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Code : 89079
Date of publication : 10/12/2015 9:22
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नहजुल बलाग़ा का संक्षिप्त परिचय

नहजुल बलाग़ा के महत्व के लिए यही काफी है कि इसे क़ुरआने मजीद के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कलाम कहा गया है। इसलिए कि क़ुरआन और नहजुल बलाग़ा दोनों का रास्ता एक ही है, क़ुरआने करीम का काम भी हिदायत व मार्गदर्शन करना है और नहजुल बलाग़ा का भी।



विलायत पोर्टलः आपने पाक किताब नहजुल बलाग़ा के बारे में सुना होगा और इस किताब को देखा भी होगा लेकिन नही मालूम कि इस किताब से आप कितने परिचित हैं और इसके बारे में कितनी जानकारी रखते हैं। नहजुल बलाग़ा अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ) के कुछ भाषणों (खुत्बों) पत्रों (मकतूबात) और संक्षिप्त उपदेसों (हिकमतों) का संग्रह है जिसे आपने अलग अलग मौक़ों और अवसरों पर बयान किया है। नहजुल बलाग़ा के महत्व के लिए यही काफी है कि इसे क़ुरआने मजीद के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कलाम कहा गया है। इसलिए कि क़ुरआन और नहजुल बलाग़ा दोनों का रास्ता एक ही है, क़ुरआने करीम का काम भी हिदायत व मार्गदर्शन करना है और नहजुल बलाग़ा का भी। बल्कि यूँ कहा जाए कि क़ुरआन और नहजुल बलाग़ा एक दूसरे से जुदा नही हो सकते। जैसा कि इन बातों को रसूले इस्लाम स.अ की हदीस बयान कर रही है कि आपने स.अ. फरमाया: अली क़ुरआन के साथ हैं और क़ुरआन अली के साथ है। अल्लामा सैय्यद ज़ीशान हैदर जवादी नहजुल बलाग़ा के महत्व की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं: नहजुल बलाग़ा अमीरूल मोमिनीन अ. के कथनों का वह संग्रह है जिससे ज़्यादा कीमती किताब न इससे पहले लिखी गई है न इसके बाद लिखी जाएगी। नहजुल बलाग़ा वह पवित्र किताब है जिसके मतलब अल्लाह की ओर से आए हैं। अब सवाल यह पैदा होता है कि इस किताब को किसने और कब इकट्ठा किया? इस किताब के लेखक अल्लामा सैय्यद रज़ी हैं जो सन 359 हिजरी में इराक़ के शहर बग़दाद में पैदा हुए और 6 मुहर्रम सन 406 हिजरी में आपका देहांत हुआ। आपकी गिनती शियों के चौथी सदी हिजरी के मशहूर स्कालर्स में होती है। अल्लामा सैय्यद ज़ीशान हैदर जवादी, सैय्यद रज़ी के बारे मे लिखते हैं: कितनी बरकतों वाली थी सैय्यद रज़ी की ज़िन्दगी के 47 साल के अंदर सैकड़ों किताबों का अध्ययन करके अमीरूल मोमिनीन के कथनों पर आधारित इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण किताब लिख दी कि आज तक सारी दुनिया उसे आश्चर्य की निगाह से देख रही है। खुद सैय्यद रज़ी एक ज़बरदस्त आलिम, फक़ीह, शायर और साहित्यकार थे। आपको अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली (अ) से गहरी मुहब्बत थी आप हज़रत अली (अ) की फसाहत व बलाग़त और वक्तृत्व से भरे कलाम के दीवाने थे। यही कारण था कि आपने हज़रत अली (अ) के कथनों