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Date of publication : 23/12/2017 17:24
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सुप्रीम लीडर हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई की निगाह में ज़ायोनिज़्म

ज़ायोनी सरकार वर्तमान फिलिस्तीन पर भी संतुष्ट नहीं है पहले 1 बालिश्त ज़मीन चाहते थे बाद में आधे फिलिस्तीन पर कब्ज़ा कर लिया और फिर पूरे फिलिस्तीन पर क़ब्ज़ा कर लिया , उसके बाद फिलिस्तीन के पडोसी देशों जैसे सीरिया , जॉर्डन और मिस्र पर भी अतिक्रमण किया और उनकी जमीनों पर भी कब्ज़ा जमा लिया अब भी अवैध राष्ट्र का उद्देश्य ग्रेटर इस्राईल की स्थापना है ।


विलायत पोर्टल :  ज़ायोनिज़्म मानवता का दुश्मन लगभग 100 साल पहले यूरोप में ज़ायोनिज़्म का बीज उत्पन्न हुआ तथा मानवता से इन्तेक़ाम और प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से उन्होंने अपने पैर फ़ैलाने शुरू किये, यह किसी समाज विशेष के दुश्मन नहीं थे बल्कि यह मानवता के दुश्मन थे जिसका कारण भी यह था कि यहूदी समाज कई सदियों से सरकार की निगाहों में और उनकी ओर से चलाये जा रहे दमन चक्र का निशाना बने थे तथा अन्य समाजों की निगाहों में भी उनका कोई अधिक महत्त्व नहीं था ।
फिलिस्तीन भूमि पर अतिक्रमण का इतिहास जवानों की प्रवृत्ति में ज़ुल्म और अत्याचार का मुक़ाबला करना शामिल है जब युवा यह देखते हैं कि विश्व पटल पर कोई ज़ालिम और अत्याचारी सरकार है जिसकी बुनियाद ही ज़ुल्म और अत्याचार है , "ज़ायोनी सरकार का आधार अत्याचार और ज़ुल्म है" तो वह उसका विरोध करेंगे ।
अच्छा होगा आप फिलिस्तीन के इतिहास के बारे में पढ़ें, “यह फिलिस्तीन की तारीख़” या फिलिस्तीन के इतिहास पर लिखी गयी अन्य कोई भी किताब पढ़िए तो समझेंगे कि ज़ायोनियों ने मिडिल ईस्ट के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को कैसे षड्यंत्रों और चालाकियों से हासिल किया है, पहले आकर फिलिस्तीनियों की भूमि को खरीदा, हालाँकि वहाँ पहले से कुछ यहूदी मौजूद थे और वहाँ ब्रिटिश लोग थे, उद्देश्य इस जगह को हथियाना था इन लोगों ने सबसे पहले 1897 में ज़ायोनी कांग्रेस में अपना उद्देश्य स्पष्ट कर दिया था कि फिलिस्तीनी भूमि को हासिल किया जाना चाहिए ، यही मुख्य बिंदु है , उस समय अमेरिका कि कोई खबर नहीं थी, ब्रिटिश साम्राज्य के लिए भी इस क्षेत्र को अपने अधीन लेना बहुत महत्वपूर्ण था, याद करो उस समय उस्मानिया खिलाफत का दौर था और ब्रिटेन के लिए यहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं थी। पहले विश्व युद्ध के बाद उस्मानी साम्राज्य का पतन हो गया उस समय जॉर्डन , इराक , मिस्र और हिजाज़ ब्रिटेन के अधीन आ गए, लेबनान और सीरिया आदि फ़्रांस के अधीन आ गए, विश्व युद्ध के विजेताओं ने इन क्षेत्रों को आपस में बाँट लिया लेकिन जिस समय फिलिस्तीन को कब्ज़ाने और ज़ायोनी और यहूदियों को वहाँ बसाने की बात हुई उस समय ऐसी बाते नहीं थी, ब्रिटेन के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण था कि वह इस क्षेत्र में अपने लिए कोई ठिकाना बनाये रखे ।
पहले विश्व युद्ध कि समाप्ति के साथ ही ईरान में पहलवी सम्राज्य की शुरुआत है , इस अवधि में ज़ायोनियों ने फिलिस्तीन में कुछ भूमि खरीदी और कुछ ज़ायोनियों को अन्य देशों से लाकर फिलिस्तीन में बसाया गया , फिलिस्तीनी और ज़ायोनियों में अगर कोई मतभेद उपजता था तो ब्रिटिश सैनिक यहूदियों को चोरी छुपे हथियार स्मगल करते थे और इस प्रकार फिलिस्तीन में आंतरिक युद्ध भड़काने का काम किया गया, जो मूवमेंट जान बूझ कर एक उद्देशय के साथ शुरू किया गया था उसे उन लोगों कि ओर से ही जो इनके उद्देश्य से भलीभांति परिचित थे कभी कभी कुचल दिया जाता था उसके बाद 1948 में फिलिस्तीन के एक भाग में एक अवैध ज़ायोनी राष्ट्र का गठन कर दिया जाता है उसके बाद भी 1948 और 1956 तथा 1974 में हुई कई जंगों में फिलिस्तीन के अन्य भागों को भी कब्ज़ा लिया गया और फिलिस्तीन को अवैध राष्ट्र इस्राईल का नाम दे दिया गया मतलब वह सरकार जो ज़ुल्म अत्याचार और मुसलमानों और फिलिस्तीनी मकान मालिकों को उनके घर से खदेड़ कर बनाई गयी थी वह ब्रिटेन की सहयता प्राप्त सरकारों में पहले नंबर पर आ गई । उसके बाद जब अमेरिका मैदान में आया और अपनी गतिविधियां शुरू की तो अवैध राष्ट्र उसके और अन्य यूरोपीय देशों और तत्कालीन सोवियत संघ के अधीन आ गया ।
ग्रेटर इस्राईल की स्थापना , जायोनिज़्म का मुख्य उद्देश्य इस्राईल का उद्देश्य अपना विस्तार है, ज़ायोनी सरकार वर्तमान फिलिस्तीन पर भी संतुष्ट नहीं है पहले 1 बालिश्त ज़मीन चाहते थे बाद में आधे फिलिस्तीन पर कब्ज़ा कर लिया और फिर पूरे फिलिस्तीन पर क़ब्ज़ा कर लिया , उसके बाद फिलिस्तीन के पडोसी देशों जैसे सीरिया , जॉर्डन और मिस्र पर भी अतिक्रमण किया और उनकी जमीनों पर भी कब्ज़ा जमा लिया अब भी अवैध राष्ट्र का उद्देश्य ग्रेटर इस्राईल की स्थापना है । उनकी बेकार और बेहूदा आस्था के अनुसार वह ज़मीन जिसका उन्हें वादा दिया गया है नील से फुरात तक है , इस भूमि का जितना भाग अपने अधीन नहीं ले सके हैं उसे अवश्य हासिल करना ही उनका उद्देश्य है लेकिन उन में अब इतनी हिम्मत नहीं है कि इस बात को ज़बान पर भी ला सकें ।
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