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Code : 193531
Date of publication : 1/5/2018 16:3
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शहीद मुतह्हरी आज भी ज़िंदा हैं....

आपने फ़लसफ़ा, समाजियात, अख़लाक़, फ़िक़्ह, तारीख़, सीरते मासूमीन अ.स., अक़ाएद और दूसरे अनेक विषय पर इस्लामी विचारों और तालीमात को अपने विशेष अंदाज़ में बयान किया है। आपकी किताबों की विशेषता यह है कि उस समय के समाज की ज़रूरतों के आधार पर लिखी गई हैं और उन्हें हर वर्ग के लोग पढ़ कर समझ सकते हैं यही वजह है कि इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने आपकी सारी किताबों की बहुत तारीफ़ की है और इसी तरह आयतुल्लाह ख़ामेनई ने आपकी किताबों को इस्लामी इंक़ेलाब का वैचारिक स्तंभ बताया है।

विलायत पोर्टल : शहीद मुतह्हरी अपनी सदी के एक निडर बेबाक आलिम थे, जिन्होंने अपनी तक़रीरों और अपने क़लम से हमेशा हक़ का समर्थन और बातिल को बेनक़ाब किया है जबकि आपने अधिकतर ज़िदगी एक ऐसे दौर में गुज़ारी जिसमें एक अहंकारी बादशाह सत्ता में था जिसकी विशेषता ही यही थी कि वह हर उस उठने वाली आवाज़ को हमेशा के लिए ख़ामोश कर देता था जो उसके विरोध में उठ रही हो, लेकिन इतिहास में यह सच्चाई दर्ज है कि उस ज़ालिम और अहंकारी बादशाह के हर ग़लत क़दम और हर ग़लत फ़ैसले का तुरंत और सटीक जवाब देते और उसका भरपूर विरोध करते, आप न केवल शाह के फ़ैसलों और उसकी ग़लत नीतियों का विरोध करते बल्कि समाज में फैली हुई हर बुराई और ग़लत रस्म और रिवाज के ख़िलाफ़ आप पूरी निडरता से बोलते और उस समय तक उन ग़लत रस्म और रिवाज का विरोध करते जब तक समाज उन्हें छोड़ नहीं देता। आपकी इसी निडरता और समाज को सुधारने की चाह को देख कर आपको उस दौर के सभी बुज़ुर्ग मराज-ए-केराम ने आपकी कोशिशों को सरहाते हुए आपका समर्थन किया, ख़ास कर इस्लामी इंक़ेलाब की बुनियाद रखने वाले इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने आपकी सारी कोशिशों को अच्छे से सराहा है और वह आपको बेपनाह चाहते थे और यही वजह है कि आपकी शहादत के बाद इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने आपके लिए ऐतिहासिक जुमला कहा था कि शहीद मुतह्हरी मेरी पूरी उम्र की मेहनतों का नतीजा था।
 इसी तरह इस्लामी इंक़ेलाब के रहबर आयतुल्लाह ख़ामेनई ने आपकी इल्मी कोशिशों और शागिर्दों की तरबियत और उस कठिन दौर में जहां एक ज़ालिम और अहंकारी की हुकूमत थी और इल्म और उलमा का दुश्मन सत्ता में बैठ कर लोगों को इल्म और संस्कृति से दूर कर के अय्याशियों और हराम कामों की ओर ढ़केल रहा था ऐसे कठिन दौर में आपकी इल्मी कोशिशों और मेहनतों को देख कर आयतुल्लाह ख़ामेनई ने कहा था कि शहीद मुतह्हरी इस्लामी क्रांति की विचारधारा की बुनियाद रखने वालों में से थे और मैं ख़ुद को उनके विचारों और आइडियॉलोजी का शागिर्द मानता हूं।
