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शबे क़द्र में कुछ अपने लिए.....

इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. अभी छोटे थे, रमज़ान का महीना था शबे क़द्र थी, आपने रात जल्द ही बच्चों को सुला दिया और आधी रात के बाद जगा दिया ताकि सहर तक बच्चे जागते रहें आप बीच बीच में उन्हें खजूरें और पानी देती रहतीं। ज़रा सोचिए तो सही, शहज़ादी अपने छोटे छोटे बच्चों तक को उन शबों में जगाती हैं आख़िर कोई अहम शब होगी न.....

6/4/2018 2:50:00 PM

इमाम अली अ.स. और यतीमों की सरपरस्ती

एक दिन इमाम अली अ.स. को यतीमों की तंगी और बदहाली की ख़बर मिली, आपने घर जा कर चावल, खजूर, तेल और कुछ खाने की चीज़ों का बंदोबस्त किया उसे अपने कंधे पर रख कर उनके घर चल दिए, मेरे बार बार कहने पर भी वह खाने का सामान मुझे नहीं दिया बल्कि ख़ुद अपने कंधे पर रखे रहे, जब हम यतीमों के घर पहुंचे तो इमाम अ.स. ने अपने हाथ से लज़ीज़ खाना बनाया और फिर अपने हाथ से उन्हें पेट भर खाना खिलाया। फिर आप उन बच्चों के साथ बहुत देर तक खेलते रहे उनको हंसाते रहे बच्चे भी आपके साथ खेलते और खिलखिला कर हंस रहे थे।

6/4/2018 12:42:20 PM

अली अ.स.और यतीमों और महरूमों की मदद

इमाम अली अ.स. ने अपनी हुकूमत में एक बूढ़ी ख़ातून को भीख मांगते हुए देखा इमाम अ.स. ने देखने के बाद पूछा कि कौन है यह और यह भीख क्यों मांग रही है? लोगों ने जवाब दिया मौला यह ईसाई है, आपने फ़रमाया कि जब तक काम करने के क़ाबिल थी उससे काम लेते रहे और अब जब बूढ़ी हो गई तो उसे अनदेखा कर दिया, आपने हुक्म दिया कि उसके ख़र्चों को बैतुल माल से पूरा किया जाए।

6/4/2018 11:11:00 AM

इमाम ख़ुमैनी र.ह. की ज़िंदगी पर एक निगाह

इमाम ख़ुमैनी ने इस हादसे के बाद डट कर तानाशाही का मुक़ाबला किया आपने अपने दर्स अपनी तक़रीर अपने बयान और ख़त के द्वारा लगातार तानाशाह मोहम्मद रज़ा पहेलवी का ज़ोरदार विरोध करते हुए कहते कि मैं तुम्हारे फ़ौजियों की सख़्तियां उनके अत्याचार बर्दाश्त कर लूंगा लेकिन तुम्हारी बे दीनी और इस्लाम दुश्मन बातें स्वीकार नहीं करूंगा, ऐ रज़ा शाह सुन जब रूस, ब्रिटेन और अमेरिक ने ईरान पर हमला किया तो लोग नुक़सान के बावजूद ख़ुश थे कि पहेलवी चला गया कहीं तुझे भी भागना न पड़े तू तो 45 साल का हो गया है अब अपनी करतूतों को बंद कर और अत्याचार के सिलसिले को रोक दे और पब्लिक को गुमराह करने वाले औरत मर्द की बराबरी की नारेबाज़ी को बंद कर और इस्राईल और बहाईयत के प्रचार और उनके समर्थन से हाथ रोक ले।

6/3/2018 2:37:33 PM

शबे क़द्र के मुश्तरक आमाल

............................................इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत पढ़े, रिवायत में है कि शबे क़द्र में सातवें आसमान पर आवाज़ दी जाती है कि अल्लाह ने हर उस शख़्स के गुनाह माफ़ कर दिए जो इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत पढ़ने के लिए आया है।

6/3/2018 10:54:31 AM

माहे रमज़ान और उलमा की सीरत

बहुत सारी इबादतों और आमाल के लिए किताबों में एक ख़ास समय दिया हुआ है जिसकी वजह से हम उन्हें केवल उसी समय में अंजाम देते हैं जिसकी वजह से वह उन दुआओं और आमाल के सवाब और असर से दूसरे दिनों में महरूम रह जाते हैं, इसीलिए आप नसीहत करते थे कि जब भी कोई मुश्किल समय आए तो माहे रमज़ान की तरह क़ुर्आन को सर पर रख कर दुआ करनी चाहिए, आप शबे जुमा और दूसरे अनेक मौक़ों पर भी इस अमल को अंजाम देते थे।

5/31/2018 11:24:50 AM

इमाम अली अ.स. की शहादत के बाद इमाम हसन अ.स. की ज़िंदगी

इमाम हसन अ.स. की सन् 40 हिजरी में 37 साल की उम्र में लोगों ने बैअत की और आपने हर किसी से इस शर्त पर बैअत ली कि मैं जिससे सुलह करूंगा उससे सुलह करना पड़ेगी और जिससे जंग करूंगा उससे जंग करना पड़ेगी, लोगों ने इमाम अ.स. की शर्त क़ुबूल करते हुए आपकी बैअत की

5/30/2018 11:56:52 AM

बाग़े रिसालत का पहला फूल

एक बार एक शख़्स मदीने की मस्जिद में आया लोगों के सामने हाथ फैलाया लेकिन उसके ज़रूरत पूरी नहीं हुई, पास ही में हज़रत उसमान बैठे थे उनसे भी अपनी ज़रूरत बताई लेकिन उसकी मुश्किल हल न हो सकी फिर उस फ़क़ीर ने कहा मुझे किसी ऐसे शख़्स का पता बताईए जो मेरी सारी ज़रूरत पूरी कर सके, उसमान ने इशारा कर के कहा कि वह बुज़ुर्ग हस्ती जो अल्लाह की इबादत कर रही है उनके पास चले जाओ और वह इमाम हसन अ.स. थे।

5/29/2018 2:00:58 PM

मासूमीन अ.स. और क़ुर्आन की तिलावत

क़ुर्आन की तिलावत का सबसे ख़ूबसूरत मंज़र कर्बला के मैदान में शबे आशूर देखने को मिला जब इमाम हुसैन अ.स. ने उस रात यज़ीदी फ़ौज से एक रात का समय केवल इसलिए मांगा ताकि सुबह तक क़ुर्आन की तिलावत और अल्लाह से राज़ की बातें हो सकें, इतिहास में मौजूद है कि इमाम हुसैन अ.स. और उनके असहाब के ख़ैमों से पूरी रात क़ुर्आन, नमाज़ और दुआ व मुनाजात की आवाज़ आ रही थी।

5/27/2018 12:35:53 PM

हज़रत ख़दीजा अ.स. इस्लामी इतिहास की एक महान हस्ती

हज़रत ख़दीजा की अज़मत, फ़ज़ीलत और उनकी महानता के लिए क्या यह कम है कि पैग़म्बर स.अ. ने उनका सम्मान करते हुए जब तक वह ज़िंदा रहीं दूसरी शादी नहीं की, और हम आज भी ज़ियारते वारिसा में इमाम हुसैन अ.स. को हज़रत ख़दीजा का बेटा कह कर उन्हें याद करते हैं जो उनकी बड़ी फ़ज़ीलत है।

5/26/2018 12:19:00 AM

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