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Date of publication : 4/12/2015 11:34
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आयतुल्लाह ख़ामेनई की ज़बानी

तबलीग़ (प्रचार) कैसे की जाए?

कई शताब्दियों से ईरान और दुनिया के दूसरे मुल्क जहाँ मुसलमान और अहलेबैत अ. के चाहने वाले रहते हैं मोहर्रम और सफ़र के महीनो में अज़ादारी की जाती है और हज़ारों उल्मा और प्रचारक इस्लाम का प्रचार करते हैं।


विलायत पोर्टलः

कई शताब्दियों से ईरान और दुनिया के दूसरे मुल्क जहाँ मुसलमान और अहलेबैत अ. के चाहने वाले रहते हैं मोहर्रम और सफ़र के महीनो में अज़ादारी की जाती है और हज़ारों उल्मा और प्रचारक इस्लाम का प्रचार करते हैं।

पहले यह होता था कि हम जिस चीज़ का प्रचार करना चाहते थे, जिस टॉपिक और विषय पर बात करना चाहते थे उसके बारे में इन्फ़ार्मेशन होना काफ़ी होता था और जिसके पास अपने विषय के बारे में काफ़ी इन्फार्मेशन होती थी और वह सही तरह से उसे बयान करता था उसे एक अच्छा उपदेशक माना जाता था लेकिन आज ऐसा नहीं है आज अगर कोई तबलीग़ करना चाहता है तो उसके पास कई चीज़ें होना चाहिये, क्योंकि आज हमारा मैसेज पूरी दुनिया तक पहुँचता है हम उनमें से कुछ ज़रूरी चीज़ें बयान करना चाहते हैं:


1- दुनिया के हालात पर नज़र
आज एक आलिम और एक उपदेशक के लिये ज़रूरी है कि उसकी अपने समाज, अपने मुल्क बल्कि पूरी दुनिया के हालात पर नज़र हो, उसे पता हो कि उसके समाज में, उसके मुल्क में और दुनिया के कोने कोने में क्या हो रहा है। आज हमें यह पता होना चाहिये कि जो बात हमको कहनी है उसका सम्बंध कहाँ से है? यह किसके पक्ष में है और किसके विरूद्ध है। जंग के एक बड़े मैदान की तरह जहाँ जगह जगह कई मोर्चे होते हैं, जंग के मैदान में आप हर जगह एक ही नीति नहीं अपनाते बल्कि कभी आगे बढ़ते हैं, कभी पीछे हटना पड़ता है कभी ऐसा भी होता है कि इंसान यह सोच रहा होता है कि वह दुश्मन पर हमला कर रहा है लेकिन वह ख़ुद को निशाना बनाए होता है। (जिस तरह जंग जीतने के लिये दुश्मन की फ़ौज को, उसकी ताक़त को और जंग के मैदान को अच्छी तरह समझने की ज़रूरत होती है उसी तरह इस्लाम दुश्मन दुनिया में दुश्मन को पहचानना, हालात पर नज़र रखना ज़रूरी है)।


2- समय की ज़रूरत को समझना
प्रचारक (मुबल्लिग़) के लिये यह भी ज़रूरी है समय की ज़रूरत को समझता हो। उसे यह पता हो कि जिन लोगों के बीच वह तब्लीग़ व प्रचार कर रहा है उन्हें किन चीज़ों की ज़रूरत है। जब हम दीन की तब्लीग़ करते हैं तो हमें इस बात का पूरा ध्यान होना चाहिये कि शैतान और इस्लाम दुश्मन हमेशा दीन के नाम पर ही ख़राबियां पैदा करता है, वह हमसे यह नहीं कहता कि दीन को छोड़ दो क्योंकि उसे पता है हम दीन को कभी नहीं छोड़ने वाले और अगर उसके लिये यह सम्भव होता तो ज़रूर यह काम करता लेकिन वह ऐसा नहीं करता, लेकिन दीन के नाम पर बहुत सी चीज़ों में फँसा दिया है, उल्टा दीन हमें सिखाता है और हम दीन के नाम उसे स्वीकार कर लेते हैं जैसे आप सड़क के किनारे कहीं जा रहे हों लेकिन आपको रास्ता सही से मालूम न हो और आप सड़क के किनारे लगे साइन बोर्ड के देखते हुए आगे बढ़ रहे हों रास्ते में कोई आकर किसी साइन बोर्ड की दिशा बदल दे तो आप भी बिना कुछ सोचे दूसरी तरफ़ मुड़ जाएंगे। (इसलिये मुबल्लिग़ (प्रचारक) को केवल वह नहीं कहना चाहिये जो कई शताब्दियों से कहा जाता रहा है, या वह बातें नहीं पढ़नी चाहिये जिनकी अब इतनी ज़रूरत नहीं है या यह भी नहीं सोचना चाहिये कि लोग क्या पसंद करते हैं, उसे अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए उन चीज़ों, उन समस्याओं के बारे में बात करनी चाहिये जो हमारे समाज की और मोमिनीन की ज़रूरत है। इसके लिये पहले उसे जानना होगा कि आजकी ज़रूरत क्या है)।


