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Code : 192608
Date of publication : 14/3/2018 16:0
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यह कैसी बातें हैं?

शुरू में मैं सोंच में पड़ गया क्योंकि इमाम ख़ुमैनी र.ह. हवाई जहाज़ के विशेषज्ञ नहीं थे, लेकिन मुझे उनकी सच्चाई, उनके ख़ुदा पर यक़ीन और उनके पाक दिल पर भरोसा था, मुझे यक़ीन था कि अल्लाह ने इस हस्ती को किसी बहुत बड़े काम के लिए चुना है, वह कभी इमाम ख़ुमैनी र.ह. को अकेले नहीं छोड़ेगा,


विलायत पोर्टल :  सद्दाम की ओर से थोपी गई जंग शुरू हो चुकी थी, और अभी तीसरा चौथा दिन था, तीनों सेना (जल, थल और वायु) के अधिकारी जमा थे, मैं भी वहां मौजूद था, और उस समय के राष्ट्रपति बनी सद्र, प्रधानमंत्री शहीद रजाई और कुछ पार्लियामेंट सदस्य भी मौजूद थे, हम सभी आपस में मशविरा कर रहे थे, तभी एक फ़ौजी मेरे पास आकर मेरे कान में कहता है कि कुछ लोग दूसरे कमरे में आप से अकेले में कुछ बात करना चाह रहे हैं, मैं उठ कर उनके पास चला गया, वहां जो लोग मुझे याद हैं शहीद फ़कूरी, शहीद फ़लाही और 3-4 लोग थे, मैंने जाकर पूछा क्या काम है, उन्होंने जेब से एक काग़ज़ निकाला (आज भी वह काग़ज़ मेरे पास उसी तरह उन जांबाज़ों की तहरीर के साथ रखा है) उस पर कुछ लिखा था, मेरे पूछने पर बताया कि हमारे पास यह इतने तरह के हवाई जहाज़ हैं जैसे F-5, F-4, C-130 और भी कई नाम लिए जो अब इस समय मुझे याद नहीं हैं, फिर वह हर जहाज़ के नाम के सामने लिखे हुए थे कि कौन सा कितने दिन तक काम करेगा, फिर उसके बाद उसके पार्ट बदलना ज़रूरी हो जाएगा, उन्होंने बताना शुरू किया कि यह वाला 10 से 15 दिन चल पाएगा फिर इसका यह पार्ट बदलना होगा वह वाला 8 से 10 दिन चलेगा उसके बाद उसका यह पार्ट बदलना होगा, ज़ख़्मियों को लाने ले जाने वाला केवल इतन दिन चल सकता है, सामान ले जाने वाला इतने दिन चल सकता है, इसी तरह वह लोग सब जहाज़ों के बारे में बता रहे थे, उनके बताने के अनुसार 30-31 दिनों बाद ईरान के पास कोई हवाई सुविधा नहीं रह जाएगी, फिर उन्होंने कहा आप इमाम ख़ुमैनी र.ह. तक यह बात पहुंचा दीजिए, मैं भी उस समय कुछ पल के लिए सोंच में पड़ गया कि इनके द्वारा बताई गई बातों के अनुसार तो लड़ना बहुत मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि बिना हवाई जहाज़ के कैसे कोई और कितने दिन लड़ लेगा जबकि वह लोग रूस द्वारा बनाए गए जहाज़ों से आ आ कर बमबारी कर रहे थे, और हमारे पायलट भी पायलट जैसे नहीं थे उन्होंने कोई ट्रेनिंग वग़ैरह भी नहीं ली थी, यह सब सोंचने के बाद मैंने वह काग़ज़ उन से ले लिया और उन्हें इमाम ख़ुमैनी र.ह. के पास जमारान ले गया, मैंने उनसे कहा, आक़ा हमारी सेना के अधिकारियों की ओर से है कि हमारे पास सब कुछ मिला कर बस यही इतने और इस इस हालत के जहाज़ और सामान हैं, इन अधिकारियों के अनुसार जंगी जहाज़ 15-16 दिन से ज़्यादा काम नहीं करेंगे और सामान लाने ले जाने वाले ज़्यादा से ज़्यादा 30 दिन तक साथ देंगे, उसके बाद हमारे पास हवाई सुविधा के नाम पर कुछ नहीं होगा। इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने एक बार मेरी ओर देखा और कहा, (मुझे पूरे उनके शब्द याद नहीं लेकिन जो कहा उन्हें अपने शब्दों में बयान कर रह हूं) यह कैसी बातें कर रहें हैं, आप कह दीजिए जाएं और जंग करें, अल्लाह पहुंचाएगा, मदद करेगा, कुछ भी ऐसा नहीं होगा....,
शुरू में मैं सोंच में पड़ गया क्योंकि इमाम ख़ुमैनी र.ह. हवाई जहाज़ के विशेषज्ञ नहीं थे, लेकिन मुझे उनकी सच्चाई, उनके ख़ुदा पर यक़ीन और उनके पाक दिल पर भरोसा था, मुझे यक़ीन था कि अल्लाह ने इस हस्ती को किसी बहुत बड़े काम के लिए चुना है, वह कभी इमाम ख़ुमैनी र.ह. को अकेले नहीं छोड़ेगा, मैंने उसी दिन या अगले दिन अब यह मुझे याद नहीं रह गया वापस जा कर उनको इमाम ख़ुमैनी र.ह. का जवाब बता दिया, कि जाओ सद्दाम के हमलों का जवाब दो, जितनी हो सकेगी ख़ुद से मरम्मत करना बाक़ी अल्लाह मदद करेगा।
 वही हवाई जहाज़ जिनके बारे में उन सैन्य अधिकारियों ने केवल 15-16 दिन और 30 दिन काम करने का अनुमान लगाया था वह आज भी हमारी वायु सेना में काम में आ रहे हैं, आज जंग की शुरूआत से 29 साल हो गए लेकिन वायु सेना अभी भी उनका उपयोग कर रही है, हालांकि जंग के दौरान उनमें से कुछ में गोली लगने या किसी दूसरे कारण से मरम्मत की ज़रूरत पड़ी, उन्हें भी हमारे इंजीनियरों ने मेहनत कर के ख़ुद ही बना कर ठीक कर लिया, और कुछ पार्ट उन्होंने पाबंदियों (सेंशन) के बावजूद (ख़ुदा पाबंदी लगाने वालों पर लानत करे) किसी न किसी तरह ढ़ूंढ़ निकाले और उनकी मरम्मत कर के उन्हे फिर से उपयोग के क़ाबिल बना दिया। (आयतुल्लाह ख़ामेनई ने 9 अगस्त 2009 में सेना के साथ एक कार्यक्रम में बयान किया)
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