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Date of publication : 16/8/2018 17:13
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दुआए कुमैल और गुनाहों की क़िस्में

पैग़म्बर स.अ. का इरशाद है कि तीन गुनाहों का अज़ाब आख़ेरत से पहले दुनिया ही में नाज़िल हो जाता है, मां बाप का कहना न मानना, लोगों पर ज़ुल्म करना, किसी के एहसान और नेकी को भुला कर उसकी ना शुक्री करना।

विलायत पोर्टल :  इस दुआ में इमाम अली अ.स. ने दस तरह के वसीलों का हवाला दिया है उसके बाद अपना असली मक़सद अल्लाह की बारगाह में बयान किया है, अल्लाह की रहमत, अल्लाह की कुदरत, जबरूत, अज़मत, सलतनत, पाक ज़ात, अस्माए हुस्ना, इल्म, नूरानियत और उसकी ज़ात की बरकत, इन दस वसीलों से अपनी बात अल्लाह की बारगाह में पेश की है।
और जब अपना मक़सद अपनी दुआ अपनी बात उसकी बारगाह में रखी तो पांच तरह के एहसान का हवाला दिया है, वह बुराई जिस पर पर्दा डाल दिया, वह मुसीबत जिसे टाल दिया, वह फिसलने की जगह जहां फिसलने से बचा लिया, वह बुरे हालात जिन्हें हमसे दूर कर दिया और वह अमल जिसका हक़दार इंसान नहीं था लेकिन उसी के नाम से मशहूर कर दिया।
दुआ में अज़ाब के अलग अलग दरजों का ज़िक्र किया, अज़ाब, अल्लाह से जुदाई, जहन्नम की आग की गर्मी, अल्लाह की निगाहे रहमत का ख़त्‍म हो जाना और आख़िर में अज़ाब की कमी की तरफ़ भी इशारा किया गया है कि आख़िर कैसे मुमकिन है अल्लाह की मेहरबानी की उम्मीद लगाए हुए इंसान अज़ाब में रहे, अल्लाह के फज़्ल और करम की उम्मीद रखे और आग की तकलीफ़ बर्दाश्त करे, अल्लाह आवाज़ सुने, हमारे बुरे हाल को देखे और फिर भी जलाता रहे, बंदे की सच्चाई निगाह में हो और उसे जहन्नम में करवटें बदलवाई जाएं, बंदा अल्लाह को पुकारते हुए फ़रयाद करे और जहन्नम के फ़रिश्ते उसे डांट दें, वह अल्लाह के करम का हवाला देता रहे और फिर भी अज़ाब में पड़ा रहे।
इन सारी चीजों के साथ 6 तरह के गुनाहों की मग़फ़ेरत की गुहार लगाई गई है जिसको इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. ने इस तरह बयान किया है:
वह गुनाह जो नेमतों को बदल देता है वह ज़ेना है, वह गुनाह जो अज़ाब नाज़िल कराता है वह ज़ुल्म है, जिस से दीन की गरिमा पर आंच आती है वह शराब पीना है, रोज़ी की तंगी की वजह ज़ेना है और दुआओं को अल्लाह की बारगाह में पहुंचने से रोक देने वाला गुनाह मां बाप की नाराज़गी है।
इमाम सज्जाद अ.स. का इरशाद है कि दुआओं की राह में रुकावट बनने वाले गुनाह नीयत की ख़राबी, बातिन का नजिस होना, दीनी और ईमानी भाईयों के साथ मुनाफ़ेक़त, नमाज़ का समय पर न पढ़ना, सदक़ा और ख़ैरात का अदा न करना, ज़ुबान गंदी होना।
एक दूसरी जगह फ़रमाते हैं कि तीन गुनाह बारिश को भी रोक देते हैं, हाकिम के फै़सलों में ना इंसाफ़ी, झूठी गवाही और सच्ची गवाही से दूरी।
पैग़म्बर स.अ. का इरशाद है कि तीन गुनाहों का अज़ाब आख़ेरत से पहले दुनिया ही में नाज़िल हो जाता है, मां बाप का कहना न मानना, लोगों पर ज़ुल्म करना, किसी के एहसान और नेकी को भुला कर उसकी ना शुक्री करना
गुनाह के प्रभाव
**इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि जब इंसान गुनाह करता है तो उसके दिल में एक काला नुक्ता पैदा हो जाता है उसके बाद तौबा करता है तो तो वह नुक्ता मिट जाता है, लेकिन जब गुनाह का सिलसिला जारी रहता है तो यह काला नुक्ता पूरे दिल को घेर लेता है और फिर कभी निजात नहीं मिलती।
** इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि गुनाह जब ज़्यादा हो जाते हैं तो दिल सख़्त हो जाता है और जब दिल सख़्त हो जाता है तो आंसू सूख जाते हैं।
** इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि इंसान जब कोई गुनाह करता है तो नमाज़े शब की बरकत से महरूम हो जाता है, गुनाह गोश्त काटने वाली छुरी से तेज़ असर रखता है।
** इमाम बाक़िर अ.स. का इरशाद है कि गुनाह रोज़ी को तंग कर देता है।
** पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि इंसान जब किसी मुश्किल में फंसता है तो चाहे सर का दर्द हो या ठोकर का लगना हो उसका ज़िम्मेदार उसका ख़ुद का अमल होता है, यह और बात है कि मालिक उसके ज़्यादातर गुनाहों को माफ़ कर देता है।
** इमाम रज़ा अ.स. का इरशाद है कि हाकिम जब झूठ बोलते हैं तो बारिश रुक जाती है और बादशाह जब ज़ुल्म करता है तो हुकूमत कमज़ोर पड़ जाती है ज़कात न देने से जानवरों की मौत होती है।
इलाज
अल्लामा तबातबाई र.ह. ने बहुत सारी हदीसों को जमा कर के कुछ अमल का ज़िक्र किया है जिससे गुनाहों के आसार ख़त्म होना मुमकिन है:
दुनिया में बीमारी या आर्थिक तंगी, अलग अलग तरह की बीमारी, दुख दर्द, नेक आमाल, फरिश्तों का इस्तेग़फ़ार, ज़्यादा सजदे करना, हज और उमरा, आमाल नामे की नेकियों से शुरुआत और नेकियों पर ख़ात्मा और मौत इन सभी चीज़ों से बचने या इन्हें हासिल करने का बेहतरीन रास्ता मोहम्मद स.अ. और उनकी आल अ.स. पर सलवात का पढ़ना है।
इमाम अली अ.स. की हदीस के मुताबिक़ तीन चीज़ें शैतान के शर और बहकावे से बचने के लिए बहुत अहम हैं:
1- अजनबी औरत के साथ अकेले में न बैठना
2- बादशाहों के यहां हाज़िरी देने से परहेज़ करना
3- बिदअत फैलाने वाले का साथ न देना।
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