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Code : 191961
Date of publication : 7/2/2018 5:37
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चाय बनाने की ज़िम्मेदारी मेरी...

मेरी यह अपनी इच्छा थी, मैंने चाय बनाने के लिए इसलिए कहा क्योंकि वहां जितने लोग थे कोई भी मुझे चाय बनाने की ज़िम्मेदारी न सौंपता, और कोई भी यह नहीं चाहता कि मैं वहां बैठ कर चाय निकालूं, लेकिन हक़ीक़त में भी अगर वह लोग यह कह देते कि आपका काम चाय बनाना है, तब भी मैं अबा क़बा उतार कर किनारे रखता और आस्तीन उलट कर चाय बनाने में लग जाता, और मैंने केवल कहा ही नहीं था बल्कि पूरी तरह से इस काम के लिए तैय्यार था।

विलायत पोर्टल :  जिलावतन होने के बाद जिस समय इमाम ख़ुमैनी र.ह. वापस ईरान आने वाले थे हम तेहरान यूनिवर्सिटी में थे, हमारे कुछ दोस्त जो साथ मिल कर काम कर रहे थे और इंक़ेलाब की वजह से जिनको सभी पहचान चुके थे वह भी सब मौजूद थे, जिनमें से कुछ शहीद हो गए जैसे, शहीद बहिश्ती, शहीद बाहुनर, शहीद मुतह्हेरी और इसी तरह मेरे चहीते भाई हाशमी रफ़सन्जानी, रब्बानी शीराज़ी, रब्बानी अमलिशी, हम सब साथ बैठते और हर अहम काम में मशविरा करते थे, हम यही बात कर रहे थे कि इमाम ख़ुमैनी र.ह. आने वाले 2-3 दिनों में या हो सकता है कल ही आ जाएं और हमारी अभी कुछ भी तैय्यारी नहीं है, इसलिए हमें एक मज़बूत योजना की ज़रूरत है ताकि इमाम ख़ुमैनी र.ह. जब आएं और मुलाक़ातियों की भीड़ बढ़ जाए और सारे काम हम लोगों के हवाले किए जाएं तो हमारे काम थोड़ी देर के लिए भी रुकना नहीं चाहिए, और इन बातों का किसी तरह के पद से कोई संबंध नहीं था।
हम क्रांतिकारी परिषद के सदस्य थे, और बहुत से लोग यहां तक कि हमारे कुछ दोस्त जैसे रब्बानी शीराज़ी और रब्बानी अमलिशी उस समय इस बात को भी नहीं जानते थे कि हम कुछ लोग इस कमेटी के मिंबर हैं, हम सब एक साथ काम करते थे और किसी पद के बारे में कोई बात नहीं होती थी, हमारी बातों का विषय इमाम ख़ुमैनी र.ह. के आने के बाद के काम थे, कि जब वह आएंगे बहुत सी ज़िम्मेदारियां होंगी, इसीलिए सब लोग बैठ कर उसके बारे में विचार कर रहे थे, हम ने एक समय तय किया कि उस दिन शाम में बैठ कर इस बारे में चर्चा करेंगे, सभी उस दिन एक जगह एक कमरे में जमा हुए और आपस में काम के बंटवारे को लेकर बात करने लगे, मैंने कहा कि मैं चाय बनाऊंगा, सब को मेरी बात से बहुत आश्चर्य हुआ, उन्होंने कहा भी कि यह क्या कह रहे हैं, मैंने कहा हां मैं चाय बहुत अच्छी बनाता हूं मैं चाय ही बनाऊंगा, मेरे ऐसा कहने से मीटिंग में एक नया जोश पैदा हो गया, यहां किसी काम का किसी दूसरे काम से टकराव नहीं था, हम कहीं भी किसी भी काम पर हों हमें बस उसे अच्छे से करना चाहिए।
 मेरी यह अपनी इच्छा थी, मैंने चाय बनाने के लिए इसलिए कहा क्योंकि वहां जितने लोग थे कोई भी मुझे चाय बनाने की ज़िम्मेदारी न सौंपता, और कोई भी यह नहीं चाहता कि मैं वहां बैठ कर चाय निकालूं, लेकिन हक़ीक़त में भी अगर वह लोग यह कह देते कि आपका काम चाय बनाना है, तब भी मैं अबा क़बा उतार कर किनारे रखता और आस्तीन उलट कर चाय बनाने में लग जाता, और मैंने केवल कहा ही नहीं था बल्कि पूरी तरह से इस काम के लिए तैय्यार था।
 (9 अगस्त 1989 में राष्ट्रपति के कार्यकाल समाप्त होने के बाद विदाई समारोह में आपका बयान)
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