दीजिए हम जाना चाहते हैं। इमाम नें भी उन्हे रोका नहीं बल्कि जाने दिया। ऐसे लोग हमेशा से रहे हैं जिन्हे मुसलमान होने का दावा किया है लेकिन उन्हे नहीं मालूम कि इस्लाम क्या है, कहां है और कहां इस्लाम की सुरक्षा के लिये मैदान में आना वाजिब है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्सान सही समय पर सही फ़ैसला करे उसे पता हो कि कहां और किस वक़्त उसे क्या करना है। हबीब इब्ने मज़ाहिर, मुस्लिम इब्ने औसजा, ज़ुहैर क़ैन, और इमाम हुसैन अ. के दूसरे साथियों नें इस बात को अच्छी तरह समझ लिया था इसलिये उन्होंने इमाम का साथ दिया। वह न किसी चीज़ से डरे और न किसी लालच में पड़े, न उन्होंने कोई बहाना बनाया बल्कि हर चीज़ को क़ुर्बान करने के लिये तैयार हो गए। इसीलिये हम कर्बला के शहीदों को तमाम शहीदों से श्रेष्ठ मानते हैं, उनकी सर्वश्रेष्ठता ही थी कि उन्होंने मुश्किल वक़्त में इमाम का साथ दिया, उन्होंने एक कठिन स्थिति में सही फ़ैसला किया शायद इसी लिये हज़रत अली अ. और इमाम हसन अ. नें इमाम हुसैन अ. के ज़माने को बेमिसाल ज़माना कहा है"لَا یَومَ کَیَومِکَ یَا اَبَا عَبدِ اللّہِ"पूरी हिस्ट्री में आप को ऐसा टाइम और ऐसा पीरियड नहीं मिलेगा। इसी वजह से इमाम हुसैन अ. को सय्यदुश् शोहदा यानी दुनिया के तमाम शहीदों का सरदार कहा जाता है और कर्बला के शहीदों को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ शहीद माना जाता है। (इसी लिये इमाम हुसैन अ. को अपने साथियों पर बड़ा गर्व था, उन्होंने फ़रमाया था: जैसे साथी मुझे मिले वैसे किसी को नहीं मिले).
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