3- आज के यज़ीद और यज़ीदियत को पहचनवाना
कर्बला और आशूरा की घटना केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है जिसे एक कहानी की और हिस्ट्री की तरह पढ़ा जाए और दूसरों को सुनाया जाए। कल के यज़ीद को समझ कर आज के यज़ीद को जानने की ज़रूरत है, मुबल्लिग़ के लिये यह ज़रूरी है कि वह लोगों को आज की यज़ीदियत और यज़ीद से सचेत करे। कल जिस यज़ीदियत का इमाम नें विरोध किया उसमें ऐसा क्या था कि इमाम नें उसका विरोध किया और क्या वह चीज़ें आज भी किसी सिस्टम में पाई जाती हैं? क्या यज़ीद और यज़ीदियत ख़त्म हो गई या आज भी है? और आज का यज़ीद कौन है? आज की यज़ीदियत क्या है? और किस भेस में है? लोगों को उसके बारे में बताना चाहिये (इमाम हुसैन अ. नें जब यज़ीद की बैअत से इंकार किया तो फ़रमाया था:

مِثلِی لَایُبَایِعُ مِثلَ یِزِید،

मेरे जैसा इंसान यज़ीद जैसे की बैअत नहीं कर सकता, इसका मतलब यह कि जिस ज़माने में भी यज़ीद जैसा होगा इमाम हुसैन अ. के मानने वाले उसके आगे नहीं झुकेंगे, इस लिये हमारे लिये यह जानना ज़रूरी है कि आज का यज़ीद कौन है ताकि उसके हाथ पर पर बैअत न कर बैठें)।


4- क़ुरआन व अहलेबैत अ. का मैसेज आम करना
इमाम हुसैन अ. और दूसरे इमामों नें अपनी क़ुर्बानी क्यों दी? दीन के लिये, क़ुरआन के लिये इस लिये हमें अपनी मजलिसों में क़ुरआन और अहलेबैत अ. के संदेश को आम करना चाहिये, केवल मजलिसें करना काफ़ी नहीं है, उनके मक़सद को बयान करना, उनके मक़सद को पूरा करना भी ज़रूरी है, सवाब के अलावा भी हमें उनसे कुछ मिलना हिये इस लिये हमारी मजलिसें ऐसी होनी चाहिये कि अगर एक इंसान दो साल, तीन साल तक इनमें आता रहे तो तीन साल बाद वह एक आम आदमी न हो बल्कि उसके अंदर परिवर्तन आया हो। केवल मजलिसें ही नहीं बल्कि जो नौहे, मरसिये, सलाम आदि पढ़े जाते हैं उनमें हुसैनी मैसेज होना चाहिये।


