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Date of publication : 13/8/2018 8:18
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इस्लाम में आमाल का अज्र और उसकी सज़ा का समय तय है

हिसाब किताब मौत से पहले मुमकिन नहीं है जब तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाए और फिर किसी नेक काम की गुंजाइश बाक़ी न रह जाए, बल्कि मरने के बाद भी यह फ़ाइल बंद नहीं हो सकती है क्योंकि यह भी हो सकता है कि इंसान ने किसी सदक़-ए-जारिया का बंदोबस्त किया हो जिससे उसका सवाब जारी रहे या कोई शख़्स उसके हक़ में नेक अमल करता रहे और उसका सवाब मरने वाले को मिलता रहे, ऐसी सूरत में पूरा हिसाब किताब तभी होगा जब सारे नेक काम करने वाले मर जाएं और उसकी तरफ़ से किसी भी नेक अमल अंजाम दिए जाने की कोई भी गुंजाइश न हो।





विलायत पोर्टल : दुनिया के सिस्टम में नेक काम का ईनाम और उसकी सज़ा में जल्दबाज़ी का सबसे बड़ा राज़ यह होता है कि मुजरिम के हाथ से निकलने का डर रहता है, किसी भी देश का मुजरिम अगर सरहद से निकल गया या किसी दूसरे देश में पनाह ले ली तो अब क़ानून हर तरफ़ से मजबूर हो गया और सज़ा देना उस देश के हाथ से निकल गया और उसकी बुनियादी वजह यह है कि हर देश की सरहदें सीमित हैं और उन सरहदों से बाहर क़ानून या उस देश के हाकिम का पावर नहीं रह जाता।

इस्लाम में इलाही सरहदों का मतलब इससे बिल्कुल अलग है, उसके अक़ीदे के मुताबिक़ यह सारी दुनिया एक पैदा करने वाले की है और वही उसका मालिक और हाकिम है इसलिए उसकी सरहदों से बाहर निकलने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

वह अगर दुनिया में हद (कुछ गुनाह और अपराध हैं जिनकी सज़ा अल्लाह ने इस दुनिया में देने का हुक्म दिया है जैसे कोड़े लगाना चोर के हाथ काटना वग़ैरह) जारी करता है तो उसका मक़सद दूसरों के लिए इबरत (सीख) के लिए होता है या अपराधी का दोबारा अपराध न करना मक़सद होता है और इसका राज़ यह भी है कि अगर सारा अज्र और सारी सज़ा भविष्य पर डाल दी जाए तो कमज़ोर दिमाग़ और अक़ीदे वाले इंसान उसकी तरफ़ से ग़ाफ़िल हो जाएंगे और फिर गुनाह और अपराध से रोकने वाला कोई नहीं होगा।

उसने उन सभी अपराध की सज़ा इस दुनिया में रखी जिन पर इलाही सिस्टम के चलने और इंसानियत के बाक़ी रहना टिका हुआ है और बाक़ी सारा हिसाब किताब आख़ेरत पर छोड़ दिया।

इस्लाम के इस दुनिया में सज़ा देने (हद जारी करने) पर ध्यान दिया जाए तो अंदाज़ा होगा कि उसने पांच तरह के अपराध और गुनाह की सज़ा दुनिया में रखी है, यह वही गुनाह और अपराध हैं जिनका संबंध जीवन के पांच अनमोल रतन से है, और वह यह कि इस्लाम के सभी क़ानून की बुनियाद पांच चीज़ों के बचाने पर है।
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1- मज़हब 2- अक़्ल 3- जान 4- माल 5- इज़्ज़त

इन पांचों को बजाए बिना सिस्टम के लागू होने या दुनिया में शांति और सुकून के बाक़ी रहने के कोई चांस नहीं हैं, इसीलिए इस्लाम ने इनकी सज़ा दुनिया में ही लागू की है ताकि लोग सीख हासिल करें और समाज तबाही से बचा रहे।
उसने मज़हब से बग़ावत करने की सज़ा क़त्ल रखी है जो शख़्स पैदा करने वाले के वजूद को नहीं मानता उसे अपने वजूद की कोई ज़रूरत नहीं इसलिए कि मख़लूक़ का वजूद ख़ालिक़ के वजूद के बिना मुमकिन ही नहीं है।

