आतंक और अत्याचार के विरुद्ध दुनिया का सबसे बड़ा शांतिमार्च, मीडिया कर रहा है इग्नोर ।

हर साल इमाम हुसैन अ.स. की शहादत का शोक मनाने के लिए उनकी शहादत के चालीसवें दिन दुनिया भर के कोने कोने से उनके चाहने वाले कर्बला में इकठ्ठा होते हैं और अपनी संवेदनाएं प्रकट करते हैं। जिस जगह मौत मंडरा रही हो, कब किसी कोने से निकल कर कोई आप पर हमला कर दे इसका भी कोई भरोसा न हो, ऐसी जगह बड़ी संख्या में इकट्ठा होना दर्शाता है कि मुसलमानों का एक विशाल वर्ग आतंकवाद और अन्याय के खिलाफ हमेशा से अपना विरोध दर्ज कराता रहा है और आज भी अपना विरोध दर्ज करा रहा है चाहे जिस तरह हो ऐसे में मेनस्ट्रीम मीडिया का दायित्व बनता है कि वो उनकी आवाज़ बने ।

10/31/2018 3:58:33 PM

हुसैन (अ.स.) आइए, फिर कर्बला की ज़रूरत है....

मैं इस बात को मानने को तैयार नहीं कि वह आदिल अल्लाह ऐसी क़ौम और ऐसे लोगों को भी माफ़ कर देगा जिन्होंने उसके द्वारा सारी दुनिया के लिए रहमत बना कर भेजे जाने वाले को मुसलमानों तक सीमित कर दिया, जिन्होंने पैग़म्बर स.अ. की बेटी को फ़िर्क़े की सूली पर चढ़ा दिया जिसके सम्मान के लिए ख़ुद पैग़म्बर स.अ. अपनी जगह से खड़े हो जाते थे, हमने उनके नवासों को जिन्हें वह अपने बेटों की तरह प्यार करते थे उन्हें भी फ़िर्क़ों की भेंट चढ़ा दिया।

10/28/2018 8:24:00 AM

आयतुल्लाह ख़ामेनई की निगाह में अरबईन बिलियन मार्च की अहमियत

20 सफ़र को इमाम हुसैन अ.स. और उनके वफ़ादार असहाब का चेहलुम मनाने के लिए पूरी दुनिया से करोड़ों की तादाद में इमाम हुसैन अ.स. के अज़ादार कर्बला का सफ़र करते हैं, यह वह जगह है जहां सन् 61 हिजरी को इमाम हुसैन अ.स. ने इंसानियत और इस्लाम को बचाने के लिए बे मिसाल क़ुर्बानी पेश की थी।

10/27/2018 9:01:00 AM

अरबईन पर लोगों का हुजूम कर्बला के इंक़ेलाब की कामयाबी की दलील

इमाम हुसैन अ.स. चाहते थे कि लोगों को जेहालत से निजात दें और यह काम आपकी और आपके असहाब की शहादत से शुरू हुआ और आपके ख़ानदान की असीरी तक जारी रहा। हज़रत ज़ैनब स.अ. ने कर्बला वापसी के समय कर्बला की कामयाबी की ख़बर दी और फ़रमाया, ऐ भाई मैंने शाम में इंक़ेलाब बरपा कर दिया और कामयाब हो कर पलटी हूं।

10/25/2018 6:48:33 PM

हर दौर में कर्बला के ज़ायरीन रहे हैं.....

अल्लामा क़ाज़ी तबातबाई लिखते हैं कि कर्बला पैदल जाने वाले क़ाफ़िलों का सिलसिला इमामों के दौर से रहा है, हद तो यह है कि बनी उमय्या और बनी अब्बास के ज़ुल्म और अत्याचार के बावजूद इमाम हुसैन अ.स. के चाहने वालों ने कर्बला की ज़ियारत को नहीं छोड़ा, कैसी भी कठिनाईयां रही हों कैसे भी ज़ुल्म रहे हों लेकिन इमाम हुसैन अ.स. के चाहने वालों ने हर दौर में कर्बला पहुंच के अपनी मोहब्बत और अहलेबैत अ.स. से अपने सच्चे रिश्ते का साबित किया है।

10/24/2018 8:18:00 AM

ज़ियारते आशूरा की फ़ज़ीलत

जो शख़्स आशूरा के दिन हुसैन इब्ने अली अ.स. की ज़ियारत करे और उनकी क़ब्र पर बैठ कर आंसू बहाए तो क़यामत के दिन अल्लाह उसको दो हज़ार हज, दो हज़ार उमरे और दो हज़ार जेहाद का सवाब देगा, और वह भी वह हज, वह उमरा, वह जेहाद जो पैग़म्बर स.अ. और इमामों के साथ अंजाम दिए हों।

10/22/2018 9:54:00 PM

सब्र के साथ, ज़ुल्म के मुक़ाबले पर डटे रहना भी कर्बला का एक पैग़ाम है

ख़ुदा की क़सम मैं आपके रास्ते को छोड़ कर नहीं जाऊंगा और अपना यह नैज़ा दीन और इंसानियत के दुश्मनों के सीनों में उतार दूंगा और जब तक मेरी तलवार मेरे हाथ में है उससे वार करता रहूंगा और जब कोई हथियार नहीं बचेगा तो पत्थरों से इन ज़ालिमों पर वार करूंगा और उस समय तक डटा रहूंगा जब तक अपनी जान आप पर क़ुर्बान न कर दूं, और अगर फिर मुझे ज़िंदा किया जाए और उसके बाद मेरा बदन जला दिया जाए और मेरी राख को हवा में बिखेर दिया जाए और यह काम सत्तर बार अंजाम दिया जाए फिर भी आपके रास्ते को छोड़ कर नहीं जाऊंगा

10/22/2018 7:57:00 AM

कर्बला से ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डट कर मुक़ाबले की सीख मिलती है...

कर्बला से ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डट जाने का सबक़ मिलता है, ज़ुल्म और अत्याचार की बुनियाद पर हुकूमत का सिस्टम बनाने का ख़ात्मा इमाम हुसैन अ.स. का मिशन था, शहीदों की क़ुर्बानियां अंधेरे रास्तों के लिए बेहतरीन उजाला हैं,

10/21/2018 7:16:59 PM

कर्बला वाले और हमारी ज़िम्मेदारियां

आज अगर पूरी दुनिया ज़ुल्म की चक्की में पिस रही है तो उसकी वजह यही है कि मुसलमानों ने कर्बला को सुना तो है लेकिन कर्बला को जिया नहीं है, यानी इमाम हुसैन अ.स. की सीरत उनकी बातों से दूरी बना कर जी रहे हैं

10/19/2018 10:14:00 PM

सन् 61 हिजरी तो कर्बला की शुरूआत थी....

इमाम हुसैन अ.स. और पैग़म्बर स.अ. के ख़ानदान का एहसान केवल इस्लाम पर नहीं बल्कि क़यामत तक के लिए पूरी दुनिया के इंसानों पर है, क्योंकि अगर इमाम हुसैन अ.स. इंक़ेलाब न लाते और क़ुर्बानी न देते तो ग़रीब ज़िंदा न बचते और इंसानियत ग़ुलामी और अत्याचार की बेड़ियों में जकड़ी रहती और बादशाहत हर दौर में लगान वसूली करती।

10/18/2018 8:08:00 AM

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