शहीद मुतह्हरी ने अनेक विषयों पर किताबें लिखी हैं जिनकी तादाद लगभग 70 बताई गई है, जिनमें से कुछ आपकी तक़रीर हैं जिनको आपके शागिर्दों ने किताब की शक्ल में तैयार किया और कुछ किताबें आपके दर्स हैं जिनको आपके शागिर्दों ने लिख कर किताब की शक्ल में तैयार किया और कुछ आपने ख़ुद किताब ही की शक्ल में लिखी हैं, इनमें से कुछ किताबें आपकी ज़िंदगी ही में इंतेशाराते सदरा से छपी थीं और कुछ आपकी शहादत के बाद छप कर सामने आईं, और लगभग 30 हज़ार पेजों पर आधारित आपके अपने हाथों की लिखी हुई तहरीर थी जो आपने नोटबुक के तौर पर लिखी थी।
आपने फ़लसफ़ा, समाजियात, अख़लाक़, फ़िक़्ह, तारीख़, सीरते मासूमीन अ.स., अक़ाएद और दूसरे अनेक विषय पर इस्लामी विचारों और तालीमात को अपने विशेष अंदाज़ में बयान किया है। आपकी किताबों की विशेषता यह है कि उस समय के समाज की ज़रूरतों के आधार पर लिखी गई हैं और उन्हें हर वर्ग के लोग पढ़ कर समझ सकते हैं यही वजह है कि इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने आपकी सारी किताबों की बहुत तारीफ़ की है और इसी तरह आयतुल्लाह ख़ामेनई ने आपकी किताबों को इस्लामी इंक़ेलाब का वैचारिक स्तंभ बताया है।
आपकी कुछ अहम किताबों के नाम इस तरह हैं.....
** इस्लाम व मुक़तज़याते ज़मान (इस्लाम और ज़माने के तक़ाज़े)
** इमामत व रहबरी
** अल-ग़दीर व वहदते इस्लामी
 ** इमदादहाए ग़ैबी दर ज़िंदगी-ए-बशर (इंसानी ज़िंदगी में ग़ैबी मदद)
** इंसाने कामिल
** तालीम व तरबियते इस्लामी
** तौहीद
** हमास-ए-हुसैनी (अ.स.)
** ख़ातमिय्यत
** सैरी दर सीरए आइम्म-ए-अतहार (अ.स.) (इमामों की ज़िंदगी पर एक निगाह)
** सैरी दर सीरए नबवी (स.अ.) (पैग़म्बर स.अ. की सीरत पर एक निगाह)
** अदले इलाही
** फ़लसफ़ए अख़लाक़
** फ़लसफ़ए तारीख़
** क़ेयाम व इंक़ेलाबे इमाम महदी (अ.स)
** मसअलए हेजाब (पर्दे का मसला)
** मआद (क़यामत)
** इंसान दर क़ुर्आन (क़ुर्आन की निगाह में इंसान)
** नेज़ामे हुक़ूक़े ज़न दर इस्लाम (इस्लाम में औरतों के हुक़ूक़)
ज़ाहिर है दीन और इस्लाम की इतनी ख़िदमत करने के बाद भले ही आप दुनिया में न रहे हों लेकिन आज आपकी यही ख़िदमतें पुकार कर कह रही हैं शहीद मुतह्हरी मदरसों में हो या मिंबर पर, मेहराब में हो या समाज में लोगों के बीच उनके विचार उनकी सिखाई और बताई हुई बातें अभी भी ज़िंदा हैं।
वह अहंकारी बादशाह जिसके ज़ुल्म और जिसकी विचारधारा का नतीजा था जो आपको शहीद किया गया वह न जाने कब का मिट गया, उसका नाम तो लिया जाता है लेकिन अच्छाई के साथ नहीं, उसे हमेशा उसकी बुराई, अहंकार, ज़ुल्म और बद किरदारी के साथ याद किया जाता है, लेकिन आपको आज भी उसी तरह याद किया जाता है जिस तरह आपकी ज़िंदगी में लोग याद करते थे, यह आपका ख़ुलूस था जिसकी वजह से आज यौमे-मुअल्लिम के नाम से लोग न केवल आपको बल्कि अपने सभी उस्तादों को इज़्ज़त और सम्मान से याद करते हैं।
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