उसके बाद अक़्ल को बाक़ी रखने के लिए नशे के इस्तेमाल पर 80 मारने को कहा क्योंकि ऐसा शख़्स अल्लाह के वजूद को मानता है लेकिन उसके नशा करने से समाज की इज़्ज़त को ख़तरा है इसलिए इसे सरेआम बे इज़्ज़त होना चाहिए।

माल को बचाने के लिए चोर के हाथ काटने का फ़ैसला किया ताकि चोरी जैसे जुर्म की जड़ काटी जा सके और दूसरा आदमी ऐसा गुनाह अंजाम न देl
जान को बचाने के लिए क़त्ल के क़ेसास (बदले) को क़त्ल ही रखा ताकि इंसान महसूस कर सके कि अगर दूसरों की ज़िंदगी की कोई क़ीमत नहीं तो उसकी ज़िंदगी की भी कोई क़ीमत नहीं हैं।
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इज़्ज़त के बचाव के लिए ज़ेना, लवात और ज़ेना के आरोप जैसे सभी गुनाह के लिए सज़ा रखी क्योंकि यह अपराध और गुनाह दूसरों की इज़्ज़त को भी तबाह करते हैं और हक़ीक़त में अपनी इज़्ज़त का ख़ात्मा कर देते हैं।
इसके बाद और सारे गुनाह, जुर्म और अपराध की सज़ा आख़ेरत में रखी और नेक आमाल का अज्र और बुरे आमाल की सज़ा का सिस्टम भी आख़ेरत के लिए रखा और इसके पीछे 2 कारण हैं:
1- अज्र और सज़ा देने का इस्लामी तसव्वुर दुनिया में मुमकिन नहीं है, इस्लाम अज्र उस सवाब को कहता है जिसमें किसी तरह के अज़ाब, दुख, दर्द और परेशानी की मिलावट न हो और सज़ा उस अज़ाब को कहता है जिसमें किसी तरह की कोई राहत न हो, और खुली हुई बात है कि इस अक़ीदे का पूरा होना इस दुनिया में मुमकिन नहीं है, क्योंकि दुनिया में कोई ऐसी राहत नहीं है जिसमें तकलीफ़ का पहलू न हो और कोई ऐसी तकलीफ़ नहीं है जिसमें राहत का पहलू न हो, इसलिए असली सवाब और अज़ाब का तसव्वुर इस दुनिया में मुमकिन नहीं है और उसके लिए किसी ऐसी दुनिया का होना ज़रूरी है जहां इंसान की ख़्वाहिशें आज़ाद हों और उनको पूरा करने की आज़ादी मौजूद हो ताकि किसी भी तरह की रूहानी तकलीफ़ का सामना न करना पड़े।

2- इस्लाम के सिस्टम में अज्र और सज़ा में कमी भी मुमकिन है अज्र की मंज़िल में इस तरह कि अगर किसी शख़्स ने किसी दूसरे शख़्स के हक़ में कोई नेक अमल अंजाम दिया तो उसका सवाब उसके आमाल नामे में लिखा जाएगा जिसके लिए अमल अंजाम दिया गया है, और सज़ा की मंज़िल में इस तरह कि अगर किसी शख़्स के हक़ में ज़ुल्म किया और उसने माफ़ कर दिया या अल्लाह की मासियत की लेकिन तौबा कर ली तो उसके अज़ाब में कमी हो जाएगी।

ज़ाहिर है कि ऐसी सूरत में सारा हिसाब किताब मौत से पहले मुमकिन नहीं है जब तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाए और फिर किसी नेक काम की गुंजाइश बाक़ी न रह जाए, बल्कि मरने के बाद भी यह फ़ाइल बंद नहीं हो सकती है क्योंकि यह भी हो सकता है कि इंसान ने किसी सदक़-ए-जारिया का बंदोबस्त किया हो जिससे उसका सवाब जारी रहे या कोई शख़्स उसके हक़ में नेक अमल करता रहे और उसका सवाब मरने वाले को मिलता रहे, ऐसी सूरत में पूरा हिसाब किताब तभी होगा जब सारे नेक काम करने वाले मर जाएं और उसकी तरफ़ से किसी भी नेक अमल अंजाम दिए जाने की कोई भी गुंजाइश न हो।
   


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