5- अक़्ल, इश्क़, संघर्ष
कर्बला, आशूरा और इमाम हुसैन अ. के पैग़ाम के प्रचार में इन तीनों चीज़ों का ध्यान रखना ज़रूरी है यानी हमारी बातों में लॉजिक भी हो, भावनाओं का ध्यान रखा जाए और साथ में वीरता, इज़्ज़त, आज़ादी का पैग़ाम भी हो। जो केवल कानों तक न पहेँ बल्कि दिल में उतर जाए इस तरह से कि इंसान के अन्दर एक इन्क़ेलाब आ जाए। अगर हमें मजलिस में आने वालों को हुसैनी बनाना है तो इमाम हुसैन अ. का सही और पूरा परिचय कराना होगा, उनका सही मैसेज पहुँचाना होगा, यही हमारे अज़ादारों को इंसान भी बनाएगा। अगर क़ुरआन में देखें तो आप देखेंगे कि क़ुरआने मजीद नें प्रचार का मक़सद यही बताया है कि इन्सानों को इंसान बनाया जाए, मजलिसें भी यही काम करती हैं अगर हम कर्बला का सही मैसेज पहुँचाएं।
जब हम दीन का पैग़ाम पहुँचाते हैं तो उसका अंदाज़ लॉजिकल होना चाहिये जो सामने वाले की अक़्ल, उसके दिल और उसकी आत्मा पर अपनी छाप छोड़े। दीन के नाम पर ऐसी बातें न कहीं जाएं जो अक़्ल के ख़िलाफ़ हों और जब दीन का डिफ़ेंस करें तो ऐसा तो न हो कि हमारा अंदाज़ कुछ ऐसा हो कि डिफ़ेंस के बजाए उसे और ख़राब कर दें यह चीज़ और भी ज़्यादा ख़तरनाक है हमारा अंदाज़ कुछ ऐसा हो कि डिफ़ेंस के बजाए उसे और ख़राब कर दें यह चीज़ और भी ज़्यादा ख़तरनाक है, इसका असर बाहर से होने वाले हमले से ज़्यादा होगा। दीन के नाम पर हम जो कुछ कह रहे हैं उसमें कोई हलका पन न हो, वह बेईमानी न हो इस्लाम की बेस अक़्ल पर है इस लिये हमारी ज़बान से कोई ऐसी बात न निकले जो अक़्ल के ख़िलाफ़ हो। (इसके अलावा मोमिनीन के अंदर पाई जाने वाली पाक भावनाओं को भी उभारें और उनकी भावनाओं को अहलेबैत अ. से जोड़ने की कोशिश करें)।


6- मिम्बर को अहमियत देना
मेरी नज़र में मिम्बर की बहुत ज़्यादा अहमियत है। आज इण्टरनेट, सैटेलाइट, टेलीविज़न और दूसरी चीज़ें हैं जिनके ज़रिये पूरी दुनिया तक अपनी बात पहुँचाई जा सकती है लेकिन उनमें से कोई भी मिम्बर के बराबर नहीं है। मिम्बर में आमने सामने (face to face) बात होती है इसका अपना एक महत्व है जो इसके अलावा और किसी भी चीज़ में नहीं है।


7- लोगों में उम्मीद जगाना और ख़तरों से सचेत रखना
हमारा बयान ऐसा होना चाहिये कि जो उनके अंदर आशा जगाए, उनके ईमान में मज़बूती आए, उनके लिये दीन और उसके अहकाम की अहमियत स्पष्ट हो, वह अल्लाह से मायूस न हों, ज़िन्दगी से मायूस न हों। दूसरी तरफ़ उन्हें ईमान के रास्ते में पाए जाने वाले ख़तरों के बारे में बताते रहें, हमारा बयान ऐसा भी न हो कि लोग बिल्कुल निश्चित हो जाएं कि उन्हे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, अमल की ज़रूरत नहीं है बल्कि पक्के मोमिन हैं, ऐसा न हो कि वाजिब चीज़ों को भी हल्का समझें और हराम से न बचें यह बहुत ख़तरनाक चीज़ है।
एक आदमी नें एक बार पैग़म्बरे इस्लाम स. को रोते देखा तो कहने लगा: ऐ अल्लाह के रसूल आप क्यों रो रहे हैं? आपनें फ़रमाया: मेरा यह रोना गुनाहों की वजह से नहीं है बल्कि उसका शुक्रिया अदा करता हूँ कि उसनें मुझ पर इतना करम (कृपा) किया है। (इंसान मासूम हो तब भी उसे अमल की और तौबा की ज़रूरत है। फिर जो मासूम नहीं है वह निश्चित हो कर बेअमल कैसे हो सकता है)।


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