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Code : 192441
Date of publication : 6/3/2018 20:13
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जैसे कुछ हुआ ही न हो....

मग़रेबैन की नमाज़ के बाद वह एक कमरे में बैठे थे, देख कर ऐसा लग रहा जैसे कुछ हुआ ही न हो, आपने क़ुर्आन खोला और पढ़ने लगे, यानी इमाम ख़ुमैनी र.ह. कितने भी थके हों कुछ भी हो लेकिन एक दिन भी ऐसा नहीं होता था जिस दिन आप क़ुर्आन की तिलावत न करें, और यही क़ुर्आन से इतनी मोहब्बत आपके सुकून का कारण था कि लगता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

विलायत पोर्टल :  इमाम ख़ुमैनी र.ह. जिलावतनी के बाद जब ईरान आए, तो हम तो जिस दिन वह आएं उनको एक नज़र देख चुके थे, फिर रात रेफ़ाह मदरसे में भी उनको देखा, लेकिन उनके क़रीब नहीं गया ताकि आप को मेरे कारण कोई तकलीफ़ न हो, सभी लोग उनको घेरे हुए थे चूम रहे थे, मैं सोंच रहा था कि मेरे वजह से उन्हें तकलीफ़ न हो, मैं बाद में किसी समय मिल लूंगा, और वह समय आने वाला दिन ही था जब आप ने किसी को भेज कर मुझे और हमारे दूसरे साथी जो इंक़ेलाब कमेटी के मिंबर थे उन को बुलाया, रात का समय था मैं कमरे में गया देखा वह क़ुर्आन पढ़ रहे हैं। इमाम ख़ुमैनी र.ह. के ईरान वापसी के 2-3 दिन बाद उन से मिलने के लिए ईरान की सड़कों पर जो लोगों की भीड़ थी वह आज भी आप लोगों को शायद याद हो, लोग आ रहे थे जा रहे थे, आम जनता, राजनैतिक हस्तियां और उलमा सभी मुलाक़ात के लिए आ जा रहे थे, कोई सवाल कर रहा था, कोई मशविरा दे रहा था, इमाम ख़ुमैनी र.ह. इसी तरह वापस आने के बाद से व्यस्त थे, मग़रेबैन की नमाज़ के बाद वह एक कमरे में बैठे थे, देख कर ऐसा लग रहा जैसे कुछ हुआ ही न हो, आपने क़ुर्आन खोला और पढ़ने लगे, यानी इमाम ख़ुमैनी र.ह. कितने भी थके हों कुछ भी हो लेकिन एक दिन भी ऐसा नहीं होता था जिस दिन आप क़ुर्आन की तिलावत न करें, और यही क़ुर्आन से इतनी मोहब्बत आपके सुकून का कारण था कि लगता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
(8 फ़रवरी 1982 में तफ़सीर के क्लास में आयतुल्लाह ख़ामेनई का बयान)
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