दुआए कुमैल और गुनाहों की क़िस्में

पैग़म्बर स.अ. का इरशाद है कि तीन गुनाहों का अज़ाब आख़ेरत से पहले दुनिया ही में नाज़िल हो जाता है, मां बाप का कहना न मानना, लोगों पर ज़ुल्म करना, किसी के एहसान और नेकी को भुला कर उसकी ना शुक्री करना।

8/16/2018 5:13:54 PM

इस्लाम में आमाल का अज्र और उसकी सज़ा का समय तय है

हिसाब किताब मौत से पहले मुमकिन नहीं है जब तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाए और फिर किसी नेक काम की गुंजाइश बाक़ी न रह जाए, बल्कि मरने के बाद भी यह फ़ाइल बंद नहीं हो सकती है क्योंकि यह भी हो सकता है कि इंसान ने किसी सदक़-ए-जारिया का बंदोबस्त किया हो जिससे उसका सवाब जारी रहे या कोई शख़्स उसके हक़ में नेक अमल करता रहे और उसका सवाब मरने वाले को मिलता रहे, ऐसी सूरत में पूरा हिसाब किताब तभी होगा जब सारे नेक काम करने वाले मर जाएं और उसकी तरफ़ से किसी भी नेक अमल अंजाम दिए जाने की कोई भी गुंजाइश न हो।

8/13/2018 8:18:00 AM

इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. की ज़िंदगी पर एक निगाह

इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. की विलादत के समय अमीन की हुकूमत थी, सन् 198 हिजरी में मामून हाकिम बना और 218 हिजरी मोतसिम सत्ता में आया और 220 हिजरी में उसी ने ज़हर दे कर शहीद कर दियाl आपकी शहादत 29 ज़ीक़ादा 220 हिजरी को 25 साल की उम्र में हुई और आपकी क़ब्र आपके जद इमाम काज़िम अ.स. के पहलू में काज़मैन में हैl

8/11/2018 6:44:00 AM

इल्म और माल

जिस्म और रूह के बाक़ी रहने का ज़रिया इल्म और माल है और दोनों को बाक़ी रहना है इसलिए न माल को बुरा कहा जा सकता है न इल्म को, क़ुर्आन ने माले दुनिया को कहीं ख़ैर कहीं अल्लाह का फ़ज़्ल बताया है जो इस बात को दर्शाता है कि इस्लाम माल और दौलत का दुश्मन नहीं है, इंसान का दुश्मन माल का हराम होना है और हराम माल में माल की ग़लती नहीं बल्कि इंसान की ग़लती है।

8/6/2018 4:47:02 PM

जवानी की अहमियत

जवानी मारेफ़त के कमाल का वह दौर है जिसमें बचपन की कमज़ोरियों और नाकामियों का तजुर्बा भी होता है और बुढ़ापे की कमज़ोरियों का अंदाज़ा भी, ऐसे में अगर इंसान थोड़ा सा भी ग़ाफ़िल हो जाए तो कभी काम करने के क़ाबिल नहीं बचेगा और ऐसे समय में अगर बेदार और जागरूक न हुआ तो क़यामत तक बेदार और जागरूक नहीं हो सकता।

8/4/2018 4:23:18 PM

मोमिन और दुनिया की मुसीबतें

पैग़म्बर स.अ. का इरशाद है कि जिस माल की ज़कात न निकाली जाए उस माल पर भी लानत और जिस बदन की ज़कात न निकाली जाए उस बदन पर लानत, आपसे सवाल किया गया कि माल की ज़कात का मतलब तो साफ़ है लेकिन यह बदन की ज़कात का क्या मतलब है? आपने फ़रमाया बदन की ज़कात का मतलब परेशानियों और मुसीबतों में गिरफ़्तार होना है।

8/2/2018 1:25:34 PM

पर्दा

पर्दे के बारे में एक ग़लत विचार यह भी फैलाया जाता है कि पर्दे में रहने वाली औरत दुनिया का कारोबार, नौकरी और दूसरे बहुत से दुनियावी काम नहीं कर सकती वह एक क़ैदी बन कर रह जाती है.... पहली बात तो यह कि यह बात इस्लामी पर्दे से हट कर है, दूसरी बात यह कि इस्लामी इतिहास की शुरुआत ही एक पर्देदार औरत के व्यापार और कारोबार से हुई, इसलिए इस्लाम कैसे इस बात को स्वीकार कर सकता है कि पर्दे में रह कर औरत कारोबार नहीं कर सकती है.....

8/1/2018 2:31:37 PM

इस्लाम और ग़ुलामी

अगर कोई शख़्स अपने ग़ुलाम का एक हिस्सा भी आज़ाद कर दे तो पूरा ग़ुलाम आज़ाद हो जाएगा और अगर ग़ुलाम दो लोगों का है और अगर एक ने आज़ाद कर दिया है तो पूरा ग़ुलाम आज़ाद हो जाएगा लेकिन उसे दूसरे मालिक के हिस्से की क़ीमत अदा करनी होगी। इस्लाम के इन्हीं अहकाम का नतीजा था जिसको देखते देखते ग़ुलामी कब ख़त्म हो गई किसी को पता तक नहीं चला और समाज पर कोई बोझ भी नहीं पड़ा।

7/31/2018 3:34:15 PM

मासूमीन (अ.स.) का इस्तेग़फ़ार

इस्तेग़फ़ार एक तरह की सिफ़ारिश भी है जैसाकि इरशाद होता है कि अगर यह लोग इस्तेग़फ़ार करते और रसूल (स. अ.) भी उनके लिए इस्तेग़फ़ार करते तो यह अल्लाह को तौबा क़ुबूल करने वाला और मेहरबान पाते, इस आयत में पैग़म्बर स.अ. का इस्तेग़फ़ार किसी गुनाह का नतीजा नहीं बल्कि एक तरह की शफ़ाअत है।

7/30/2018 4:52:07 PM

हज का फ़लसफ़ा

यह लब्बैक इस बात की भी निशानी है कि हालांकि हम हज़रत इब्राहीम की उम्मत में से नहीं हैं लेकिन चूंकि उन्होंने अल्लाह की ओर दावत दी है और बुलाया है और अल्लाह के हुक्म से बुलाया है इसलिए हम उनकी आवाज़ पर लब्बैक कहने के लिए तैयार हैं, हमारी निगाह में अल्लाह के नबी का सम्मान हमेशा रहता है चाहे वह इस दुनिया में ज़िंदा हो या अल्लाह की बारगाह में वापस जा चुका हो हम उन लोगों में से नहीं हैं जिनका नबी उनके सामने उन्हें आवाज़ दे रहा था और वह मुड़ कर देखने को तैयार नहीं थे।

7/29/2018 10:57:50 AM

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