को चयन करने में वाग्मिता व साहित्य का ख़ास ख्याल रखा। यहाँ इस बात की तरफ इशारा करना ज़रूरी है कि नहजुल बलाग़ा हज़रत अली (अ) के कुछ कथनों और भाषणों का संग्रह है जिसे सैय्यद रज़ी ने जमा किया था। यानि हज़रत की सारी हदीसें इसमें जमा नहीं की गई हैं। अल्लामा सैय्यद रज़ी को इस किताब के जमा करने में लगभग 20 साल लग गए। आपने सन 400 हिजरी में इस किताब का परिचय करवाया था। तब से अब तक सैकड़ों किताबें और आर्टिकल्स इस पाक किताब पर लिखे जा चुके हैं और लिखे जा रहे हैं। लेकिन कोई भी इस बात का दावा नही कर सका है कि उसे इस किताब पर पूरा कमान्ड हासिल हो चुका है और अब लिखने को कुछ नही बचा है। ऐसा नही है कि केवल शियों ने मौला के आश्चर्यजनक कथनों और नहजुल बलाग़ा पर किताबें और आर्टिकल्स लिखे हों बल्कि ग़ैरे शिया और ग़ैर मुस्लिम स्कालर्स ने भी न जाने कितनी किताबें और आर्टिकल्स लिखे हैं। उनमे से कुछ के नाम इस तरह हैं, इब्ने अबिल हदीद, शेख मुहम्मद अब्दोह मिस्री, डाक्टर ताहा हुसैन, डाक्टर सुबही सालेह, जार्ज जुरदाक़, जार्जी ज़ैदान, जुबरान खलील आदि। बहरहाल सैय्यद रज़ी ने बीस साल की अवधि में हज़रत अली (अ) के जिन कथनों और भाषणों को जमा किया था उसे तीन हिस्सों में विभाजित करके किताबी शक्ल दे दी जिसकी ताज़गी और नयापन अब तक बाक़ी है और इंशा अल्लाह यह किताब क़यामत तक बाक़ी और ज़िंदा रहेगी। नहजुल बलाग़ा का पहला हिस्सा बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। यह हिस्सा स्पीच और भाषण पर आधारित है जिन्हें मौला ने अलग अलग अवसरों पर बयान किया था जिनको दूसरे शबदों में खुतबा कहा जाता है। इस पवित्र किताब में, छोटे बड़े खुत्बों को मिलाकर कुल 241 खुत्बे पाए जाते हैं। इन खुत्बों में विभिन्न विषयों पर बहेस की गई है चाहे वह दुनियाँ से सम्बंधित हों या अलौकिक हों, धार्मिक विषय हों या सामान्य वार्ता। खुत्बा नम्बर 192, जो कि खुत्बए क़ासेआ के नाम से प्रसिद्ध है नहजुल बलाग़ा का सबसे बड़ा खुत्बा और खुत्बा नम्बर 9 सबसे छोटा खुत्बा है। नहजुल बलाग़ा का दूसरा हिस्सा पत्रों पर आधारित है। जिसे हज़रत अली (अ) ने अलग अलग लोगों को अलग अलग अवसरों पर लिखा था। इनमें जनता और सरकारी लोग, दोनों शामिल हैं। इन पत्रों की कुल संख्या 79 है। मकतूब नम्बर 53, जो कि अहदनामा-ए-मालिके अशतर के नाम से मशहूर है नहजुल बलाग़ा का सबसे बड़ा मकतूब और मकतूब नम्बर 79 सबसे छोटा ख़त है। इस किताब का तीसरा और आखरी हिस्सा हिकमतों पर पर आधारित है जिन्हें कलमाते क़िसार कहते हैं। इस हिस्से में छोटी बड़ी हकीमाना बातों को जमा किया गया हैं कि जिनकी संख्या 480 है। नहजुल बलाग़ा की सबसे बड़ी हिकमत, हिकमत नम्बर 147 और सबसे छोटी हिकमत, हिकमत नम्बर 434 है। यह था नहजुल बलाग़ा का संक्षिप्त परिचय। इंशा अल्लाह किसी दूसरे अवसर पर इस महान किताब के बारे में विस्तार से बयान किया जाएगा।


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