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Date of publication : 24/2/2018 19:43
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बच्चों पर टी. वी. देखने का बुरा प्रभाव

बच्चों को 2 हिस्सों में बांट कर उनको 2 तरह की फ़िल्म दिखाई गई एक फ़िल्म में एक बच्चा एक टैडी को हाथों पैरों से मार रहा है दूसरे में एक बच्चा उस टैडी की ख़ातिरदारी कर रहा है उसके लिए चाय पानी वग़ैरह का बंदोबस्त करता हुआ दिख रहा है, दोनों बच्चों को फ़िल्म दिखा कर एक एक टैडी दिया गया और उन दोनों ने फ़िल्म देखने के बाद जो देखा उसी तरह का रवैया अपनाया जिसने टैडी को मारते हुए देखा था उसने टैडी को हाथ में लेते हुए जैसे फ़िल्म में मारते हुए देखा था मारना शुरू कर दिया, लेकिन जिसने ख़ातिरदारी करते देखा था उसने उसके साथ वैसे ही किया।

विलायत पोर्टल :  टी. वी. एक ऐसा ताक़तवर माध्यम है जो कम समय में बहुत कुछ सिखा देता है, हम ख़ुद अगर अपनी ज़िंदगी पर ध्यान दें कि हम जिन शख़्सियतों के प्रोग्रामों को रोज़ाना देखते हैं उसका असर हमारी ज़िंदगी पर किस हद तक पड़ता है, अब ज़ाहिर है कि प्रोग्राम अगर सकारात्मक होगा उसका असर भी सकारात्मक पड़ेगा लेकिन अगर प्रोग्राम नकारात्मक हुआ तो असर भी नकारात्मक ही होगा, और रही बच्चों की बात तो आमतौर से बच्चें एक्शन, मारधाड़ और इस तरह के और दूसरे ही प्रोग्राम पसंद करते हैं लेकिन अगर यही प्रोग्राम देखना उनकी आदत बन जाए तो इसका बुरा असर उनकी ज़िंदगी में देखने को मिलता है, क्योंकि बच्चे जो भी टी. वी. में देखते हैं उसको तुरंत अपना कर उसी तरह वह अपनी ज़िंदगी में करते हैं। आज की दुनिया में भी अगर देखें तो मनोचिकित्सकों के अनुसार टी. वी. पर हिंसक और मा धाड़ वाले प्रोग्राम या इंटरनेट की साइटस् पर या यूट्यूब वग़ैरह पर इस तरह के प्रोग्राम हमारे बच्चों की आदतों और उनके जीवन पर बुरा प्रभाव डालते हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि अगर बच्चे ख़ौफ़नाक तस्वीरें या डरावने सीन देखते हैं या इसी तरह मारधाड़ और फ़ायरिंग के सीन देखते हैं तो उनमें से कुछ उन्ही सीन को देख कर दोहराना चाहते हैं और उनमें से कुछ उन सीन को देख कर डरते हैं।
डॉक्टरों, विद्वानों और बच्चों के विशेषज्ञों ने अनेक देशों में इस बारे में रिसर्च की है ताकि बच्चों पर टी.वी. पर दिखाए जाने वाले हिंसक प्रोग्राम और हिंसक मूवीज़ के असर को समझा जा सके, इन्हीं विशेषज्ञों ने अपनी रिसर्च में लिखा है कि बच्चे टी.वी. में हिंसा करने वाले को देख कर हिंसक बनना चाहते हैं क्योंकि वह यही समझते हैं कि यह आदमी ताक़तवर है और इसके जैसे कामों से हमको भी लोग ताक़तवर समझेंगे। इस बारे में एक रिसर्च इस तरह की भी की गई कि बच्चों को 2 हिस्सों में बांट कर उनको 2 तरह की फ़िल्म दिखाई गई एक फ़िल्म में एक बच्चा एक टैडी को हाथों पैरों से मार रहा है दूसरे में एक बच्चा उस टैडी की ख़ातिरदारी कर रहा है उसके लिए चाय पानी वग़ैरह का बंदोबस्त करता हुआ दिख रहा है, दोनों बच्चों को फ़िल्म दिखा कर एक एक टैडी दिया गया और उन दोनों ने फ़िल्म देखने के बाद जो देखा उसी तरह का रवैया अपनाया जिसने टैडी को मारते हुए देखा था उसने टैडी को हाथ में लेते हुए जैसे फ़िल्म में मारते हुए देखा था मारना शुरू कर दिया, लेकिन जिसने ख़ातिरदारी करते देखा था उसने उसके साथ वैसे ही किया।
रिसर्च के अनुसार क्योंकि बच्चों को यह नहीं मालूम होता कि फ़िल्म में दिखाए जाने वाले सभी सीन काल्पनिक हैं बल्कि वह उनको सच मानते हुए उसको आइडियल समझने लगते हैं। इसीलिए बच्चों के मनोविज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को हिंसक प्रोग्राम और फ़िल्में मत देखने दें उसकी जगह पर कुछ ऐसे प्रोग्राम दिखाएं जिस से रोज़ाना की ज़िंदगी के आदाब और कुछ संस्कार सीख सकें।
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