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Code : 192464
Date of publication : 7/3/2018 17:41
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बच्चों की तरबियत हज़रत ज़हरा स.अ. की सीरत की रौशनी में

आप अपने बच्चों की हर छोटी बड़ी भावना को समझती थीं, किस समय उनको मां के प्यार की ज़रूरत है या कब किसी और चीज़ की ज़रूरत है हर चीज़ का ध्यान रखती थीं, बच्चों के अक़ीक़े, उनकी ओर से सदक़ा देना और उनके कानों में अज़ान अक़ामत कहना जो कि यह सब काम मुस्तहब हैं लेकिन इन पर भी आपका पूरा ध्यान रहता, आप हर मौक़े का ध्यान रखती थीं कि कहीं किसी मौक़े पर बच्चों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।


विलायत पोर्टल :  हज़रत ज़हरा स.अ. की सीरत में एक बहुत अहम विषय आपका बच्चों की तरबियत करना है, आपके बच्चे आम बच्चों की तरह नहीं थे बल्कि अल्लाह की ओर से यह इंतेज़ाम था कि पैग़म्बर स.अ. की नस्ल आप के द्वारा चले। जैसाकि पैग़म्बर स.अ. ने ख़ुद फ़रमाया कि अल्लाह ने हर नबी की नस्ल को उन्हीं से चलाई लेकिन मेरी नस्ल हज़रत अली अ.स. से चलाई इसलिए मेरी बेटी फ़ातिमा स.अ. की औलाद मेरी औलाद हैं। (मनाक़िब, इब्ने शहर आशोब, जिल्द 3, पेज 387)
यह इंतेज़ाम अल्लाह की ओर से था कि दीन के रहबर और पैग़म्बर स.अ. के जा नशीन हज़रत ज़हरा स.अ. की पाक नस्ल से हों, चूंकि आप ख़ुद पाक और मासूम गोद की पली हुई थीं इसीलिए इस्लामी तरबियत के तरीक़ों को अच्छी तरह से जानती थीं, आप बच्चों के दूध पिलाने के इस्लामी तरीक़े से ले कर उनको प्यार करने तक के इस्लामी तरीक़ों की जानकार थीं, आप जानती थीं कि हर छोटी बड़ी आदत और हर छोटे बड़े हमारे काम बच्चों की तरबियत को प्रभावित करते हैं, आप जानती थीं कि आपकी गोद में पलने वाले बच्चे आने वाले कल में पूरी उम्मत की हिदायत करेंगे लोग उनकी पैरवी करेंगे इसलिए आपने जिस तरह आपका क़ुर्आनी अख़लाक़ और किरदार था उसी क़ुर्आनी अख़लाक़ और किरदार में आपने अपने बच्चों को भी ढ़ाल दिया। बच्चों की तरबियत ख़ास कर आज के दौर में कोई आसान काम नहीं है, लेकिन हज़रत ज़हरा स.अ. ने अपने पूरे घर का माहौल ऐसा क़ुर्आनी बनाया कि अगर बाहर की कोई कनीज़ भी आई तो क़ुर्आन की आयतों में बातें करने लगी, ज़ाहिर है कि आप की इसी पाकीज़गी और क़ाबिलियत को देख कर अल्लाह ने इमामों को आपकी नस्ल से रखा और उनकी परवरिश और तरबियत आपके हाथों में दी।
आपका घर उसी समय से परवरिश और तरबियत के उसूलों को सीखने का सेंटर बन गया था, आपके पास पैग़म्बर स.अ. के असहाब की बीवियां और कनीज़ें अपनी और अपने बच्चों की तरबियत के उसूलों को सीखने आती थीं, आपके घर में अल्लाह की ओर से सीधे तरबियत के उसूल और आदाब नाज़िल होते थे, और पैग़म्बर स.अ. आप पर भरोसा होने के बाद भी आप के द्वारा असहाब की बीवियों और कनीज़ों के लिए बयान की जाने वाली बातों पर नज़र रखते थे ताकि आपके द्वारा बताए गए यह उसूल और आदाब हमेशा के लिए इतिहास में बाक़ी रहें और कोई किसी भी तरह का बहाना बना कर उस से मुंह न मोड़ सके।
आप अपने बच्चों की हर छोटी बड़ी भावना को समझती थीं, किस समय उनको मां के प्यार की ज़रूरत है या कब किसी और चीज़ की ज़रूरत है हर चीज़ का ध्यान रखती थीं, बच्चों के अक़ीक़े, उनकी ओर से सदक़ा देना और उनके कानों में अज़ान अक़ामत कहना जो कि यह सब काम मुस्तहब हैं लेकिन इन पर भी आपका पूरा ध्यान रहता, आप हर मौक़े का ध्यान रखती थीं कि कहीं किसी मौक़े पर बच्चों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।
हो सकता है बहुत से लोग यह सोचें कि बच्चों की तरबियत का समय उनके सही ग़लत समझने के बाद से हो और उससे पहले तरबियत के उसूलों का उन पर असर न हो, जबकि यह सोंच ग़लत है, क्योंकि आज तरबियत के माहिर लोग भी यही कहते हैं कि बच्चों के पैदा होते ही उनकी तरबियत पर ध्यान देना चाहिए, अगर बच्चे को शुरू से वालेदैन का प्यार नहीं मिला तो वह डरपोक, कमज़ोर, निराश और कभी कभी तो मरीज़ भी हो जाते हैं, और अगर अल्लाह न करे किसी बच्चे में अगर यह आदतें और सिफ़ात पैदा हो गए तो वह जुर्म और अपराध के रास्ते पर भी जा सकते हैं, और बदले की भावना भी उनके अंदर पैदा हो सकती है, इसीलिए वालेदैन को बच्चे के पैदा होते ही तरबियत पर ख़ास ध्यान देना चाहिए और उसको पैदा होते ही वैसी ही मोहब्बत और वैसा ही प्यार देना चाहिए जो हज़रत ज़हरा स.अ. की सीरत में मिलता है।
ऊपर बयान किए गए तरबियत के कुछ पहलू वह हैं जिनको हज़रत ज़हरा स.अ. के घर में पूरी तरह से देखा जा सकता है, और इन उसूलों की तालीम ख़ुद पैग़म्बर स.अ. ने हज़रत ज़हरा स.अ. को दी थी, रिवायत में है एक दिन पैग़म्बर स.अ. इमाम हसन अ.स. के बचपन में आपको गोद में बिठा कर आपको प्यार कर रहे थे, अक़रा इब्ने हाबिस ने कहा ऐ अल्लाह के रसूल मेरे दस बच्चे हैं लेकिन मैं आज तक किसी से भी इस तरह पेश नहीं आया, पैग़म्बर स.अ. ने नाराज़ हो कर फ़रमाया अगर अल्लाह ने तुम्हारे दिल से मोहब्बत को छीन लिया हो तो मैं क्या करूं, फ़िर आपने फ़रमाया जो भी अपने से छोटों से प्यार से पेश न आए और बड़ों का सम्मान न करे वह हम में से नहीं है। (बिहारुल अनवार, अल्लामा मजलिसी, जिल्द 43, पेज 282)
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