अरबईन पर लोगों का हुजूम कर्बला के इंक़ेलाब की कामयाबी की दलील

इमाम हुसैन अ.स. चाहते थे कि लोगों को जेहालत से निजात दें और यह काम आपकी और आपके असहाब की शहादत से शुरू हुआ और आपके ख़ानदान की असीरी तक जारी रहा। हज़रत ज़ैनब स.अ. ने कर्बला वापसी के समय कर्बला की कामयाबी की ख़बर दी और फ़रमाया, ऐ भाई मैंने शाम में इंक़ेलाब बरपा कर दिया और कामयाब हो कर पलटी हूं।

10/25/2018 6:48:33 PM

हर दौर में कर्बला के ज़ायरीन रहे हैं.....

अल्लामा क़ाज़ी तबातबाई लिखते हैं कि कर्बला पैदल जाने वाले क़ाफ़िलों का सिलसिला इमामों के दौर से रहा है, हद तो यह है कि बनी उमय्या और बनी अब्बास के ज़ुल्म और अत्याचार के बावजूद इमाम हुसैन अ.स. के चाहने वालों ने कर्बला की ज़ियारत को नहीं छोड़ा, कैसी भी कठिनाईयां रही हों कैसे भी ज़ुल्म रहे हों लेकिन इमाम हुसैन अ.स. के चाहने वालों ने हर दौर में कर्बला पहुंच के अपनी मोहब्बत और अहलेबैत अ.स. से अपने सच्चे रिश्ते का साबित किया है।

10/24/2018 8:18:00 AM

ज़ियारते आशूरा की फ़ज़ीलत

जो शख़्स आशूरा के दिन हुसैन इब्ने अली अ.स. की ज़ियारत करे और उनकी क़ब्र पर बैठ कर आंसू बहाए तो क़यामत के दिन अल्लाह उसको दो हज़ार हज, दो हज़ार उमरे और दो हज़ार जेहाद का सवाब देगा, और वह भी वह हज, वह उमरा, वह जेहाद जो पैग़म्बर स.अ. और इमामों के साथ अंजाम दिए हों।

10/22/2018 9:54:00 PM

सब्र के साथ, ज़ुल्म के मुक़ाबले पर डटे रहना भी कर्बला का एक पैग़ाम है

ख़ुदा की क़सम मैं आपके रास्ते को छोड़ कर नहीं जाऊंगा और अपना यह नैज़ा दीन और इंसानियत के दुश्मनों के सीनों में उतार दूंगा और जब तक मेरी तलवार मेरे हाथ में है उससे वार करता रहूंगा और जब कोई हथियार नहीं बचेगा तो पत्थरों से इन ज़ालिमों पर वार करूंगा और उस समय तक डटा रहूंगा जब तक अपनी जान आप पर क़ुर्बान न कर दूं, और अगर फिर मुझे ज़िंदा किया जाए और उसके बाद मेरा बदन जला दिया जाए और मेरी राख को हवा में बिखेर दिया जाए और यह काम सत्तर बार अंजाम दिया जाए फिर भी आपके रास्ते को छोड़ कर नहीं जाऊंगा

10/22/2018 7:57:00 AM

कर्बला से ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डट कर मुक़ाबले की सीख मिलती है...

कर्बला से ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डट जाने का सबक़ मिलता है, ज़ुल्म और अत्याचार की बुनियाद पर हुकूमत का सिस्टम बनाने का ख़ात्मा इमाम हुसैन अ.स. का मिशन था, शहीदों की क़ुर्बानियां अंधेरे रास्तों के लिए बेहतरीन उजाला हैं,

10/21/2018 7:16:59 PM

कर्बला वाले और हमारी ज़िम्मेदारियां

आज अगर पूरी दुनिया ज़ुल्म की चक्की में पिस रही है तो उसकी वजह यही है कि मुसलमानों ने कर्बला को सुना तो है लेकिन कर्बला को जिया नहीं है, यानी इमाम हुसैन अ.स. की सीरत उनकी बातों से दूरी बना कर जी रहे हैं

10/19/2018 10:14:00 PM

सन् 61 हिजरी तो कर्बला की शुरूआत थी....

इमाम हुसैन अ.स. और पैग़म्बर स.अ. के ख़ानदान का एहसान केवल इस्लाम पर नहीं बल्कि क़यामत तक के लिए पूरी दुनिया के इंसानों पर है, क्योंकि अगर इमाम हुसैन अ.स. इंक़ेलाब न लाते और क़ुर्बानी न देते तो ग़रीब ज़िंदा न बचते और इंसानियत ग़ुलामी और अत्याचार की बेड़ियों में जकड़ी रहती और बादशाहत हर दौर में लगान वसूली करती।

10/18/2018 8:08:00 AM

जनाब मुख़्तार की ज़िंदगी पर एक निगाह

मैं कैसे उस शख़्स से संबंध ख़त्म करने का ऐलान कर सकती हूं जो अल्लाह के अलावा किसी दूसरे पर भरोसा नहीं करता, जो दिनों में रोज़ा रखता है और रातों में सारी रात अल्लाह की इबादत करता है, जिसने अपनी ज़िंदगी अल्लाह और उसके रसूल स.अ. की राह में और पैग़म्बर स.अ. के अहलेबैत अ.स. की मोहब्बत में उनके बहे हुए ख़ून का इंतेक़ाम लेने के लिए वक़्फ़ कर दी।

10/17/2018 7:37:33 PM

विलायत और तौहीद का आपसी रिश्ता

"ला इलाहा इल्लल्लाह मेरा क़िला है और जो मेरे क़िले में दाख़िल हो गया वह मेरे अज़ाब से महफ़ूज़ हो गया, कुछ दूर जाने के बाद इमाम अ.स. रुके और फिर फ़रमाया वह तौहीद जो इंसान को अल्लाह के अज़ाब से बचाती है और उसकी कुछ शर्तें हैं और उन शर्तों में से एक शर्त इमामों की इमामत और विलायत का इक़रार है।

10/16/2018 7:28:56 PM

अरबईन पर जाने वालों के लिए मराज-ए-केराम की नसीहतें

ज़ाहिर है जहां 20 मिलियन या उस से ज़्यादा की पब्लिक हो वहां कुछ ऐसी परिस्तिथियां भी होंगी जहां एक ही समय में कई लोगों की एक साथ कुछ ज़रूरतें होंगी, ऐसे समय में दूसरों की ज़रूरत को ख़ुद की ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत देना ही आपसी मोहब्बत और सार्वजनिक बलिदान की बेहतरीन मिसाल हो सकती है, इसलिए सभी ज़ायरीन से गुज़ारिश है जहां तक हो सके दूसरों की ज़रूरतों को ख़ुद से ज़्यादा अहमियत दें क्योंकि यह कर्बला की अहम तालीमात का हिस्सा है।

10/15/2018 8:46:00 AM

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